स्काटलैण्ड और मधेश : डा. सी.के.राउत (विराटनगर जेल से)
रंगेली में करीब ५००० की सांस्कृतिक जनसभा को संबोधित करके लौटते समय शाम साढे सात बजे पुलिस द्वारा मुझे गिरफ्तार किया गया । गिरफ्तारी के बाद सार्वजनिक अनुसंधान के सिलसिले में गिरफ्तारी का पुर्जा मिला । मैं स्वतंत्र मधेश के लिए लड़ रहा हूँ यह बात किसी से छिपी नहीं है । किन्तु संजाल द्वारा कई भ्रामक अपवाह फैलाया जा रहा है ।
इसी आश्विन २ गते विलायत से अलग होने के लिए स्काटलैण्ड में जनमत संग्रह हुआ । अगर देश से अलग होने की बात राष्ट्रद्रोह है ता ेस्काटलैण्ड की सभी जनता को जेल में भर देना चहिए । देश से असंतुष्टि की हालत में अलग होने के अधिकार को निषेधित और आपराधिक बिषय वस्तु मानने वाले नेपाली समाज कोअपनी आँखें खोलकर और संकीर्णता से बाहर निकलकर सोचने का समय आ गया है ।
संसार परिवत्र्तनशील है । देश की सीमा या देश ब्रह्मा ने नहीं बल्कि व्यक्ति ने बनाया है । राज्य का निर्माण मानव ने किया और आज भी आवश्यकतानुसार किया जा रहा है । स्काटलैण्ड अलग देश बने या ना बने यह दूसरी बात है, किन्तु इसके लिए जनमत संग्रह करवाना एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जो नागरिक सर्वोच्चता का उदाहरण है । इस प्रकरण से नेपाली राज्य और समाज सीख लेगा और अपनी मानसिकता साकारात्मक बनायेगा ऐसा मुझे विश्वास है ।
अगर तुलनात्मक रूप से देखा जाय तो स्काटलैण्ड और मधेश किसे अलग होना चाहिए,
(क) क्या स्काटलैण्ड में ९५ प्रतिशत बाहरी सेना है ? या उन्हें सेना में निषेध किया गया है ?
(ख) स्काटलैण्ड में कितने प्रतिशत बाहरी शासक आकर वहाँ की जमीन कब्जा किए हुए हैं और बसे हुए हैं ।
(ग) स्काटलैण्ड का कितना आर्थिक दोहन हुआ है ।
(घ) वहाँ की जनता के प्रति राष्ट्रीय नीति कितनी विभेदपूर्ण है ? उनका प्रतिनिधित्व कितना असमान है ?
(ङ) क्या वहाँ की जनता का अस्त्वि संकट में है या भुखमरी और गरीबी का शिकार है ?
(च) क्या वह विलायत से इसलिए अलग होना चाहता है कि वह विलायत के साथ कम समय से है और मधेश ज्यादा समय से नेपाल के साथ है ।
उपर की बातों पर अगर ध्यान दिया जाय तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि अलग होने की ज्यादा आवश्यकता किसे है मधेश को या स्काटलैण्ड को ।
मधेश में बाहरी सेना है और जगह जगह बैरक लगाकर बसे हुए हैं और अपना औपनिवेश कायम किए हुए हैं । मधेश में जो सेना है वह मधेश की नहीं है बाहर की है । इस संदर्भ को भारत के साथ तुलना कर के देखें तो जितनी सेना मधेश में बाहर की है उससे कहीं कम अंग्रेज की सेना भारत में थी फिर भी वहाँ अँग्रेजी औपनिवेश कायम हुआ । और मधेश में ९५ प्रतिशत बाहरी सेना है तो इसे क्या कहा जाय ? नेपाली राष्ट्रवादियों को यह समझने में कठिनाई हो रही है । उन्हें यह विचार करना चाहिए कि अगर नेपाल में भारत, चीन, या अमेरिका की सेना बैरक बना कर रहे और उसमें नेपालियों का प्रवेश निषेध हो तो उसे क्या कहेंगे स्वतंत्र देश या उपनिवेश ?
