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हिंदी कविता को सहजता प्रदान करनेवाले साहित्यकार पद्मश्री विष्णु पण्ड्या की काव्य संग्रह अब मराठी में



” क्षण,समय और …..” काल को परिभाषित तथा अनंत की निरंतर खोज करनेवाली पद्मश्री.विष्णु पण्ड्या जी की कविताएं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आत्म खोज़ के लिए प्रेरित करती हैं।इस काव्य संग्रह का अब मराठी में अनुवाद मनीषा खटाटे ने किया हैं और प्रकाशन वर्ल्ड क्रिएटिव्हिटी फोरम (प्रकाशक -डाॅ.राजेंद्र खटाटे ) भारत ने किया हैं।
पद्मश्री विष्णु पण्ड्या का यह हिंदी भाषा में पहला ही काव्य संग्रह हैं परंतु वह अपने आप में सहजता की अद्वितियता रखता हैं।गुजराती भाषा में पद्मश्री पण्ड्या ने करीब देड सौ किताबे लिखी हैं।”अंतिम अध्याय” नामक उपन्यास जो सुभाष बाबू के उपर लिखा हैं वह एक चर्चित उपन्यास हैं।
विष्णु पण्ड्या पद्मश्री,डी लिट्ट,पूर्व अध्यक्ष गुजरात साहित्य (गुजराती,हिन्दी,संस्कृत,सिंधी,कच्छी,उर्दू )अकादमी (२०१७ – २०२३) रह चूके हैं। १५४ पुस्तकें (स्वातंत्र्य इतिहास,पत्रकारिता,उपन्यास,कविता,जीवनी,राजनीतिक समीक्षा,अनुवाद,स्मृति कथा )1975 में आपातकाल और सेंसर शिप के खिलाफ़ अपनी पत्रिका “साधना “के माध्यम से संघर्ष और मीसा कानून के अंतर्गत एक वर्ष का जेल वास. 7 काॅलेज़ो में गुजराती साहित्य और पत्रकारिता का अध्यापन।विविध गुजराती अंग्रेजी हिन्दी अख़बारों में स्तंभ लेखन. वर्तमान अध्यक्ष,गुजरात इतिहास संशोधन केन्द्र. महा मंत्री,विश्व गुजराती समाज। अटल बिहारी वाजपेई पर दीर्घ दस्तावेज़ी फ़िल्म में संवाद लेखन और साक्षात्कार।सोमनाथ देवालय में लाइट एंड साउंड की स्क्रीप्ट. क्रान्ति तीर्थ,कच्छ के म्युझीयम और लाइट एंड साउंड का लेखन,सरदार पटेल स्टॅच्यू म्युझीयम का आलेखन,स्थानिक इतिहास पर गुजरात के ४० स्थानों पर सांस्कृतिक मेगा इवेंट शो किये हैं।
हिंदी समीक्षा-मनीषा खटाटे
मार्च २४ में “क्षण,समय और…..” यह पद्मश्री.विष्णु पण्ड्या जी के काव्य संग्रह का विमोचन दिल्ली में हिंदी साहित्य भारती के राष्ट्रीय अधिवेशन में हुआ।भारतीय साहित्य में पद्मश्री.विष्णु पण्ड्या जी एक ऐसा नाम हैं जिनकी सशक्त लेखनी ने इतिहास के अनगिनत पहलूओं को छूकर सत्य का दर्शन करवाया हैं।अपने शब्दों से काव्य को भी असीम तथा समयातीत लेकर जाते है और सत्य का एक ऐसा विराट दर्शन करवाते है जो अध्यात्मिक ऊँचाईयों को स्पर्श कराता हैं।इस काव्य संग्रह की कविताएं पढ़ना सिर्फ आनंद की अनुभूति ही नहीं हैं अपितु स्व को उपलब्ध होने की अनुभूति भी हैं।
अध्यात्मिक अनुभूति को अगर साधना हैं तथा विराट सत्य का दर्शन करना हैं तो मनुष्य को प्रकृति के पास जाना पड़ेगा……प्रकृति के हर एक -नित्य नूतन प्रतिमाओं के दर्शन की छवियाँ मनुष्य की चेतना को आत्म खोज या स्वयं की खोज के लिए प्रेरित करती हैं…..अवचेतन में ऊतरकर आत्मा की गहराईयों को छूकर जो आत्म प्रस्फूटन शब्दों को पकड़कर अनंत समय को क्षण में बांधने की संभावना पद्मश्री.पण्ड्या जी की काव्य प्रतिभा में काल की एक निरंतर धारा की तरह बहकर महासागर को मिलने के लिए ऊमड़ती हैं।
