Sat. Feb 29th, 2020

हम रहें ना रहें किन्तु हमारे विचार सदैव जिन्दा रहेंगे : डा. राउत

ck raut i scश्वेता दीप्ति ,काठमाण्डू, डा. राउत ने कहा कि हम रहें ना रहें किन्तु हमारे विचार सदैव जिन्दा रहेंगे । सच ही है जो दस्तावेज उन्होंने दिया है वह युगों तक उनका प्रतिनिधित्व करेगा क्योंकि साहित्य और इतिहास कालजयी होते हैं । परन्तु यह भी कटु सत्य है कि उसकी अहमियत तत्काल समझ में नहीं आती । कभी कभी इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं, जब जीवन के किसी  मोड़ पर देखी सुनी या पढ़ी रचना मूर्त हो जाया करती हैं और सामयिक तथा प्रासंगिक हो जाती हैं । बातें साहित्य की जरुर हैं पर यह भी सच है कि साहित्य समाज का ही होता है, जिससे जीवन को नई दृष्टि मिलती है, अनुभवों को नया आयाम मिलता है । आज देश के सामने एक ऐसा व्यक्ति सवाल बन कर खड़ा है जिसका जवाब बहुत आसान है, परन्तु उस जवाब को रोज विस्तार के साथ साथ विकृति भी मिल रही है । आज इसी सन्दर्भ में एक कविता की चर्चा करने का मन किया है । प्रोमेथियस अनवाउंड प्रसिद्ध कवि शैली की एक अमर कविता है । इस यूनानी पुराण कथा का नायक प्रमथ्यु है जो जुपीटर या स्वर्ग के देवता के महलों में बन्दी अग्नि(प्रकाश) को चुराकर पृथ्वी पर ले आता है ताकि पृथ्वी के साधारण जनों के जीवन में समाया अंधकार दूर हो सके ।

देवता की नजरों में यह एक जघन्य अपराध था और इसलिए इसकी सजा भी उसे मिलनी तय ही थी । फलतः स्वर्ग के देवता ने उसे बेड़ियों में जकड़कर एक विशाल शिलाखण्ड से बंधवा दिया और उस बूढे गिद्ध को जिसने अग्नि लाने के लिए प्रमथ्यु को उकसाया था, इस कार्य पर लगा दिया कि वह प्रमथ्यु के कंधे पर बैठकर उसका हृदय नोचता रहे और साथ ही सजा की निरन्तरता बनाए रखने के लिए यह वरदान भी दिया कि हृदयपिण्ड का घाव भरता भी जाएगा अर्थात् एक अन्तहीन दण्ड की यन्त्रणा भोगने के लिए उसे शापित भी कर दिया गया ।

यह दृश्य जनसाधारण के लिए एक कौतुक भरा दृश्य था । भीड़ हर रोज लगती और इस लोमहर्षक दृश्य को देखती । हृदय का नोचा जाना और उसका भरा जाना उनके लिए महज एक कौतुहल का विषय था उसमें कोई संवेदना प्रमथ्यु के लिए नहीं थी । यह संदर्भ आज के परिदृश्य को व्याख्यायित कर रहा है । एक व्यक्ति ने यह दुःस्साहस किया है कि मधेश के हित के लिए जो रोशनी बरसों से तथाकथित देवताओं के महल में कैद है उसे उनकी कैद से जनसाधारण तक पहुँचाया जाय । इस दुःसाहस को भला देवता कैसे सहन करेंगे तो सजा तो मिलनी है, ऐसे में मधेश के जिस दर्द ने उन्हें उकसाया वही नासूर बनने की स्थिति में है और हम तमाशबीन हैं —

हम सब करिश्मों के प्यासे हैं

चाहता अगर तो हममें से हर एक व्यक्ति

अपने साहस से प्रमथ्यु हो सकता था

लेकिन हम डरते थे

ज्योति चाहते थे

पर दण्ड भोगने से डरते थे ।

आज भी मधेशी जनता के प्रतिनिधि सत्ता के खेल में मशगूल हैं । न जाने कब जनता का उन्हें ख्याल आएगा और खुलकर सामने आएँगे । उन्हें इतिहास पुरुष बनना है या भीष्म पिता की तरह मूक दर्शक ये तो उन्हें ही तय करना होगा ।

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