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हिन्दी–नेपाली साहित्य के बीच तुलनात्मक अध्ययन को प्रोत्साहित करना चाहिए : प्रा.डॉ. उषा ठाकुर

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काठमांडू, जून २८ । प्राध्यापक डा. उषा ठाकुर ने कहा है कि हिन्दी नेपाली साहित्य के बीच तुलनात्मक अध्ययन और अनुसंधान को प्रोत्साहन करना चाहिए । उनका मानना है कि हिन्दी और नेपाली साहित्य तथा साहित्यकारों के बीच आपस में सदियों से घनिष्ट संबंध हैं, भाषा, लिपि, संस्कार, संस्कृति और भावनाओं के बीच समानता है, ऐसी पृष्ठभूमि में नेपाली और हिन्दी भाषाओं में रचित साहित्यक रचनाओं को लेकर तुलनात्मक अध्ययन और अनुसंधान करने से आपसी संबंध को और भी मजबूत बनाया जा सकता है ।



भारतीय राजदूतावास काठमांडू द्वारा २७ जून (गुरूबार) के दिन त्रिभुवन विश्व विद्यालय परिसर स्थित त्रिवि केन्द्रीय पुस्तकाल में आयोजित ‘नेपाल–भारत साहित्य समारोह’ (के अन्तर्गत) कार्यक्रम ‘साहित्य संवाद’ को सम्बोधन करते हुए प्राध्यापक डा. ठाकुर ने ऐसा कहा है ।
प्रा.डा. ठाकुर के अनुसार नेपाली और हिन्दी भाषा के बीच जो समानता है, अन्य विदेशी भाषाओं में नहीं है । उन्होंने यह भी कहा कि भाषा जाने बिना हिन्दी और नेपाली भाषी अपनी भावनाओं को सहज ही एक–दूसरे के साथ व्यक्त कर सकते हैं और समझते भी हैं । तुलनात्मक अध्ययन और अनुसन्धान के लिए श्रेष्ठ साहित्यकार और श्रेष्ठ कृतियों को चयन करने के लिए भी उन्होंने सुझाव दिया । साथ में साहित्य अनुवाद कार्य को भी उन्होंने जोर दिया । प्रा.डा. ठाकुर का मानना है कि हिन्दी और नेपाली साहित्यकारों के लिए एक वृहत शब्द कोष निर्माण जरुरी है । उन्होंने आगे कहा– नेपाली–हिन्दी और हिन्दी–नेपाली शब्द कोष निर्माण की आवश्यकता है, आज जो शब्द कोष है, वह पर्याप्त नहीं है । एक वृहत नेपाली–हिन्दी शब्द कोष आज की आवश्यकता है ।’
हिन्दी साहित्य के संवद्र्धन एवं विकास के लिए प्रा.डा. उषा ठाकुर द्वारा किए गए योगदान हेतु उनको भारत सरकार की और से ‘विश्व हिन्दी सम्मान’ से सम्मानित किया था । उक्त सम्मान पत्र ग्रहण करते हुए उन्होंने कहा कि त्रिभुवन विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के प्रथम विभागाध्यक्ष डा. कृष्णचन्द्र मिश्र कि प्रेरणा से ही मैं हिन्दी सेवा में आगे बढ़ पायी हूँ । भारत सरकार की ओर से प्राप्त सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए प्रा.डा. ठाकुर ने नेपाल में रह कर हिन्दी साहित्य में योगदान करनेवालों काे स्मरण किया और कहा कि नेपाली साहित्यकार हिन्दी भाषा और साहित्य से अधिक प्रभावित हैं । उनका यह भी मानना है कि नेपाल में हिन्दी का प्रभाव कमजोर नहीं है, सुदृढ है । उन्होंने आगे कहा– ‘हमारे बीच भाषागत सीमाएं नहीं है । दोनों देश के नागरिकों के बीच हृदय का रिश्ता है । हमारे बीच अध्यात्मिक और साहित्यिक चेतना बहुत समृद्ध है, जो एक दूसरे को मजबूत बनाए रखता है ।’
कार्यक्रम में प्रतिनिधिसभा सदस्य मंगल प्रसाद गुप्ता, पूर्वराजदूत रमभक्त ठाकुर, काठमांडू स्थित भारतीय राजदूताबास मिसन उपप्रभुख (डीसीएम) प्रशन्न श्रीवास्तव, पीआईसी विंग की प्रथम सचिव गीतांजलि, त्रिवि केन्द्रीय पुस्तकाल प्रमुख सागरराज सुवेदी जैसे व्यक्तित्व की उपस्थिति  थी । साथ ही उन लोगों ने नेपाल–भारत साहित्य को लेकर अपने–अपने विचाराें को भी व्यक्त किया । साथ में भारतीय राजदूतावास के अताशे सत्येन्द्र दहिया को भी हिमालिनी मासिक की ओर से स्नेह चिन्ह प्रदान किया गया । कार्यक्रम में नेपाली कवयित्री नीमा सुबेदी ने भारतीय साहित्यकार अमृता प्रीतम रचित ‘मैं फिर मिलूंगी’ का नेपाली अनुवाद वाचन किया । सुबेदी ने अमृता प्रीतम की हिन्दी कविता को नेपाली में अनुवाद कर एक पुस्तक भी प्रकाशित किया है ।

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