बिभेद्पूर्ण दृष्टि और खोखली राष्ट्रीयता
भोजराज पोखरेल:‘हम इस देश को कैसे अपना कहें – नेपाल के मूल प्रवाह में कहाँ है हमारी पहचान – यहाँ से राजधानी जाने के लिए हमें दूसरे देश से गुजरना पडÞता है । यहाँ अत्यधिक गरीबी तो है ही और विकास के नाम में कुछ भी तो नहीं होता । सरकारी निवेश भी इधर शून्य के बराबर है । काम के लिए, दवा-दारु के लिए, उच्च शिक्षा के लिए दूसरे देश की शरण में जाना ही पडÞता है । सीमा के उस पार जाते ही बिजली की चकाचौंध देखते हैं । लेकिन अपने देश में मिट्टी का तेल भी सहज उपलब्ध नहीं है । हांलाकि देश ने हम लोगों के प्रति सौतेला व्यवहार किया है, फिर भी इस देश के प्रति हम लोग निष्ठावान हैं । राज्य समय में ही इस मुद्दे पर गम्भीरता से सोचे और हम लोगों की सहनशीलता को हमारी कमजोरी न समझे ।’
‘नेपाल का भौगोलिक एकीकरण करीब र्ढाई सौ वर्षपहले हुआ था । लेकिन भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से अभी तक एकीकरण नहीं हो सका है । विशेषकर काठमांडू और हमेशा शासन में रहने वाले वर्ग के प्रति देश की बहुत बडÞी आवादी खुश नजर नहीं आती । पिछले कुछ वर्षों में इस में सुधार के कुछ प्रयास तो हुए हैं, फिर भी राज्य द्वारा नागरिकों के प्रति भूगोल अथवा संस्कृति के आधार पर भेदभावपर्ूण्ा व्यवहार चलता रहा । न्याय नहीं मिला ।’
ऐसी अनुभूति बहुतों की रही है । लेकिन बहुत बडÞी समस्या यह है कि जो ऐसी अवस्था का अन्त कर सकते हैं या अन्याय को न्याय में परिणत कर सकते हंै, ऐसी हैसियत रखनेवाले लोग इस पीडÞा को नहीं समझते हैं, जानकार भी अनजान बनते हैं । ऊपर से दम्भ और अहंकार में डूबे रहते हैं । यह कटु सत्य है । मूल समस्या भी यही है । उस वर्ग में अभी भी यह भ्रम है कि वह अपने को दाता समझता है और हम सिर्फयह देंगे, इतना देंगे का राग अलापता रहता है ।
देश में नई शिक्षा योजना का कार्यान्वयन करते समय २०३१ साल में आवश्यक शैक्षिक तथ्यांक संकलन तथा नक्सांकन के लिए सूदुर पश्चिम -सुप) के आछाम और बाजुरा जिला स्थित हरेक विद्यालय में हमें जाने का अवसर मिला । अछाम के बयलपाटा में रात गुजारने के लिए तत्कालीन जिला पञ्चायत के सभापति डम्बरबहादुर स्वाँर के घर में हम लोग अतिथि हुए । वे खातेपीते परिवार के और पञ्चायती व्यवस्था में उदार धार के प्रतिनिधित्व करने वाले माने जाते थे । हम लोग राजधानी से पहुँचे थे । समसायमयिक विषयों में रात देर तक बातचीत हर्ुइ । सुदूर को उपेक्षा करते हुए सौतेला व्यवहार केन्द्र द्वारा किए जाने से यहाँ हम लोग पिछडÞेपन का दर्द भोग रहे हैं, -ऐसा उनका आरोप था । काठमांडू और शासकों के प्रति आक्रोश भी था । उनके कथन का निष्कर्षथा- कोई दूसरे व्यक्ति पर अन्याय करता है तो न्याय के लिए हम राज्य की शरण में जाते हैं । लेकिन जब राज्य ही अन्याय करे अथवा भेदभाव करे तो जनता व्रि्रोह पर उतरेगी, दूसरा कोई विकल्प नहीं है ।
सुप की स्थिति पहले की अपेक्षा कुछ भिन्न है, खास कर पर्ूव-पश्चिम राजमार्ग बनने से और कर्ण्ााली में पुल की सुविधा होने से । सडÞको से जुडÞने पर पहाडी जिलों में भी कुछ आर्थिक बदलाव आया है । हांलाकि काठमांडू से अभी भी बहुत सारे विषयों में मतभेद है । देश का दूसरा बडÞा जलाशययुक्त सेती जलविद्युत् योजना और महाकाली पञ्चेश्वर जैसी विद्युत् आयोजना के कार्यान्वयन से अपना कायापलट होगा, इस सोच में सुप वर्षों से आस लगाए बैठा है । राज्य सञ्चालन में एक हैसियत कायम रखने वाले और देश चलाने के लिए केन्द्रविन्दु में रहनेवाले सुदूर पश्चिम के लोग उस स्थान तक पहुँचे हैं । स्थानीय डोटेली भाषा और ड्यौडा की संस्कृति को अभी-अभी काठमांडू में प्रवेश मिला है । वैवाहिक सम्बन्धो के चलते भी कुछ नजदीकियां बढÞी है । राजधानी में डोटेली के नाम पर अपमानित होने की स्थिति अब नहीं है ।
