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महिला दिवस… जरुरत है मानसिकता परिवर्तन की

 

काठमांडू, फागुन २५–

कंचना झा
मधु (काल्पनिक नाम ) कहती है कि आज की महिलाओं को लेकर कि अजीब माहौल है आजकल का । महिलाएं कितनी सक्षम हैं इस बात को हम केवल फेसबुक और इस्टाग्राम से समझ रहे हैं । हम और हमारी सोच बदली है लेकिन इसके असर की अगर बात करें तो सकारात्मता से ज्यादा नकारात्मकता की ओर हम बढ़ रहे हैं । महिलाएं आगे बढ़ रही हैं लेकिन इसके लिए वो किसी भी हद तक जा रही हैं यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है । जो महिलाएं अपनी नैतिकता समझ जाती हैं , कि उन्हें गलत रास्ते पर चलकर आगे नहीं बढ़ना है वो बहुत पीछे रह जाती हैं लेकिन कुछ महिलाएं ऐसी हैं कि उन्हें हर हाल में आगे बढ़ना है रास्ता चाहे जो भी हो तो वो उस रास्ते का रुख कर लेती हैं और अपना एक अलग मकाम बना लेती हैं । ये हैं महिला का एक अलग रुप । मैं यह तो नहीं कर सकती कि सभी महिलाएं ऐसी ही हैं क्योंकि मैं भी एक महिला हूँ । कामकाजी हूँ इसलिए बहुत सी महिलाओं के संपर्क में रहती हूँ तो जो देखती हूँ वही कह रही हूँ । बहुत बार ऐसा होता है कि जिनमें क्षमता होती है वह पीछे रह जाती हैं और जिनमें कम वो बहुत आगे निकल जाती है । इस आगे निकलने में वो किस दौर से गुजरती हैं ये केवल वही जानती है । ये भी एक बहुत बड़ी सच्चाई है कि जहाँ आप काम करती हैं वहाँ बहुत शोषण है । लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि हमें काम नहीं करना है ।
नम्रता कर्ण ( रेडियो नेपाल में भोजपुरी समाचार वाचिका हैं ) कहती हैं कि महिला दिवस तो हम सब मना रहें हैं । और बहुत ही खुशी की बात यह है कि पहले की तुलना में सभी हमारी बातों को सुन लेते हैं,महसूस कर लेते हैं । मैं रेडियो नेपाल से हूँ तो इतना तो कह ही सकती हूँ यह एक ऐसी संस्था है जहाँ महिलाओं को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है । अगर आप देखेंगे तो हर विभाग में यहाँ पुरुष से ज्यादा महिला की सहभागिता है । हमारी क्षमता है कि हम स्वयं काम कर सकते हैं फिर चाहे वह कोई काम हो । लेकिन हम महिला हैं इस बात को कई बार महसूस करवा दिया जाता है । इस संस्था की अगर बात कहुँ तो महिला को बहुत समर्थन मिला है आगे बढ़ने के लिए । लेकिन जब और भी कामकाजी महिला मित्र से बात होती है तो वो कहती हैं कि महिला लीड रॉल में बहुत ही कम हैं । आज भी ऑफीस में जब चैंलेंजर सिचुऐंशन आ जाता है तो महिला का चुनाव नहीं किया जात है । उन्हें लगता है कि हम महिलाएं कमजोर हैं और इस तरह की स्थिति का मुकाबला नहीं कर सकती हैं । ये सुनकर अच्छा नहीं लगता है कि आज भी सोच में बहुत ज्याद  परिवर्तन  नहीं हुआ है ।

