तमलोपा पर निर्वाचन आयोग का गैरकानूनी प्रहार : सतीश लाल दास

सतीश लाल दास
सतीश लाल दास, जनकपुरधाम । निर्वाचन आयोग का काम है, स्वतन्त्र और निष्पक्ष निर्वाचन कराना । संविधान और प्रचलित ऐन कानून इसे राजनीतिक दलों पर प्रशासकीय भूमिका का अनुमति नहीं दिया है । और, ऐसा होना भी नहीं चाहिए । पिछले दिनों निर्वाचन आयोग कुछ छोटे और नये राजनीतिक दलों पर प्रशासक जैसा व्यवहार करना शुरु किया है । ऐसा लगता है जैसे बड़े दलों के हित में निर्वाचन आयोग छोटे और नये दलों को नेपाल के राजनीतिक और चुनावी परिदृश्य से हटाना चाहती है ।
विगत फागुन १० गते निर्वाचन आयोग ने १९ दलों को जिस में तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी भी शामिल है, किसी कारण के बिना अपना नाम बदलने का निर्देशन दिया है और ऐसा करके ३० दिनों के भीतर आयोग को सूचित करने का आदेश दिया है । अपने आदेश में आयोग ने राजनीतिक दल सम्बन्धी ऐन का दफा ५७ का हवाला दिया है । दफा ५७ पार्टी के कार्यक्रम से सम्बन्धित है, नाम से नहीं । नेपाल के किसी भी कानून में निर्वाचन आयोग को संविधान और प्रचलित ऐन कानून के तहत आयोग में दर्ता राजनीतिक दल का नाम परिवर्तन के लिए निर्देशित करने का अधिकार नहीं दिया गया है । बल्कि संविधान की धारा २७० राजनीतिक दल पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध लगाने की बात पर सीधा बन्देज लगाया गया है । इसमें कहा गया है कि गठित राजनीतिक दल को संचालन करने, दल की विचारधारा, दर्शन और कार्यक्रम प्रति जन साधारण का समर्थन तथा सहयोग प्राप्त करने के लिए प्रचार-प्रसार करने के मामले में कोई प्रतिबन्ध लगाने के हिसाब से बनाया गया कोई भी कानून, की गई कोई भी व्यवस्था अथवा निर्णय इस संविधान के प्रतिकूल माना जाएगा और स्वतः अमान्य होगा ।
तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी निर्वाचन आयोग के २०७७/०८/९ के निर्णय अनुसार २०७८/८/१७ को निर्वाचन आयोग में दर्ता की गई थी । राजनीतिक दल सम्बन्धी ऐन २०७३ और राजनीतिक दल सम्बन्धी नियमावली २०७४ लागू हो गया था । जाहिर है कि २०७७/०८/९ में जब इसे दर्ता करने का आयोग ने निर्णय लिया होगा तो इसकी विधान, घोषणापत्र, चुनाव-चिन्ह और अन्य सब कुछ संविधान तथा अन्य प्रचलित कानून के अनुसार होने के बाद ही निर्णय ली होगी । तो अब कौनसा पहाड़ टूट गया ? किस कारण से पार्टी को नाम बदलने के लिए कहा गया है और पार्टी के नाम के किस शब्द से आयोग को कानूनन आपत्ति या चीढ़ है, उल्लेख नहीं किया गया है । बस नाम बदल कर ३० दिन के भीतर जानकारी देने को कहा गया है । ऐसा निर्देशन राणाकालिन और फिर राजाशाही का हुकुमी आदेश का याद दिला देता है ।
हम अन्दाज कर सकते हैं कि तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी नाम के शब्दों में से आयोग को ‘तराई-मधेश’ शब्द से चीढ़ होगी । ‘लोकतान्त्रिक’ और ‘पार्टी’ शब्द से चीढ़ नहीं होगी – मान लिया जाय । लेकिन ‘तराई-मधेश’ शब्द तो नेपाल सरकार धरल्ले से उपयोग करती है और आगे भी करेगी ही । उदाहरण के लिए तराई-मधेश समृद्धि कार्यक्रम, राष्ट्रपति चुरे तराई-मधेश संरक्षण विकास समिति, काठमाण्डौ तराई मधेश द्रुत मार्ग