जेठ १९ और नारायणहिटी दरबार कब्जे की अवधारणा, एक कोरी कल्पना : कैलाश महतो
कैलाश महतो
हिमालिनी अंक जून 2024 । संयोग से जेष्ठ १९ के दिन हम भी काठमाण्डौ में ही थे । काम के आपाधापी और कुछ समूहों से तय कार्यक्रमों में दिन भर व्यस्त रहे । तकरीबन ३ः४५ के समय में केशर महल और नारायणहिटी के बीच वाले रास्ते से हम भी गुजरे थे । उस समय वहां किसी प्रकार की चहलपहल नहीं थी । कामों को निपटाकर काठमाण्डौ से वापस लौट जाने के बाद मेरे ध्जबतकब्उउ पर राजावादी एक सुरेश साह नामक मित्र द्वारा भेजे गये ‘भर्खरै राजावादीले गरे नारायणहिटी कब्जा….’ शीर्षक का एक भीड़युक्त भीडियो को देखे । भीडियो में सुरेश साह जी के साथ दो तीन मधेशी युवा, रविन्द्र मिश्र, दुर्गा प्रसाई और पूर्व युवराज पारस जी भी शामिल दिखे । भीड़ की माने तो वह राजा बीरेन्द्र के साथ उनके खास वंश विनाश के दुःखद घटना वाले दिन पर याद और दीप प्रज्ज्वलन करने लोग नारायणहिटी दरबार पहुंचे थे । मगर यह भी तय है कि मधेश पर राजतन्त्र द्वारा छोड़े गये आततायी विभेद, दमन, शोषण और दोहन को मधेशी आज भी यादों में कैद कर रखा है । दो चार मधेशियों के ठेकेदारी से बिना निष्कर्श मधेशी राजतन्त्रात्मक नहीं बन सकता ।
भीड़ में कुछ नेवार, कुछ जनजाति के साथ पुराने राजावादियों के साथ ज्यादा उन्हीं वंशावली के लोग दिख रहे थे, जिन्हें कभी राज दरबार और उसके परिवारों ने खूब मलजल के साथ सुरक्षित पनाह दी थी । दुर्भाग्य से उसी पनाहित और संरक्षित नश्लों ने राजा और राजदरबार को भी समाप्त किया । हम खुलकर कहें तो यह वो वंश है, जो न अपना घर का कोई ठोस आधार बनाता है, न किसी का घर बनने देता है । उस वंश का फैलाव आज पूरे दुनिया में फैल रखा है । मौके के अनुसार वह दुनिया के हर वर्ग और समुदाय को अपना मानता है, या उसके अनुसार अपने को ढाल लेता है और अवसर पाते ही उसे बर्बाद भी कर डालता है । शायद यही कारण है कि अमेरिका द्वारा जापान पर बदले स्वरूप दो बमों से किये गये आक्रमणों के बाद ब्रिटेन ने बोला था कि दो बमों के आक्रमण से जापान केवल दो शहरों के साथ कुछ दशकों या शताब्दियों के लिए तबाह हुआ है । जापान को समूल नष्ट करने के किए अमेरिका को केवल दो चार ब्राम्हणों को जापान भेज देना चाहिए था । अमेरिका आज अपने देश में सबसे ज्यादा परेशान वहां प्रवेश ब्राम्हणों से ही होने की खबर है ।
रविन्द्र मिश्र ने नेपाल में राजाओं की शासनावधि को दिखाते हुए राजा और राज परिवार को बचाने की दलील दी है । बीबीसी जैसे एक स्वच्छ और स्वतन्त्र मीडिया में दशकों काम करने वाले नामूद पत्रकार और संवाददाता के इतने पूर्वाग्रही होने के कुछ कारणों में संभवतः यह हो सकता है कि लोकतान्त्रिक परिदृश्य में अपने को राजनीति में सेट करने में असफल होने के कारण देश में एक तिकड़मकश मुद्दे के छाये में राजावादी बनकर सत्ता का स्वाद लेने के ताकझांक में हों ।