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इसी बात को जोड़ती हुई अर्चना झा कहती हैं कि दिक्कत वहाँ है कि महिला स्वयं अपनी मानसिकता में  परिवर्तन ला पा रही हैं । उन्हें बहुत आगे जाना है लेकिन सच यह है कि बाहर निकल कर काम करना उतना आसान नहीं है । खासकर मैं परिवेश की बात कर रही हूँ । जहाँ से मैं आती हूँ । बेटियों को पढ़ा लिखा दिया है । वो काम भी कर रही हैं और अब उनके विवाह को लेकर सोचती हूँ तो एक डर सा है मन में कि न जाने कैसा परिवार मिलेगा ? यानी बात फिर वही आकर अटक जाती है कि उनकी सोच क्या होगी ? समय परिवत्र्तन तो वही हो गया जब मेरे पिताजी और माँ ने मुझे पढ़ाया लिखाया । मैंने काम किया । घरवालों का सहयोग रहा लेकिन इसी सोच से परेशान मेरे माता पिता भी थे और आज मैं भी उसी सोच को लेकर परेशान हूँ कि वहाँ के लोग उसे काम करने देंगे या नहीं । यहाँ इस सोच की जो बात मैं कर रही हूँ ये पुरुषों से ज्यादा महिलाओं में देखने को मिलती है । इसलिए मैंने कहा कि महिला स्वयं अपनी मानसिकता में बहुत ज्यादा  परिवर्तन नहीं ला पा रही हैं । उन्हें बहुत आगे बढ़ना है तो इस मानसिकता से निकलना होगा
वैसे तो नारी अपने आप में ही परिपूर्ण है । वह किसी परिचय की मोहताज नहीं है अब और ना ही उसे किसी परिचय में बांधने की आवश्यकता नहीं है । नारी शक्ति, नारी कोमल, नारी कंधा सँ कंधा मिलाकर चलने वाली, नारी घर अंगना, बच्चें ,भाई बहिन सखी सहेली, माता पिता सास ससूर आ पति इतने के बाद भी वो रुकती नहीं है । इसके बाद वो अपना रस्ता, अपने ऑफीस या वहाँ की सम्णूर्ण जिम्मेदारी बखूबी निभाती हुई अपनी अलग पहचान अपना अलग स्थान बना रही है आज की नारी ।
ये वही नारी हैं जिन्हें आज से कुछ वर्षो पहले अबला, असहाय या कमजोर कहा जाता था । हम कमजोर हैं ही नहीं । ये तो एक सोच थी जो हमरो अंदर भर दी गई थी कि हम कमजोर हैं । सच तो यह है कि ईश्वर की सबसे सुन्दरतम रचना हैं हम नारी । नारी एक हैं मगर हमार गुण, हमारी सोच, उसकी अवस्था अलग अलग है ।
हाँ एक सच्चाई यह भी है कि नारी को अभी बहुत संघर्ष करना है । जैसे जैसे समय परिवर्तन हो रहा है उसकी जिम्मेदारियां उतनी ही बढ़ती जा रही है । ऐसा नहीं है कि महिला हिंसा में बहुत कमी आई है या फिर शिक्षा में वह बहुत आगे बढ़ पाई है, या उसका आय आर्जन ज्यादा हो गया है या फिर आज भी महिला बलात्कार का शिकार नहीं हो रही हंै । ये सब मुश्किलें हैं आज भी महिला के सामने । लेकिन आत्मबल, आत्म सम्मान, शिक्षा को अगर नारी पूर्णत हासिल कर लें तो ही आगे बढ़ सकेंगी । आज के माता पिता भी तो बहुत होशियार हो गए हैं । वो बेटा बेटी में भेदभाव नहीं करते । बेटे के साथ अपनी बेटियों के पढ़ाई, उसके करियर के प्रति बहुत सजग हो गए हैं । ये बहुत बड़ा परिवत्र्तन है समाज के लिए, महिला के लिए ।
आज से तीन चार दशक पहले की अगर बात करें तो बहुत सी ऐसी बातें हैं जो हम महिलाएं खुलकर अपने अभिभावक के सामने भी नहीं बोलते थे मगर आज की बात करें तो बेटियां अपनी बातें खुलकर बोलती हैं जो एक सकारात्मक पक्ष है । बेटियों की सोच बहल रही है और उसके साथ ही माँ की सोच भी ।
लेकिन स्कूल टीचर कल्पना का कहना है कि महिला केवल अब घर की होकर नहीं रह गई हैं वो बाहर निकल कर काम भी करने लगी हैं । तरक्की तो हुई है लेकिन बहुत ज्यादा परिवत्र्तन नहीं हो पाया है खासकर महिलाओं की ही सोच में ज्यादा परिवत्र्तन नहीं आ पाया है । उनकी मानसिकता में अभी भी बहुत बदलाव की आवश्यकता है । उनका कहना कि मुझे लगता है फिलहाल हम बहुत सी उलझनों में फंसे हैं कि किस हद तक आगे बढ़े । कैसे अपने साथ सभी को मिलाकर चलें । क्योंकि अलग तो चल नहीं पाएंगे । बिना महिला के सहयोग से पुरुष आगे नहीं बढ़ सकता तो बिना पुरुष के सहयोग नारी कैंसे आगे बढ़ सकती है ? साथ तो चाहिए ही ।

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इसी तरह हर देश के सरकार को भी नियम बनाते समय महिला की समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाने चाहिए । महिलाओं के लिए उसका पहला प्रेम उसका परिवार है जो उसे जोड़कर रखता है घर परिवार,समाज और देश से । उसी तरह जब वह पंख फैलाकर बाहर काम करने को निकलती है तो बहुत आत्म सम्मान और विश्वास से निकलती है । वह और जुड़कर रहेगी देश और समाज से जब उसे पंख फैलाने में सबका सहयोग मिलेगा । सच तो यह है कि हमें घर और ऑफीस दोनों ही प्यारे हैं । हम दोनों को साथ लेकर चलना जानते हैं । वैसे ये सफर आसान नहीं है । लेकिन चलना है,चल रहे हैं और चलते ही रहेंगे ।

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