आंदोलन नहीं, समूल परिवर्तन का संकेत है! : अजय कुमार झा
3 years ago
अजय कुमार झा, जलेश्वर । शिक्षक जैसे मर्यादित और अत्यधिक सम्मानित पेशे पर नेपाल सरकार और राजनीतिक दलो के द्वारा कभी उचित ध्यान नहीं दिया गया। वर्षों तक शिक्षक के लिए विज्ञापन न किए जाने के कारण लाखों युवाओं जो शिक्षक बनना चाहते थे वे असमंजस और प्रतीक्षा में ही रिटायर्ड हो गए। 2052 में लिए लिखित परीक्षा का 2061 में परिणाम निकले गए। इस बीच शिक्षक के रूप में पार्टियों के कार्यकर्ताओं को पालने पोसने का अभियान चलता रहा। देश के शिक्षा क्षेत्र को योजना बद्ध रूप में धराशाई बनाने में सफल नेता और सरकार आज उसी शिक्षक के भविष्य को गुलामी के घटिया जंजीरों से बांधना चाहती है। जिसका शिक्षकों के द्वारा भयंकर विरोध किया जा रहा है। शिक्षा विधेयक के विरोध में लाखों शिक्षक आज काठमांडू के सड़कों पर तांडव नृत्य कर रहे हैं। सरकारी अधिकारी निर्लज्जता पूर्वक अपनी गलतियों को छुपाने में लगे हुए हैं। अयोग्य अधिकारियों के चक्कर में फसकर माओवादी निरंतर अपनी मूल से कटते जा रहा है। भट्टराई जी के द्वारा स्थापित कांग्रेस का जड़ अब लगभग उखड़ चुका है। आज से पांच साल पहले बारह हजार शिक्षक को नौकरी से हटाकर एमाले अपनी गलती को सुधारने में सफल होता नजर आ रहा है। शिक्षक के महिमा को संबोधित कर जनमत के विद्वान नेता सिके राउत जी शिक्षक वर्ग में सम्मान के पात्र होने लगे हैं। बालेन जैसे उभरा हुआ व्यक्तित्व अपनी उत्तेजना के कारण पल भर में अस्तित्वहीन होने लगे हैं। लामिछाने की धूर्तता भी खुलकर सामने आ रही है। अन्य क्षेत्रीय पार्टी गुमनाम की जिंदगी जी रहे हैं। इस प्रकार सुप्तावस्था से एकाएक क्रांतिकारी निर्णय लेने के कारण आज शिक्षक क्षेत्र समग्र विश्व को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होता नजर आ रहा है। इस भीषण आंदोलन के निरंतरता से देश में एकसाथ परिवर्तन के अनेकों द्वार खुलने और बंद होने की संभावना को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि यह आंदोलन देश के लाखों विद्वान के आत्म सम्मान, प्रशासनिक पीड़ा और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है।
जिन शिक्षकों को उच्चतम वेतन सुविधाएँ मिलनी चाहिए, उन्हें उसी स्तर के निजामती सेवकों की तुलना में कम अधिकार और सेवा सुविधाएँ दी गईं है। जहां दूरदराज के क्षेत्रों में अन्य कर्मचारियों के लिए भत्ते प्रदान किए गए, वहीं शिक्षकों के साथ बदनीयतपूर्ण व्यवहार किया गया। बच्चों के शिक्षकों और स्कूल कर्मचारियों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता है। शिक्षक का पेशा ऐसी कई समस्याओं, भेदभाव और उपेक्षा से भरा हुआ है।