इत्यादि । मधेशी शब्द का प्रयोग स्वयं संविधान में ही है । धारा २६२ में मधेशी आयोग का संवैधानिक व्यवस्था है । तो फिर अगर तराई-मधेश शब्द संविधान और किसी ऐन-कानून के प्रतिकूल है तो निर्वाचन आयोग नेपाल सरकार सहित औरों को भी ऐसा निर्देश जारी करे । संविधान में ही संशोधन की बात करे । जब आयोग क्षेत्राधिकार न होते हुए भी तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी सहित अन्य १८ पार्टीयों को ऐसा निर्देश दे सकती है तो फिर कहीं भी कभी भी कुछ भी लिख तो सकती ही है ।
‘तराई-मधेश’ शब्द क्षेत्र विशेष का अर्थ देती है और क्षेत्र का संघीय संरचना में सर्वाधिक महत्व है । यह स्वशासन का एक इकाइ है । क्षेत्र नहीं रहेगा तो फिर कैसी संघीयता ? आखिर स्वशासन कहाँ होगी ? अगर सही कहा जाय तो ऐसा सोच प्रतिगामी है । यह संविधान और संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के खिलाफ है । किसी राजनीतिक दल के उपर गैरकानूनी आक्रमण बहुदलीयता के विरुद्ध भी है । निर्वाचन आयोग जैसे आयोग में ऐसा सोच का प्रवेश संघीयता, लोकतन्त्र और विधि के शासन के लिए चिन्ता की बात है । ऐसा सोच भेदभावजनित और सम्प्रदायिकता की बू देनेबाली है जिसे बिना लागलपेट के महशूस किया जा सकता है ।
किसी भी पार्टी का नाम परिवर्तन करने का अधिकार सिर्फ व सिर्फ सम्बन्धित पार्टी की ही होती है । अगर आयोग को ऐसा कोई अधिकार है तो वह खुदबखुद नाम परिवर्तन कर सम्बन्धित पार्टी को जानकारी करा दे ।
तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के लिए इसका वर्तमान नाम महत्वपूर्ण है । जब मधेश से उभरा तमाम पार्टीयाँ और उसके शिर्ष नेतृत्वगण मधेश आन्दोलन के एजेन्डा के साथ-साथ अपने नाम से भी मधेश शब्द को हटा कर घुटने टेक दिए थे तो तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी आगे आई । इसी नाम से स्थानीय और आम चुनाव में सहभागी भी हुई । अपने विचार और सोच को इसी नाम से आगे रखती आई है । जब पूर्व राष्ट्रपति विद्या भण्डारी ने दोनों संसद से पारित नागरिकता विधेयक प्रमाणित नहीं कर बस्ते में बन्द कर दिया था तो इसी नाम से पार्टी विधेयक के स्थिति के बारे में आवाज उठायी थी और नेपाल सरकार, संघीय संसद और तमाम लोगों का ध्यान आकर्षित किया था । अन्ततः सम्माननीय राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने इसे प्रमाणित कर संसद की सर्वोच्चता को सही मार्ग पर ला कर फिर से अवस्थित किया था । तराई-मधेश शब्द लोगों के पहचान से सम्बन्धित है । इस पर आक्रमण तराई-मधेश के तमाम लोगों का अपमान है । चाहे कुछ भी हो जाये हम इसके लिए लड़ेंगे और यह एक महत्वपूर्ण लड़ाई होगी । समानता, संघीयता, लोकतान्त्रिक मूल्य के लिए लड़नेबाले सभी को इस संघर्ष के समर्थन में उतरना चाहिए ।
तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी न्याय के लिए सम्मानित सर्वोच्च अदालत के शरण में गई है । सर्वोच्च अदालत ने विषय की गम्भीरता को महशूस किया है और तमलोपा की रीट निवेदन पर विचार करते हुए निर्वाचन आयोग पर अल्पकालिन अन्तरिम आदेश जारी करते हुए कारण बताओ का नोटिस दिया है । हमें पूरा विश्वास है हमें न्याय दिया जाएगा ।

