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भारतीय अनुदान पर अंकुश की नीति, मधेश पर फिर ग्रहण

 

श्वेता दीप्ति, काठमाणडू ,१५ अगस्त । पुर्व प्रधानमंत्री सूर्यबहादुर थापा के कार्यकाल में भारतीय दूतावास को गाँव गाँव में योजना और अनुदान देने की स्वतंत्रता दी गई । उस समय योजना कार्यान्वयन की राशि सीमा ३ करोड़ थी जिसे प्रचण्ड के प्रधानमंत्रीत्व काल में बढ़ा कर ५ करोड़ कर दिया indian sampark office in Brtगया । सरकार की इस नीति का समय समय पर कुछ ऐसे नेताओं के द्वारा विरोध किया जाता रहा है जिन्हें भारत विरोधी माना जाता रहा है । नारायण काजी श्रेष्ठ और रामशरण महत ये दो नाम ऐसे हैं जिन्होंने भारत द्वारा नेपाल को स्वतंत्र रूप से दिए गए सहुलियत या योजनाओं का हमेशा विरोध किया है । एक लम्बे अंतराल के बाद नेपाल भारत संयुक्त आयोग की बैठक में कई मुद्दे ऐसे आए जिनको सुलझाने की अपेक्षा नेपाल विगत कई वर्षों से करता आया है । किन्तु पहले कोई सकारात्मक पहल नहीं दिखाई दी । पर आयोग के इस बैठक में सुधार की उम्मीद नजर आई है । इसी बैठक में श्रेष्ठ के द्वारा भारतीय दतूावास द्वारा दिए गए प्रत्यक्ष अनुदान की राशि को शीघ्र बन्द करने और विराटनगर में स्थित भारतीय दूतावास के सम्पर्क कार्यालय को बन्द करने की मांग की गई । एक और बात भी उन्होंने उठायी कि सार्वभौम राष्ट्र के सभासद योजना मांगने के लिए भारतीय दूतावास दौड़ते हैं उस पर भी रोक लगनी चाहिए । उनकी इस मांग पर उनका साथ किसी और ने नहीं बल्कि अर्थमंत्री रामशरण महत ने दिया । इनके अनुसार अनुदान की राशि दूतावास की ओर से खर्च न होकर उक्त राशि बजट में शामिल हो और उसे कहाँ खर्च किया जाय यह अधिकार सरकार का हो । किन्तु इस संदर्भ में एक जो बात उभर कर आती है वह यह कि, इस वर्ष जो बजट पारित हुआ और उसमें मधेश के साथ जो सौतेला व्यवहार किया गया तो अगर ऐसी किसी अनुदान की राशि को भी बजट में शामिल कर दिया जाता है, तो जो कमोवेश फायदा मधेश को मिल रहा है, वह भी हाशिए पर चला जाएगा । क्योंकि कोई शक नहीं है कि इन राशियों को भी पहाड के विकास के नाम पर ही खर्च कर दिया जाय या फिर मतभेदों और अकर्मण्यता के बीच अनुदित राशि फ्रिज होने की अवस्था आ जाय । कई एक उदाहरण हैं जहाँ योजनाएँ होती हैं अनुदान की राशि भी होती है पर विरोध और स्वार्थ की राजनीति में विकास अवरुद्ध हो जाता है । इस वर्ष के बजट में भारत की ओर से आनेवाली मालवाहक गाड़ियों पर शुल्क बढा दिया गया है जिससे यह सम्भव है कि राजस्व बढ़ेगा लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव मधेश के हिस्से में ही आने वाला है । कुल मिलाकर अगर देखा जाय तो ऐसे सहयोग राशि से मधेश को जो फायदा मिल रहा है, उसपर भी ग्रहण लगने की अवस्था दिख रही है ।

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