चर्चा कानून की, जब तक महिला दोबारा शादी नहीं कर लेती, पा सकती है गुजारा भत्ता!
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि मुस्लिम महिला ही नहीं, किसी भी धर्म की महिला भरण पोषण पाने की अधिकारी है।लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से असहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैंसले को मौलिक अधिकारों का हनन बताया है,हालांकि जो महिलाएं भरण पोषण से वंचित है,वास्तव में मौलिक अधिकार तो उनके प्रभावित हो रहे है।वोट की राजनीति के चलते अभी तक किसी भी दल ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उक्त रुख का विरोध नही किया है।जबकि वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैंसले का खुलकर समर्थन होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ठीक वैसा ही फैसला दिया है, जैसा 23 अप्रैल सन 1985 को शाहबानो के भरण पोषण मुकदमे में दिया था।सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाल के निर्णय में कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार है। शाहबानो के केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह का फैसला दिया था।जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए याचिका दायर करने की हकदार है और वह अपने पूर्व पति से भरण पोषण भत्ता प्राप्त कर सकती है।सन1985 में भी सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के केस में अपने फैसले में कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 एक सेक्युलर धारा है, जो सभी महिलाओं पर लागू होती है।इसके बाद सन 1986 में केंद्र सरकार ने संसद में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून पास कर इस फैसले को पलट दिया था।केस के तथ्यों में 15 नवंबर सन 2012 को पीड़ित मुस्लिम महिला ने अपने पति का घर छोड़ दिया था,सन 2017 में उक्त महिला ने अपने पति के विरुद्ध आईपीसी की धारा 498A और 406 के तहत मुकदमा दर्ज कराया।मुकदमे से नाराज होकर पति ने महिला को तीन तलाक दे दिया था,28 सितंबर सन 2017 को उनके तलाक का सर्टिफिकेट जारी हो गया।तलाक के बाद इद्दत की अवधि तक पति ने महिला को हर महीने 15 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देने की पेशकश की, तलाक से तीन महीने तक होती है।लेकिन महिला ने तीन महीने के लिए गुजारा भत्ता लेने से इनकार कर दिया और फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की और सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने की मांग की। 9 जून सन 2023 को फैमिली कोर्ट ने हर महीने 20 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश उसके पूर्व पति को दिया।फैमिली कोर्ट के फैसले को पति ने तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी। 13 दिसंबर सन 2023 को हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा,लेकिन भरण पोषण की रकम 20 हजार से घटाकर 10 हजार रुपये कर दी।
पूर्व पति ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया व दलील दी कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है।मुस्लिम महिला पर सन 1986 का मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून लागू होता है। उसने ये भी दलील दी सन 1986 का कानून मुस्लिम महिलाओं के लिए ज्यादा फायदेमंद है।सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने 99 पन्नों का फैसला देते हुए कहा कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने के लिए याचिका दायर करने की हकदार है।क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 सभी शादीशुदा महिलाओं पर लागू होती है, जिनमें शादीशुदा मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं,साथ ही सीआरपीसी की धारा 125 सभी गैर-मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं पर भी लागू होती है।अगर किसी मुस्लिम महिला की शादी या तलाक स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत होती है, तो भी उस पर धारा 125 लागू होगी,अगर मुस्लिम महिला की शादी और तलाक मुस्लिम कानून के तहत होता है तो उसपर धारा 125 के साथ-साथ सन 1986 के कानून के प्रावधान भी लागू होंगे। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के पास दोनों कानूनों में से किसी एक या दोनों के तहत गुजारा भत्ता पाने का विकल्प है।अगर सन 1986 के कानून के साथ-साथ मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भी याचिका दायर करती है तो सन 1986 के कानून के प्रावधानों के तहत जारी हुए सीआरपीसी की धारा 127(3)(b) के तहत याचिका पर विचार किया जा सकता है। अगर पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता दिया गया है, तो धारा 127(3)(b) के तहत भी मजिस्ट्रेट विचार कर सकते हैं।चूंकि तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त सन 2017 में असंवैधानिक घोषित कर दिया था, इसके बाद सन 2019 में केंद्र सरकार ने कानून लाकर तीन तलाक को न सिर्फ असंवैधानिक घोषित किया, बल्कि इसे अपराध के दायरे में भी शामिल कर दिया है।अपने फैसले में जस्टिस नागरत्ना ने माना कि तीन तलाक के अवैध तरीके से भी किसी मुस्लिम महिला को तलाक दिया जाता है तो वो भी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण पोषण का दावा कर सकती है।
क्योंकि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को सीआरपीसी की धारा 125 से बाहर नहीं रखा जा सकता, भले ही उसे किसी भी कानून के तहत तलाक दिया गया हो। सीआरपीसी की धारा 125 में महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को मिलने वाले गुजारा भत्ता का प्रावधान है। नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में ये प्रावधान धारा 144 में दिया गया है,जिसके अनुसार कोई भी पुरुष अलग होने की स्थिति में अपनी पत्नी, बच्चे और माता-पिता को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता। धारा साफ करती है कि पत्नी, बच्चे और माता-पिता अगर अपना खर्चा नहीं उठा सकते तो पुरुष को उन्हें हर महीने गुजारा भत्ता देना होगा।पत्नी को गुजारा भत्ता तब मिलेगा जब या तो वो खुद तलाक ले या उसका पति तलाक दे, गुजारा भत्ता तब तक मिलेगा जब तक महिला दोबारा शादी नहीं कर लेती।
इस धारा में ये भी प्रावधान है कि अगर कोई पत्नी बिना किसी कारण के पति से अलग रहती है या किसी और पुरुष के साथ रहती है या फिर आपसी सहमति से अलग होती है तो वो गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी।
23 अप्रैल सन 1985 को सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो केस में एक बड़ा ऐतिहासिक फैसला दिया था। शाहबानो इंदौर की रहने वाली थीं और उनके पति ने उन्हें तीन तलाक दे दिया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत शाहबानो अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।1986 के इस कानून की धारा 3 में तलाकशुदा मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता का प्रावधान है। धारा 3 में लिखा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को पूर्व पति से इद्दत की अवधि तक ही गुजारा भत्ता मिल सकता है। इद्दत की अवधि तीन महीने होती है। इसी धारा में ये भी लिखा है कि अगर तलाक से पहले या तलाक के बाद महिला अकेले बच्चे का पालन-पोषण नहीं कर सकती तो उसे दो साल तक पूर्व पति से गुजारा भत्ता मिलेगा।सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अब समय आ गया है कि भारतीय पुरुष परिवार के लिए गृहिणी की भूमिका और त्याग को पहचानें। उन्हें संयुक्त खाते और एटीएम खोलकर उसे वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।महिलाओं के भरण पोषण पर एक बड़ी लकीर खींचते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें धर्म बाधा नहीं है।कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के लिए भी भरण पोषण के लिए पति की जिम्मेदारी तय की है। (लेखक उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता व वरिष्ठ पत्रकार है)