यह कोई समीक्षात्मक चिंतन नही है परंतु कविताओं को पढ़ते हुए मेरा कविताओं के साथ जो भावनिक सुसंवाद हुआ हैं उसको मैं अपनी शब्दों में पिरोएं रहीं हूँ।” क्षण,समय और …….” इस काव्य संग्रह में अठ्ठाईस कविताओं की मौक्तिक माला हैं और ग्रिफिन प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है तथा मौसमी सचदेव ने कलात्मक अंदाज मे प्रस्तुत किया हैं।हर एक अपने आप में स्वयं सिद्ध हैं तथा काल के भूत – वर्तमान और उसके अनंत होने की संभावनाओं के बीज़ पाठकों के हृदय में डालती हैं और काव्य संग्रह की अंतिम कविता पढ़ते समय हम यह अनुभव करते हैं की कविताओं के शब्दों ने ऊंगली पकड़कर एकांत की अंतर्यात्रा समय पर सवांर होकर करवायी हैं……
“मुझे भी कुछ कहना हैं….इस कविता से इस काव्य संग्रह का आरंभ होता हैं जिसमे कवि कहता हैं की हाँ,मुझे भी कुछ कहना है, सुनोगे? तपते हुए सूर्य का तुम तो दोस्त हो,मेरे लिए एक दिन ! जैसे ही निशा को चाँद और सितारे, और आकाशगंगा भी दृढ आलिंगन में बाँध लेते है…..तथा ” गिरनार ” जैसी कविता संपूर्ण नाथ जोगियों का योग आंदोलन को ही प्रस्तुत करती हैं…..गिरनार पर्वत तो स्वयं मच्छेंद्र,गोरख और दत्तात्रेय की गुरु परंपरा की महान दास्तां सूना रहां हैं…..नाथ संप्रदाय ने दत्तात्रेय को गुरु मानकर शाक्त और वैष्णवों को भी अपने आंदोलन में शामिल कर दियां और गिरनार इसका साक्षी बना हैं। तिबेटियन बुद्धिझम (वज्रयान शाखा ) से प्रस्फुटित होनेवाली धारा ने तथा नवनाथ और चौ-याशी सिद्धों ने सभी धार्मिक,अध्यात्मिक मतों को अपने आंदोलन में शामिल कर दिया और गोरखनाथ अपने युग के महान आचार्य थे और गिरनार इसका साक्षी बना हुआ है……गिरनार की हर पत्थर पर इतिहास के पदचिन्ह अंकित हैं……।
कवि कहते है की …….” मोहोरे कलियुं माणतो मर्यो रा’खेंगार!’ और फिर दूसरी फटकार- “ऊँचो गढ़ गिरनार, वादळ थी वातु करे, मरता रा’खेंगार खरेडी खांगो नव थियो ?” करोड़ वर्ष पर तुमने भी पाया हाहाकार विनाशिनी शिलाओ टूटती, गिरती, पुण्य प्रकोप को व्यक्त करती हुई,कौन रोक पायेगा इस अवधूत के तांडव को? राणक ने ही, माँ के हृदय को व्यक्त कियाः “माँ पड मारा आधार, चोसला कोण चडावशे गया चड़ावणहार.जीवतां जातर आवशे!’ आज रूक जाता है आरोहक “राणक ना थापा” के पास. लेकिन इतिहास ?…….”
गिरनार तो इस ऐतिहासिक तथ्य का भी हैं की कैसे गोरखनाथ ने भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि भी तैयार की और सनातन धर्म की रक्षा की….।
” एक नौका शब्द की ….” इस अंतिम कविता में कवि आगे कहते हैं की ” तुम लिखो, तुम स्वयं लिखो अपनी कविता, अपनी कहानी, और अपना इतिहास भी.” शब्दों के साथ अगर आत्म अनुभूति के साथ यात्रा करते है तो इस भवसागर के पार मुक्ति की ओर मनुष्य जा सकता है….।
पद्मश्री. विष्णु पण्ड्या जी भारतीय साहित्य,संस्कृति और सनातन चिंतन धारा के पुरोधा हैं जो भारत तथा विश्व साहित्य में साहित्यकारों के लिए एक प्रेरणा बने हैं।यह काव्य संग्रह उनके जीवन दर्शन तथा प्रकृति के साथ जो उनका निरंतर सुसंवाद चलता है उसको ही प्रतिबिंबीत करता हैं……। यह काव्य संग्रह वस्तुनिष्ठता और वास्तविकता का दार्शनिक परिचय हैं जिसको कवि ने अपनी व्यक्तिपरक रुप में जिया हैं और अनुभव किया हैं…..। मनुष्य के व्यक्तिपरक अनुभव जब आत्म खोज के लिए प्रेरित करते हैं,जीवन के अनुभव चेतना को सत्य के प्रकाश से प्रकाशित करके अनुभवकर्ता को विराट की अनुभूति करने की क्षमता प्रदान करती हैं तब “क्षण,समय और ……” जैसी महान काव्य कृति जन्म लेती हैं अपितु इस काव्य संग्रह को आत्म खोज के लिए हर एक पाठक ने पढ़ना चाहिए.



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