मधेश अभी चर्चा का केन्द्रविन्दु बना हुआ है । रानजैतिक विश्लेषक चन्द्रकिशोर झा के अनुसार मधेश काठमांडू से नजदीकी चाहता है लेकिन काठमांडू खुद को दूर-दूर रखना चाहता है । उनका यह विचार माननीय है । नेपाल एकीकरण के बाद का इतिहास देखने पर राणाकाल, शाहकाल और बहुदलकाल में भी राष्ट्रहित किसी की भी प्राथमिकता में नहीं रहा । एक मात्र उद्देश्य सत्ता और शक्ति प्राप्त करना ही दिखाई दिया । इसी सत्ता और शक्ति के खेल में राष्ट्र कमजोर होता गया । समूचे राष्ट्र का विकास करना है, ऐसा उच्च विचार नहीं होने पर देश विकास के मामले में पिछडÞता चला गया । परिणामस्वरुप सी.के राउत प्रवृत्ति का जन्म हो रहा है ।
मधेश की ही बात लें, आम पहाडÞी निम्न मध्यम वर्गीय नेपाली की तरह मैं भी इस कथा का पात्र हूँ । मेरा जन्म और पालन पोषण पहाडÞ में हुआ । क्रमशः हम लोग उर्वर जमीन की खोज में तर्राई में पहुँचे और घूमफिर कर काठमांडू के निवासी हुए । जिस जमीनदार को मैंने बाल्यकाल में देखा था, बाद में सप्तरी का वही चौधरी दूसरे की शरण में जा चुका था । उसके सीधेपन का फायदा उठा कर मधेश के अथवा कई बाहर से आकर बैठे चालाक लोगों ने जमीनदार चौधरी की जडÞे हिला दी । देखते-देखते जमीनदार चौधरी सुकुम्बासी हो गया । फिर भी सुकुम्बासी आयोग की नजर, उस पर नहीं पडÞी । इतना ही नहीं, चौधरी ने परिश्रम के साथ तर्राई के जंगल का जो संरक्षण किया था, उसका गलत अर्थ लगाते हुए जंगल और नदी नाले का शोषण करने वाले सुकुम्बासी समूह में चौधरी को दर्ज कर दिया गया । जिस सुकुम्बासी को जमीन मिली, वह तो उस जमीन में बस गया । लेकिन बेचारा चौधरी देखता रह गया ।
नेपाली मूल के शरणार्थियों को सीमा रक्षक के रूप में जमीन देकर राज्य ने बसाया । इस उद्देश्य के लिए कुछ संवेदनशील सीमावर्ती जगहों में पहाडÞी मूल के भूतपर्ूव सुरक्षाकर्मियों को बसाया गया । इससे मधेशियों के मन में शंका उत्पन्न हर्ुइ । और मधेशियों को लगा, देश के प्रति निष्ठा के बारे में हम लोगों पर आशंका की गई । मधेश की गर्मी को नजरअन्दाज करते हुए दौरा सुरुवाल और टोपी को अनिवार्य किया गया । टोपी पहना हुआ फोटो नागरिकता के लिए अनिवार्य माना जाने लगा । जिसे मिलना चाहिए उसे नागरिकता न मिलना और जिसे नहीं मिलना चाहिए, उसे नागरिकता मिलना, ऐसे गोरखधन्धे से नागरिकता के क्रम में अनेक विकृतियाँ नजर आईं । नागरिकता के लिए कार्यालय पहुँचे हुए कतिपय मधेशी नागरिक को गैरनेपाली की नजर से भी देखा गया । लेकिन पहाडÞी मूल के लोगों को ऐसी आशंका से गुजरना नहीं पडÞा । ऐसे व्यवहार से मधेश के सर्न्दर्भ में कैसा सन्देश प्रभावित होगा –
नेपाली भाषा को अनिवार्य किए हुए पचासों वर्षबीतने पर भी तर्राई, काठमांडू उपत्यका, पहाडÞ और उच्च हिमाली क्षेत्र के कतिपय समुदाय अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी कोई भी भाषा समझने की स्थिति में अभी भी नहीं हैं । इधर कुछ वर्षों से तर्राई और पहाडÞी जनजातियों के पर्व त्योहारों को सरकारी मान्यता दी जा रही है । फिर भी सदियों तक राज्य ने शासकों के पर्व को ही राष्ट्रीय मान्यता दी थी । इस तरह दूसरों का सांस्कृतिक मर्दन भी हुआ ।
