दो दो मजबूत शक्ति एक ‘ हिंदुत्व और दूसरा हृदयेंद्र’ एक विश्लेषण : अजय कुमार झा
3 years ago
दूई प्रकार भए मृत्यु हमारा!
नेपाली राजनीति में बाहरी दबाव और प्रभाव पड़ना प्रकृति प्रदत्त और स्वाभाविक भी है। यहां के हिमाली प्रदेश के नागरिक अति विकट परिस्थितियों में जीवन यापन करने को मजबूर हैं वहीं पहाड़ी भूभाग में भी शहरी इलाकों को छोड़कर बाकी क्षेत्र दैनिक जीवन में आवश्यक अनेक भौतिक असुविधाओं से भरा हुआ है। इधर तराई मधेस के क्षेत्रों को केंद्रीय सरकार द्वारा षडयंत्र रचकर आर्थिक, राजनीतिक, भौतिक और प्रशासनिक अधिकार और सुविधाओं से वंचित कर गरीबी में जीने को मजबूर किया गया है। यहां के सत्ता और प्रशासन मुट्ठीभर लोगों और जातियों के हाथों में सीमित है। इन सत्ता धारियों में राष्ट्रीयता इतना ही है कि उन्हें यूरोप और अमेरिका में भिसा लगते ही नेपाल को लात मारकर उड़ जाते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि नेपाल जैसे पौराणिक देश के अस्तित्व और गरिमा को बचाए रखने के लिए इन मुट्ठीभर सत्तासीन लुटेरों और भ्रष्टाचारियों के षडयंत्र तथा देशद्रोही प्रवृत्ति को आम जनता के समक्ष उजागर करना होगा, साथही इस प्रवृत्ति के कारण भविष्य में आनेवाली संभावित खतरा और भावी पीढ़ी को जीने के लिए उत्पन्न होनेवाली भीषण दुर्घटनाओं का विश्लेषण कर समझाना होगा। यह हमारा आज के लिए परम् दायित्व भी है। संभावित दुर्घटनाओं को समझनेवाले विवेकशील लोगों को कष्ट सहकर भी सत्य को उजागर करना चाहिए।
लोकतंत्र आने के बाद देश के भौतिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास के लिए अधिकार सहित का पूर्ण दायित्व कांग्रेस, एमाले, राप्रपा और बाद में माओवादी तथा मधेसवादी पार्टी के नेताओं तथा कर्मचारियों के हाथों में सौंप दिया गया। वि सं 2046 के बाद राज परिवार ने देश के संपूर्ण बागडोर अपने हाथों से कांग्रेस और कामयूनिष्टों के हाथों में सहजता से छोड़ दिया। वो चाहते तो भीषण खून खराबा करा सकते थे लेकिन देश को अपना घर और देश वासियों को अपना कुटुंब समझने के कारण स्वर्गीय राजा वीरेंद्र ने एक भी हिंसात्मक कदम नहीं उठाया। जबकि कांग्रेस और कमयूनिष्ट के नेताओं ने अपनी कमजोरी और चोरी को दबाने के लिए राजा को दोषी ठहराना जारी रखा। जनता इनकी झूठ और धूर्तता को समझ रही थी। लेकिन राजनीतिक प्रणाली को पलटने के लिए कोई मजबूत और भरोसेमंद विकल्प नहीं था।
अतः अबतक मौन धारण करने का मूल कारण इतना ही था।
आज देश के वर्तमान देश बेचुवा प्रणाली के विकल्प में दो दो मजबूत शक्ति उपस्थित है। एक ‘ हिंदुत्व और दूसरा हृदयेंद्र ‘ और इन दोनों के वैचारिक तथा व्यवहारिक लक्ष्य को एक सूत्र में पिरोने के लिए प्रयास किया जाए तो आधुनिक नेपाल के लिए एक विशेष राजनीतिक तथा सैद्धांतिक क्षेत्र निर्माण किया जा सकता है। संभवतः वर्तमान समय इसकी तिब्र प्रतीक्षा में है। आम जनता में भी मौलिक परिवर्तन का गहन भाव स्पष्ट देख सकते हैं। पार्टियों से पोषित कार्यकर्ता बाहेक अन्य सभी लोग परिवर्तन के पक्ष में हैं। आम नेपाली जनता के इस सुक्ष्म परंतु मजबूत भावनात्मक धार को पहचानने की जरूरत नेताओं का है। राजनीति करनेवाले जनता के मनोभाव को भांपकर नेतृत्व ले लिया करते हैं। परंतु नेपाल में अबतक इन मजबूत पार्टियों में से किसी भी पार्टी ने हिंदुत्व का खुला नेतृत्व लेने से कतराने का मूल कारण है; भ्रष्टाचारी प्रवृति।
