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नेपाल, लैनचौर और मधेश

 

रणधीर चौधरी:सीके लाल द्वारा दिये गये विचारों को  एकत्रित कर तैयार किये गये पुस्तक मिथिला मन्थन को पढÞते वक्त उस किताब के अर्न्तर्गत एक शर्ीष्ाक ‘नेपाल-भारत सम्बन्ध’ पर नजर जा टिकी । आगे, मंै इस रिश्ते के बारे मंे नजदीक से पढÞना चाहूँगा । फिलहाल इन दोनों देशों के बीच के सम्बन्धों को इस किताब के माध्यम से रखना चाहूँगा । साथ ही काठमांडू, मधेश और लैनचौर की वर्तमान अवस्था को रखना चाहूँगा ।lainchaur
संक्षिप्त इतिहास जिस वक्त पृथ्बीनारायण शाह द्वारा नेपाल निमार्ण्र्ााकया जा रहा था उस वक्त भारत अंग्रेजो के चंगुल में फँसा हुआ था । भीमसेन थापा भारत के कई राजाओं के साथ मिलकर फिरंगियो को भारत से भगााने के कार्य मंे साथ देने लगे । और उस कदम को अंग्रेजांे ने थोडÞा गंभीरतापर्ूवक ले लिया और नतीजा भीमसेन थापा उस गंभीरता के शिकार होे गये । नेपाल के आन्तरिक राजनीति के प्रभाव के कारण उनको कैद में रखा गया और अंत में परिस्थिति ऐसी आयी कि उनको कैदखाने मे ही आत्महत्या करनी पडÞी । और इस घटना में ब्रिटिश की भूमिका ना होने की कोई वजह दिखाई नही दी । जंगबहादुर के चमत्कारी उदय में भी तत्कालीन ब्रिटिश रेजिडेन्ट की ही भूमिका थी, जिसका ब्याज जंगबहादुर द्वारा चुकाया गया । यह वही घटना है, जिसको भारतीय द्वारा “स्वतन्त्रता सङग्राम” की संज्ञा दी गयी है । सन् १८५७ के संर्घष्ा को अंग्रेजों द्वारा “सिपाही विद्रोह” कहा जाता है । उस वक्त जङबहादुर ने “लोयल टु द ब्रिटिस क्राउन” अंगे्रजों के प्रति अपनी वफादारी दिखायी, और नेपाल ने फलतः एक क्लाइन्ट स्टेट के रूप में काम करना शुरु कर दिया । बडÞा साहेब दिल्ली और कलकता में है, छोटा मालिक इस देश के नियन्त्रण मंे, उस वक्त से नेपाली राज, नेपाली शासन, नेेपाली नेता, नेपाली भाग्य के अन्तिम निर्ण्र्ाार्ता काठमांडू दरबार ना हो कर दिल्ली दरबार और कलकत्ता हो गया ।
अभ्यासतः काठमांडू में मधेसियांे को भारतीय कहना वा भारतीय का संज्ञा देना कोई नई बात नहीं है और नेपाली राजनीति में भारत का रोल प्ले तो र्सवविदित सा ही है । चाहे राणा के विरुद्घ छेडÞा गया आन्दोलन हो या फिर ऐतिहासिक शान्ति सम्झौता हो, सभी मंे भारत का अपना प्रभाव रहा है । नेपाल के लगभग हरेक नेता अपना सम्बन्ध लैनचौरके साथ सुमधुर रखना चाहता है । परंतु अगर कोई भी मधेसी नेता अपना पाँव लैनचौर के र्इद-गिर्द रख दे तो उसे भारतीय दलाल वा “रा” एजेन्ट की संज्ञा देने से काठमांडू पीछे नहीं हटता । रितिक रोशन काण्ड में काठमांडू में मधेसियों को भारतीय  कहकर दर्ुर्व्यहार किया गया । मधेसी व्यापारी हो या तो फिर भारतीय एक ही साथ भैया और धोती कहकर संबोधित करना काठमांडू वासियों के लिये आम बात हो चुकी है । जब कभी भी काठमांडू और देश के अन्य भागांे में राष्ट्रवाद का खोखला नारा लगाया जाता है तो उसमंे विपक्षी भारत को ही बनाया जाता है । और मधेसियांे को भी उस नारे के चपेट मंे ले लिया जाता है ।
सच्चाई तो यह है कि, मधेसी जनता अभी भी राष्ट्रवाद के झूठे और खोखले नारे में विश्वास नहीं रखती । भारत के स्वतन्त्रता दिवस के दिन भारत द्वारा हरेक साल दिये जानेबाले एम्बुलेन्स, बस वितरण समारोह  में उसी राष्ट्रवाद का झूठा नारा लगाने वालों की लम्बी लाइन लगी रहती है । और लेनचौर भी बडÞी शान से वितरण करता है । क्या उस वितरण कार्य से काठमांडू का जो भारत के प्रति नजरिया है, उसमें कोई परिवर्तन देखने को मिला है – सिर्फकाठमांडू ही नहीं लैनचौर द्वारा भी मधेस को एक्सक्लुड किया गया है । मधेसियों को भारत द्वारा फायदा जरूर हुआ है, सीमा से जुटे मधेसियों को रोजमर्रर्ााी चीजंे भारत से सहूलियत दरांे पे मिल जाती हैं । परंतु सारा राजनीतिक फायदा काठमांडू में ही सीमित हो कर रह जाता है । पिछले दशक में देखा जाय तो भारत द्वारा दिये गये  एक भी महत्वाकांक्षी योजना मधेश के हिस्से मंे नही पडÞी है । सारी परियोजना भारत के विरोध में रहने वालों, राष्ट्रबाद का नारा लगाने वालों के हिस्से मे सीमित है । लैनचौर की यह रणनीति नेपाल के ५०% से अधिक बसोबास कर रहे तर्राई/मधेस को सोचने पर मजबूर करती है
भारत के प्रति कहीं ना कहीं मधेशियों की सोच नकारात्मक होती जा रही है । इस ओर लैनचौर का ध्यान जाना आवश्यक है क्योंकि भारत से मधशियों का ही सामाजिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध है । इस नाजुक रिश्ते को मधेश ही निभा सकता है । इसलिए लैनचौर को इस सम्बन्ध को मजबूत बनाने और मधेश के विकास पर ध्यान देना चाहिए । उनकी कूटनीति में मधेश को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए ।

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