मधेश-तर्राई को कुछ वर्षपहले तक शासकों के लिए शिकार का उपयुक्त स्थल, राजश्व का स्रोत, जाडÞे से बचने की उपयुक्त जगह और अपने चमचों के लिए बख्शिस के रूप में दी जाने वाली जमीनदारी, बिर्ता, मौजा आदि का उपयुक्त स्थल माना जाता था । मलेरिया नियन्त्रण के बाद तर्राई में आन्तरिक सुकुम्बासी -आप्रवासी) और एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसने वालो की बाढÞ सी आ गई । लेकिन इसका लाभ मधेश को कम मिला, ऐसा आरोप मधेश का है ।
मधेश की मानवीय पीडÞा और दारुण है । हिमाल, पहाड वा राजधानी कहीं भी पृथक वर्ण्र्ााे आदमी को देखते ही नेपाली के बदले इन्डियन समझने की मानसिकता अभी भी पर्ूण्ा रूप से नहीं गई है । वैसों को अपशब्द प्रयोग करना और असमान व्यवहार करना एक सामान्य सी बात हो गई । कितने लोग तो जब कुछ नाराज होते हैं, खासकर काठमांडू में उनके मुँह से ऐसे व्यक्तियों के लिए ‘धोती’, ‘इन्डियन’ आदि शब्द निकल ही जाते हैं । नेवारी समुदाय में तो ‘मनु मरु मर्स्या खः’ -आदमी नहीं मधेशी है) भी कहा जाता था । केवल भाषा, रूप रंग एवं संस्कृति में अन्तर होने पर देश के ही नागरिक को इस तरह अपमानित करना शोभनीय नहीं होता । हांलाकि विगत कुछ वर्षों से जब से मधेश जागरण हुआ है, ऐसी प्रवृत्ति में कमी आई है । राष्ट्रवाद तब तक मजबूत नहीं होगा, जब तक हम सभी नागरिक को समान नजर से नहीं देखेंगे ।
प्रशासन, सुरक्षा, परराष्ट्र जैसे राज्य सञ्चालन के अंग में ही नहीं, समाज का पथपर््रदर्शक सशक्त माध्यम मीडिया के मूल प्रवाह में भी पहाडÞी मूल का वर्चश्व है । सम्वेदनशीलता को नजर अन्दाज करते हुए मीडिया से होने वाले कतिपय प्रश्न मधेशी नेताओं की राष्ट्रीयता पर आशंका दर्ज करते हैं । यह खतरनाक सोच है । मधेश-तर्राई के मुद्दे को गैर मधेशी द्वारा महत्व ना देना और मधेशी द्वारा वह मुद्दा उठाने पर यह विदेशी के इशारे पर हुआ है और देश को विखण्डित करने की योजना है, इत्यादि आशंका और आरोप लगाने से राष्ट्रवादी मीडिया भी बहुत बडÞी भूल कर रही है । उस में अपनी मञ्जूरी जताने वाले बहुत सारे लोग मिल जाते हैं । यह एक यथार्थ है, कुछ दशक आगे तक सुरक्षा, परराष्ट्र जैसे अंगों के प्रमुख में मधेशी को जिम्मेदारी नहीं देनी चाहिए, कुछ ऐसी मान्यता अलिखित रूप में विद्यमान थीं ।
काठमांडू केन्द्रित शासक या पहाडी मूल के नागरिक ही ऐसी अवस्था के लिए जिम्मेवार नहीं है । मधेश का प्रतिनिधित्व करने वाले नेतागण सत्ता और शक्ति के प्रति अत्यधिक लालची होने पर वे भी उतने ही जिम्मेदार हैं । ऐसा निस्संकोच कहा जा सकता है । खासकर तर्राई में ही जो शक्तिशाली और दबंग वर्ग हैं, उनका व्यवहार कमजोर, दलित और पिछडे वर्ग के साथ सिर्फआपत्तिजनक ही नहीं, अपमानजनक भी है । लेकिन ऐसा पिछडÞा और दलित वर्ग राज्य द्वारा कभी तो न्याय मिलेगा, इसी आस में अभी तक जी रहा है । ऐसे ही व्यथा, कितने ही सीमान्तकृत जनजाति भी भुगत रही है ।