लोकतंत्र के बाद पिछले 35 वर्षो में नेपाल के राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारियों ने सिर्फ एक ही आविष्कार किया है; वो है देव दानव का निकृष्ट गठबंधन। अर्थात् देश को लूटने और बदनाम करने में सब एक दूसरे के साथ हो जाएं। मिल जुलकर देश को लूटने और बेचने के काम में दक्षिणपंथी, वामपंथी, यथास्थितिवादी और मधेसवादी सबके सब एक हो जाते हैं। यह अदभुत रसायन सिर्फ और सिर्फ नेपाल में ही आविष्कार किया गया है। यह निम्न मानसिक और क्षुद्र वैचारिक गठबंधन इस पूरे भूखण्ड को तार तार करके रख देगा। जल्द ही जनता त्राहिमाम करते शरणस्थली के लिए तड़पते हुए दिखेंगे। रामायण के यह पंक्ति जो मारीच से कहलाया गया है, वह हमारे जीवन में जल्द ही प्रमाणित होनेवाला है।
” दुई प्रकार भए मृत्यु हमारा।
वहां राम यहां रावण मारा।”
क्या आपको नहीं महसूस होता है कि उपरोक्त कथन को पूर्ण करने के लिए आपके मतों से निर्मित आपकी सरकार आपके सामूहिक विनाश के लिए आधुनिक महाभारत और नए काश्मीर फाइल के लिए आधार भूमि तैयार करने में सफल होता जा रहा है। वैसे शुतुरमुर्ग शिकारी रूपी मृत्यु को देखकर अपनी गर्दन को मिट्टी में घुसेड़ लेता है; ताकि शिकारी दिखाई न दे। मैंने आज से तीन साल पहले हिमालिनी पत्रिका के लिए एक लेख का शीर्षक ही रखा था ” शुतुरमुर्गे बुद्धिमत्ता ” जो अब गतिमान और मूर्तिमान होते दिख रहा है।
ध्यान रहे, सावधान हमें रहना है। जो लुटेरा संस्कार का है, देश बेचूवा प्रवृत्ति के पोषक है; स्वभावतः उसके लिए इज्जत, प्रतिष्ठा और ईमानदारी का कोई मूल्य नहीं। वैसे लोगों को न अपनी अस्तित्व, जाती, धर्म, संस्कार और संस्कृति से कोई लेना देना होता है न किसी के भावना से। उन्हें सिर्फ और सिर्फ पैसा चाहिए। धन और पद चाहिए। ऐसे आराम चाहिए। भोग विलास चाहिए।
उपरोक्त कुसंस्कारों से सज्जित मानव शरीर वास्तव में दानव है। शरीर से तो जरूर मानव दिखता है लेकिन भीतरी प्रवृत्ति से वह दानव है। दानव का अर्थ कोई विकराल शरीरधारी जंगली जानवरों जैसा भयानक नहीं होता है। अरे महा पंडित, वैश्विक विद्वान रावण भी तो राक्षस ही था न। तो क्या उसका शरीर मानव जैसा नहीं था ? ऐसा नहीं है बंधु! हम ही लोभ और अहंकार के बस होकर दानव बन जाते हैं और उदार तथा करुणावन होकर हम ही देवता भी बन जाते हैं। यह हमारी मानसिकता का परिणति है। हिटलर जैसे हजारों मानव ने लाखों निर्दोष मानवों को मौत के घाट उतार दिया। यह कैसा संकेत है? देवता या दानव का? अभी भी हजारों हिटलर हमारे बीच मौज कर रहा है, मौके की तलास कर रहा है। एक माहौल बनेगा और उसका अभीष्ट सिद्ध हो जाएगा और लाखों के भविष्य उजाड़ दिया जाएगा। इस गंभीर विषय पर संगोष्ठी, विमर्श, संभाषण, मंतव्य आदि के आयोजन की आवश्यकता है। खुले तौर पर वैचारिक आदान प्रदान किया जाना जरूरी है। प्रज्ञवानों का कर्तव्य है; समय से पूर्व संभावित दुर्घटनाओं का विश्लेषण कर संभावित समस्याओं के बारे में आगाह कराते हुए समाधान के उपायों को उजागर करना। यहां मैने अपना कर्तव्य निर्वाह कर दिया है। धन्यवाद!

