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भीगी हुई सुबह : वसन्त लोहनी

 

भीगी हुई सुबह

सिर्फ सोई हुई रात क्यों ?
सुबह भी भीगती है
जब बादलों की बाहों
शिथिल हो जाएं
तब बूंद बूंद टपकते हैं
आवरण बदल जाती
भीगी हुईं सुबह
ऐसे हो जाती
न देती उत्तेजना
न ताज़गी, न भोर-हंसी
यही मे अभी अभी
भुगत रहा हु

वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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