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हिंदू सनातन संस्कृति के धरोहर कजरी महोत्सव का उमंग और उत्साह के साथ मनाया गया

 

पुनर्जीवित कजरी संस्कृति:

जनकपुरधाम । कल शनिवार दिनांक 15 जुलाई 2023 को ब्रह्मर्षि महिला समाज जनकपुर द्वारा श्रीमती नीला पाण्डे जी के नेतृत्व तथा श्रीमती आरती चौधरी जी के व्यवस्थापन में उनके ही निवास स्थान पर हिंदू सनातन संस्कृति के धरोहर कजरी महोत्सव का उमंग और उत्साह के साथ आपसी सदभाव और प्रेम को बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया गया।
कजरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से गाया जाने वाला लोकगीत है। जिसमें परदेस कमाने गए पुरुषों की अकेली रह गईं नवविवाहिताएं स्त्रियां अपनी मायके में छूट गए रिश्तों की उपेक्षा की वेदना, विरह-वेदना और अकेलेपन का दर्द व्यक्त करती हैं। हिंदू सनातन संस्कृति में विंध्य क्षेत्र में गाई जाने वाली मिर्जापुरी कजरी में सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की मिठास और खटास के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है। कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी कजरी।
तेरहवीं शताब्दी के बड़े सूफी शायर अमीर ख़ुसरो की बहुप्रचलित कजरी रचना है- ‘अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया।’ अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की एक रचना ‘झूला किन डारो रे अमरैया’ बेहद प्रचलित है ।भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ब्रज और भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरी गीतों की रचना की है। लगभग सभी शास्त्रीय गायकों और वादकों ने कजरी की पीड़ा को अपनी सुर दिए हैं। गिरिजादेवी की आवाज़ और बिस्मिल्लाह खां की शहनाई में कजरी की वेदना हृदय को भाव विभोर कर जाती है।
मिर्जापुर के माँ विंध्यवासिनी के प्रति आस्था से ओतप्रोत हो अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। कुछ लोगों का मानना है कि कान्तित के राजा की लड़की का नाम कजरी था। वो अपने पति से बेहद प्यार करती थी। जिसे उस समय उससे अलग कर दिया गया था। उनकी याद में जो वो प्यार के गीत गाती थी। उसे मिर्जापुर के लोग कजरी के नाम से याद करते हैं। वे उन्हीं की याद में कजरी महोत्सव मनाते हैं।
हिन्दू धर्मग्रंथों में श्रावण मास का विशेष महत्त्व है। छह ऋतुओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्षा ऋतु के होने के कारण भी कृषि संस्कृति में इसका गुणगान तथा उत्सव मानकर सम्मान करना हमारा संस्कार है। प्रकृति के कण कण को ईश्वर का रूप मानकर पूजा, प्रार्थना और उसके सम्मान में गीत, संगीत और नृत्य का आयोजन हमारी संस्कृति का अनमोल पक्ष है जिसे विश्व के अन्य संस्कृति में खोजना मुश्किल है। विभिन्न षडयंत्रों और परिस्थितियों के कारण ओझल में पड़ी ऐसे अनेकों सांस्कृतिक धरोहर को खोजकर सार्वजनिक करना होगा। पुनः अपनी सामाजिक जीवन शैली में स्थापित करना होगा।
ध्यान रहे! किसी भी संस्कृति को संजोकर रखने में महिलाओं का विशेष योगदान होता है। महिलाओं के कारण ही वहां की संस्कृति सुरक्षित और संवर्धित होती है। अतः हिंदुओं के संस्कार में श्रावण और वर्षा ऋतु का अपना अलग ही आनंद और महत्व है। इसके लिए सामूहिक रूप में विशेष पहल की आवश्यकता है। सनातन संस्कृति के एक एक बूंद को पुनः महासागर में परिणत करना होगा। संस्कृति ही हमारा अस्तित्व है।

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सखी संग खेलब:
भेज दिअ भैया के बोलाबे ला गे माई …सावन आएल।
सखी संग झुलब झुला गे माई … साबन आएल।। 1

आम के गछिया में झूला लगाएब।
बचपन के सखिया संग रास रचाएब।।
रिमझिम पड़त फुहार गे माई …. सावन आएल।।। 2

छिनल बालकपन बैरन जवनी।
छिनल खेलौना गुड़िया कहानी।।
केनक हम भयली पराइ के माई… सावन आएल।।। 3

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