उन्होंने राजा द्वारा देश निर्माण करने, दुनिया के राजनीतिक मैदानों में नेपाल का नेतृत्व अव्वल रहने और देश में शान्ति, विकास और सामाजिक सौहाद्रता कायम होने का इतिहास दर्शाया । वैसे तो कालान्तर में उनके पूर्खे लोग मधेशी ही होंगे । मगर अब वो खांटी नेपाली बन चले हैं । चौहान, सेन, अमात, गिरी, पाठक, त्रिपाठी, आदि ऐसे बहुत जाति के मधेशी लोग भी आज अपने को मधेशी मानने से इंकार करते हैं । जनकपुर के धरती से नाम और प्रसिद्धि पाने वाले कैलाश सिरोहिया भी अपने को मधेशी कहलाने से हिचकते हैं । उनके पक्का नेपालित्व के आड़ को नागरिकता मामले में सरकार ने उन्हें उनकी हैसियत दिखा दी । किसी मु्द्दे में सिरोहिया पुत्र को भी मामा घर देखना तय है । उसी मामा घर में पिता जैसे ही उसे भी बीमार होने का सर्टिफिकेट पेश करना होगा ।
यह लेख लिखने का खास मकसद केवल इतना है कि महोत्तरी और जनकपुर से कुछ मधेशी युवाओं को भीड़ में घुसाकर उसका विचार अपने राजावादी पत्रकार से प्रश्न करवाना कि मधेश तराई राजा को कैसे किस रूप में देखता है, और बना बनाया जबाव भी राजापक्षी होना आश्चर्य की बात है । हम भी उसी जनकपुर और महोत्तरी से सम्बन्ध रखते हैं । यह जानकारी कमोवेश हमारे पास भी है कि राजशाही का नेपाल में, और खास कर मधेश में क्या और कितनी हैसियत और आवश्यकता है ।
दुर्भाग्य है कि कुछ रेडिमेड राजावादी लोग अपने निहित लाभ की खातिर राजा को देश का अन्तिम सत्य और विकल्प मानते हैं । उसी राजशाही ने मधेशियों को राजकाज, शासन, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य से वंचित नहीं रखा था ? राज्य के मूल धार और शासन चक्र से समस्त मधेशी, पहाड़ी आदिवासी, जनजाति, दलित और पिछड़े वर्ग को बाहर नहीं रखा ? उनके साथ बेइमानी, दुर्व्यवहार, असमान व्यवहार, अनादर, बेइज्जती, दोहन नहीं की गयी है ? उस राज संस्था और उसके सरकार ने मधेशियों के साथ विभेद किया है या नहीं ? इन बातों से मधेशी युवाओं को साक्षात्कार होना होगा ।
वैसे हम किसी वाद, परिवार, समुदाय, समाज, जात, धर्म और संस्कृति के विरुद्ध नहीं हैं । मगर जिन धर्मों ने, जिन समाजों ने, जिन परिवारों ने मधेश और मधेशियों के साथ अन्याय और अत्याचार किया है, उसके पक्ष में होना या उसके पक्ष में सकारात्मक होना साक्षात दलाली और व्यक्ति पूजा है । यह किसी भी मायने में जनहित की बात नहीं हो सकती ।
हमारे लिए राणा, पंचायत, प्रजातान्त्रिक व्यवस्था, राजतन्त्र, लोकतन्त्र और गणतन्त्र किस काम के ? हमने राजा को ईश्वर माना । मगर क्या कोई ईश्वर अपने ही जनता पर दोहरी नीति वाला व्यवहार करेगा जैसा दशकों से राजाओं ने मधेश के साथ किया है ?