उपनिवेश का शाब्दिक अर्थ होता है कि एक जगह का व्यक्ति दूसरी जगह जाकर रहे । भारत में अँग्रेजों की संख्या जितनी थी उससे कहीं अधिक मधेश में पहाडियों की है । अगर उतनी कम संख्या वाले अँग्रेजों को वहाँ उपनिवेश कहा गया तो मधेश में क्यों नहीं जहाँ १९५१ में ६ प्रतिशत पहाडी थे और यह तीव्र गति से बढकर आज ४० प्रतिशत के करीब हो गया है । इस पर जरुर विचार करें कि यह कैसा औपनिवेश है । इस् तीव्रता को न तो माइग्रेशन कहा जा सकता है और न ही डायवर्सन के आधार पर और न ही पहाडियों के आर्थिक, समाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक चरित्र के आधार पर । माइग्रेशन अगर होता तो इसी अनुपात में मधेश से पहाड की तरफ भी यह संख्या बढती पर यह एकतरफा है । जिसका परिणम यह हो रहा है कि मधेशी विस्थापित हो रहे है. उन्हें अपनी ही भूमिहीन कमैया और कमलरी बन कर रहना पड़ रहा है ।
तीसरी बात यह कि नेपाल को सबसे अधिक राजस्व मधेश से प्राप्त होता है, पर इसका कितना भाग मधेश में निवेश किया जाता है । अभी के बजट में भी मधेश को क्या मिला ? यही उपनिवेश की आर्थिक नीति होती है । सरकार द्वारा उपनिवेश से आमदनी, राजस्व और लगान उठाना, संकलन करना और अपने क्षेत्र में लगाना । वर्षों से उपेक्षित हुलाकी मार्ग आज तक नहीं बना जबकि पहाड पर फास्ट ट्रैक रोड बन रहा है । हमारे जंगल, जमीन, जल सभी का दोहन हो रहा है । जंगल काटकर लकड़ी भारत को बेचा जा रहा है । पानी बेचा जा रहा है और प्रार्कतिक आपदा का शिकार मधेश हो रहा है । मधेश को विनाश की ओर धकेला जा रहा है । क्या स्काटलैण्ड में भी ऐसा ही हुआ है ? मधेशियों का प्रतिनिधित्व सरकारी निकाय में न्यून है, हर क्षेत्र में विभेद है क्या यही सब स्काटलैण्ड में भी है । इतना ही नहीं यहाँ तो मधेशी रंगभेद का भी शिकार हैं और इसका पछतावा कभी यहाँ के नेपाली समाज को नहीं हुआ है ।
मधेश अन्न का भण्डार है लेकिन वहीं भुखमरी है, बच्चे कुपोषण के शिकार हैं महिला रक्त अल्पता की शिकार है । इस तरह मधेश जिस त्रास में जी रहा है क्या यही त्रास स्काटलैण्ड में भी है ? नेपाली समाज अलग मधेश की बात को यह कहकर स्वीकार नहीं करता कि मधेश हमेशा से नेपाल का अंग रहा है पर ऐसे लोगों से मैं अनुरोध करता हूँ कि वो इतिहास की जानकारी रखें । पूर्वी मधेश(कोशी से राप्ती) केवल सन् १८१६ में मात्र दो लाख रु. में अँग्रेजों ने नेपाल को दिया था । और पश्चिम मधेश (राप्ती से महाकाली) सन् १८६० में अँग्रेजों ने उपहारस्वरुप दिया था । जाहिर है कि मधेश की मर्जी के बिना मधेश का विलय हुआ । इस तरह महज १५०-२०० वर्ष पहले मधेश नेपाल का हिस्सा बना वह भी बिना मर्जी के जबकि स्काटलैण्ड ३०० वर्षों से विलायत का हिस्सा है फिर भी अलग होना चाहता है ।
इन बातों को देखते र्हु अनुमान लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता की किसे ज्यादा आवश्यकता है । स्वतंत्रता नैसर्गिक अधिकार है और यह कभी भी अनुचित नहीं होता है । मधेश ने २०० वर्षों से धैर्य रखा है । अपने अस्तित्व को लुटाकर नेपाली साम्राज्य का पालन पोषण किया है और आज अपनी अंतिम साँसें ले रहा है इसलिए आज उसे स्वतंत्रता की प्राणवायू की आवश्यकता है ।
यह कोई दो समुदायों के बीच का द्वन्द्ध नहीं है, यह मधेशी पहाडी, नेपाली के बीच का द्वन्द्ध नहीं है । मधेश औपनिवेश बन कर रहना चाहता है यह स्वतंत्र सवाल इसका है । स्वतंत्रता का यह संघर्ष केवल मधेश की जनता का नहीं बल्कि नेपाली शासक वर्ग का है । नेपाली शासक द्वारा लादा गया उपनिवेश और विभेद का प्रायश्चित मधेश की स्वतंत्रता है और आपसी समझदारी, शांतिपूर्ण और अहिंसात्मक तथा आपसी सद्भाव से मधेश को उसका अधिकार उसकी स्वतंत्रता उसे देनी होगी । मैं नेपाली जनता की अन्तरात्मा पर भी विश्वास रखता हूँ कि वो भी मधेश का साथ देंगे, सत्य, शांति और न्याय का साथ देंगे ।
(स्काटलैण्ड और मधेश – डा. सी.के.राउत, विराटनगर जेल, २०७१ भाद्र ३१ गते ।) अप्रकाशित लेख , मुल रचना नेपाली से हिन्दी मे अनुवाद । स.