संसार के अधिकांश देश विविधता में आधारित हैं । विविधता वाले समाज के व्यवस्थापन में जटिलता और चुनौती तो होती ही है । लेकिन जहाँ राज्य द्वारा देश के अन्दर की विविधता की सम्वेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए व्यवस्थापन हुआ है, वे राज्य और समाज राजनीतिक रूप से स्थिर हो सके हैं । जहाँ ऐसी सम्वेदनशीलता पर उचित ध्यान नहीं दिया गया और व्यवस्थापकीय कमजोरी रह गई, ऐसे समाज को अनेक दुःख झेलने पडÞे । इसका पिछला उदाहरण सुडान है । विविधता व्यवस्थापन के बारे में हम लोगों को भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका से शिक्षा लेनी चाहिए । हमारे यहाँ सैकडों भाषा-भाषी हैं तो उधर हजारों हैं । भारत ने प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली के द्वारा इसे व्यवस्थित किया । अमेरिका के जो मूल निवासी हैं, उनमें भी अनेक विविधता है । पिछले वर्षों में तो विविधता के चलते अमेरिका संसार का एक साझा देश जैसा हो गया । हरेक अमेरिकी खुद को अमेरिकन होने पर गर्व करता है । वहाँ प्रत्येक नागरिक राष्ट्रीय झण्डा अपने घर में फहराता है और अमेरिकी एकता में मददगार बनता है । वहाँ राज्य द्वारा स्थापित नीति नियम और मर्यादा के अन्दर बैठने और कानून द्वारा शासित होने पर वे लोग गर्व करते हैं । स्थानीय स्तर में अधिकार का निक्षेपण इतना अधिक हुआ है कि काउन्टी -नगरपालिका और गाविस) से ही जनता का खास सरोकार रहता है । सारे काम ट्याक्स, जमीन का प्रशासन, अदालत, पुलिस और प्रशासन का सब काम यहीं से सञ्चालित होते हैं । शिक्षा, स्वास्थ्य, सडÞक, पेयजल लगायत स्थानीय विकास की जिम्मेदारी काउन्टी की होती है । अपने देश की राजधानी कहाँ है, यह लोगों को जानकारी नहीं होने पर भी कोई खास अन्तर नहीं पडÞता है ।
वास्तव में अब्राहृम लिंकन ने प्रजातन्त्र की जो परिभाषा दी है- जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन । इसका वास्तविक नमूना अमेरिका में देखने को मिलता है । लिंकन की सोच के अनुसार अमेरिका ने यह असम्भव काम को सम्भव कर दिखाया है और इसी से आज अमेरिकन एकता उदाहरणीय है ।
हमारे यहाँ संघीयता की बहस अभी जारी है । बहस में सरकार और अधिकार जनता के घरों तक पहुँचाने की बात को प्राथमिकता नहीं दी गई है । इसके बदले हम लोग कितना प्रदेश चाहिए और प्रदेश का क्या नाम होना चाहिए, इस में उलझे हुए हैं । बहुत प्रदेश की मांग करने वाले जप्त गए और चौध प्रदेश हुआ तो भी समस्या का निदान दिखाई नहीं दे रहा है । अभी काठमांडू के प्रति जो आक्रोश है, भविष्य में ऐसा ही आक्रोश प्रदेश की राजधानी के प्रति देखा जाएगा । उसके बाद प्रदेशों में भी शक्ति जनता के तह तक कैसे पहुँचे, इसका विवाद छिडÞेगा ।
विगत में जाने अनजाने, जो कमी-कमजोरी थी, या किसी के प्रति अन्याय हुआ था, उन सभी मुद्दों को सम्बोधन करने की महत्वपर्ूण्ा घडÞी में अभी हम हैं । हमारे पास बहुत सारे अवसर हैं । इसीलिए अब कौन शासक और कौन शासित –
राज्य द्वारा भूगोल, लिंग, समुदाय, भाषा वा अन्य किसी कारण से जो विभेद में रहे हैं, उनको थोडÞी सी भी तकलीफ न देते हुए अपने-अपने दलीय स्वार्थ और संकर्ीण्ाता से ऊपर उठ कर अल्पकालीन वोट की राजनीति से खुद को अलग रख कर देश की अवस्था को देखते हुए ठोस निर्ण्र्ाालेने और उसके अनुसार काम करने का समय है, यह ।
अब बनने वाले संविधान से ऐसा समाज बने, जहाँ प्रत्येक नेपाली नागरिक हम नेपाली हैं, कह कर सीना तान सके । सबसे पहले नेपाली हैं, उसके बाद हम अमुक समूह वा सम्प्रदाय के हैं, ऐसा समझने और कहने का वातावरण संविधान दे सके । जब हर नेपाली नेपाल को अपना समझने लगेगा तो राष्ट्रीयता स्वतः मजबूत होगी और नेपाल की अक्षुणता अनन्तकाल तक कायम रहेगी ।
-पोखरेल निर्वाचन आयोग के पर्ूव प्रमुख आयुक्त हैं) । साभार ः कान्तिपुर दैनिक)