मधेशी युवाओं को राजावादी बनने से पहले इस इतिहास को जानना होगा कि मधेशी लोग जितना राजावादी हुए हैं, उसके दश प्रतिशत भी राजा मधेशवादी और समग्र जनवादी हो गये होते, तो आज राजा की स्थिति पहले से मजबूत होती । आज भी पूर्व राजा और राज परिवार समस्त जनप्रमी होने का दावा कर लें, समान और समतामूलक पद्धतियों के आधार पर क्षमा और सपथ लें, तो मधेश के लिए राजा भी स्वीकार्य हो सकता है ।
पूर्व राजा और राज परिवार सार्वजनिक रूप से राजा और राज परिवार द्वारा प्रताडि़त और अपमानित किये गये सम्पूर्ण समुदाय से क्षमा मांगते हुए अब आइन्दा किसी भी क्षेत्र, जाति और सम्प्रदाय के साथ कोई विभेद न होने की ग्यारण्टी हो, तो मधेश आज भी राजावादी बनने को तैयार हो सकता है । मगर मधेशी लगायत देश मे सम्पूर्ण पीडि़त, उत्पीडि़त, दमित जन समुदायों को देश के राजनीति में पूर्ण समानुपातिक पहुंच और प्रतिनिधित्व की सार्वजनिक कराने की घोषणा होनी चाहिए ।
जेठ १९ की जो भीड़ नारायणहिटी दरबार के बाहर और परिधि में दिखायी गयी है, हकीकत में वह कोई समाज नहीं, एक भीड़ है । समाज समुदाय के लिए, राष्ट्र के लिए और पूरे मानवता के लिए सोचता है, वहीं भीड़ ज्यादातर अपने स्वार्थ और लाभ के किए काम करता है । भीड़ के हर व्यक्ति की अपना सीमित चाहत होती है । सोचने वाली बात है कि जो भीड़ किसी एक व्यक्ति या परिवार के लिए राजसी ठाटबाट की बात करें, यह तय है कि वह भीड़ समाज और राष्ट्र लाभ का नहीं हो सकता । उसका कोई सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दा नहीं होता ।
देश में जो तन्त्र है, वह किसी भी मायने में न तो लोकतन्त्र है, न गणतन्त्र । लोकतन्त्र में कोई धार्मिक आतंक, जातीय उन्माद, रंगभेद, अमीरी गरीबी बीच की झाइयां, छुवाछुत का मनोभाव, आदि नहीं होते । गणतन्त्र तो देश में कतई कहीं मौजूद ही नहीं है । यह पूरा का पूरा राजतन्त्र का ही पर्याय है । अगर कुछ फर्क है तो वह है पात्र का बदलाव । देश दोनों राजतन्त्र ः व्यक्ति और परिवार का शासन और पार्टी या भीड़ का शासन एक ही पैरा मीटर पर अवस्थित है । एक में व्यक्ति राज था और दूसरे में पार्टी राज है; या दोनों ही शासन व्यवस्था राजतन्त्र का ही थोड़ा अलग रूप है ।
देश में लोकतन्त्र इसलिए भी नहीं है, क्योंकि दशकों से अल्पमत के लोग बहुमत पर शासन और हुकुमत कायम रखा है । जनता की सारी मतों की गिनती और सम्मान के साथ उसका सदुपयोग के विपरीत बहुसंख्यक मतों को हार खानी पड़ती है । लोकतन्त्र में पार्टियां और नेता हार खा सकता है, मगर जनता की मतों की हमेशा शाख और जीत होती है । वह अवस्था पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली में ही संभव होने के कारण जन लोकतन्त्र हेतु पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था होनी चाहिए ।
पायदान से हटाये गये राजा और राजतन्त्र को अगर लोकतन्त्र पसन्द है, देश में अवस्थित मधेश, पहाड़, हिमाल के साथ ही मधेशी, जनजाति, अल्पसंख्यक, महिला, पीडि़त, दलित, अपहेलित वर्ग और समुदायों को भी राज्य, राजनीति, सदन, सरकार, शासन और प्रशासन में समानुपातिक प्रतिनिधित्व की गारण्टी कर सकने की प्रतिबद्धता और विश्वास निर्माण करें । मधेशी और जनजातियों के साथ हुए विभेदों को अन्त्य के लिए क्षुद्र लोगों के परिधियों को तोड़कर या छोड़कर जनता के बीच आना चाहिए । वरना दरबार कब्जे की अवधारणा एक कोरी कल्पना के सिवा कुछ नहीं है । – हिमालिनी जून २०२४ अंक से