सर्वोत्तम शासन प्रणाली के रूप में जानेवाले लोकतांत्रिक गणतंत्र देश नेपाल में शिक्षा क्षेत्र में उथल-पुथल मची हुई है और सरकार शिक्षकों के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। भेदभावपूर्ण शिक्षा कानून के खिलाफ अपने हक और अधिकार के लिए आंदोलन कर रहे शिक्षकों को हतोत्साहित कर रही है। काठमांडू के विख्यात मेयर वालेन साह द्वारा जारी उर्दी में राणा शासन का आभास दिख रहा है। जहानिया राणा की तरह आम जनता की बात न सुनने और अपने विचार थोपने की परंपरा वालेन में आज भी जीवित होने के कारण देशभर में व्याप्त ख्याति पलभर में ध्वस्त हो गया। यह वालेन के लिए तो दुखद है ही, साथ ही आम जनता के लिए भी निराशाजनक है। बालेन में नेपाल के युवाओं ने एक योग्यतम नेतृत्व के छबि को देखा था। नेपाल के लिए मोदी का प्रारूप को देखा था। लेकिन दुर्भाग्य! गलत संगत अथवा सलाह के कारण सबकुछ मटियामेट होने के कागार पर है।
शिक्षा अधिनियम-2028 अभी भी जीवित है और उस अधिनियम के अनुसार वालेन को कहीं से भी शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। अधिकार क्षेत्र से बाहर बयान जारी करना वालेन शाह के निरंकुश और अयोग्य चरित्र का परिचायक है। यदि वालेन में थोड़ा सा भी लोकतांत्रिक आचरण है, तो उन्हें महान शैक्षिक आंदोलन का समर्थन करना चाहिए और एक ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें शिक्षण कार्य तेजी से संचालित हो सके।
हमारे प्रधान मंत्री और उनकी सरकार ने लोगों को चोरों से बचाने की कोशिश की लेकिन वे अपनी आस्तीन के सांपों को नहीं पहचान सके। इन मंत्रालयों के कर्मचारियों को न तो जनता की परवाह है और न ही सरकार की; उन्हें अपनी झोली भरना है। चाहे वह जनता को लूटकर हो या सरकार को बदनाम कर के हो। ऐसा लगता है कि सरकार को लाखों शिक्षकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की राजनीतिक परिणाम का बोध नहीं है। एक सफल एवं कुशल राजनीतिज्ञ निश्चित ही ऐसा आत्मघाती निर्णय नहीं लेगा। लाखों शिक्षकों के साथ अन्याय करके कोई भी पार्टी अस्तित्ववान नही रह सकता। राजनीतिक प्रणाली और सरकार के अस्तित्व को नष्ट करने का यही इतिहास रहा है।
लोगों की इच्छा है कि शिक्षकों का यह आंदोलन नेपाली राजनीति में एक विशेष व्यवस्था लाए। क्योंकि आज देश में केवल शिक्षक वर्ग ही ऐसा है जो समाज को लम्बे समय तक प्रभावित करता है। देश का यही वर्ग सबसे अधिक ईमानदार है, बाकी क्षेत्र तो चर्चा के लायक भी नहीं है। ऐसे में जब सरकार शिक्षकों के अधिकार और मान सम्मान को कुचलने का काम कर रही है तो बाध्य होकर अब इस व्यवस्था और जिम्मेदार लोगों को ठिकान लगाने का रास्ता निकालना जरूरी हो जाता है।
जब तक शिक्षक को सरकार के किसी भी अंग में स्थानांतरित होने का संवैधानिक अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक समाज उसे सलाम नहीं करेगा। आख़िरकार, कोई ऐसा अन्य सरकारी क्षेत्र नहीं है जिसमें शिक्षकों से अधिक विद्वान हों। यदि आपको विश्वास नहीं है, तो आइए गाँव के अधिकारियों के साथ एक प्रतियोगिता शुरू करें। देखते हैं नगर निगम के कितने कर्मचारी शिक्षकों से टकराने की हिम्मत करते हैं! हाँ, शिक्षक अपनी शक्ति भूल जरूर गया है, जिसका लाभ इन धूर्तों ने उठाया है। जागो शिक्षकों! तुम कब जागोगे? उठो!! साहस करो! चुनौती दो!