‘बांग्लादेश में बदलता परिदृश्य’ : प्रेमचन्द्र सिंह
प्रेमचंद्र सिंह, लखनऊ । प्रस्तावना, वर्ष- 1947 में भारत की आजादी के बाद भारतीय भूगोल से ही 1971 में निर्मित तीसरा स्वतंत्र देश बांग्लादेश है और बांग्लादेश की रणनीतिक तथा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उसकी भौगौलिक अवस्थिति ही उसकी मुसीबत का सबब बन गया है। अपनी आजादी के पांच दशकों में बांग्लादेश ने दो दर्जन सैन्य तख्तापलट के प्रयासों का अनुभव किया है, जिनमें से कुछ सफल रहे है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने नहीं, बल्कि हाल ही में नियुक्त बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान ने 5 अगस्त, 2024 को ये घोषणा की कि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपना पद छोड़ दिया है। उनकी यह यह घोषणा एक सैन्य निष्कासन का स्पष्ट संकेत है। अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के चचेरे भतीजी से शादी होने के कारण सेना प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान अपदस्त प्रधानमंत्री की नजदीकी रिश्तेदार भी हैं। अभी पिछले 23 जून, 2024 को ही वह बांग्लादेश के सेना प्रमुख बने हैं और आज प्रधानमंत्री के त्यागपत्र की घोषणा के साथ ही वह राष्ट्र को संबोधित करते हुए अपने संदेश में कहा है कि वह अंतरिम सरकार बनायेंगे और देश को अब वह संभालेंगे। वह देश में शांति बहाली की सारी जिम्मेदारी ले रहे हैं और इस कार्य में उनको बांग्लादेशी नागरिकों का सहयोग चाहिए। उन्होंने आगे बताया कि उनकी राजनीतिक नेताओं से मुलाकात हुई है और सेना अब कानून- व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालेगी। देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच जनरल जमां ने सेना और पुलिस को गोली न चलाने का आदेश दिया है और प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने और हिंसा बंद करने का आग्रह किया है। इस बीच जेल में बन्द बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को राष्ट्रपति द्वारा रिहा कर दिया गया है। खालिदा जिया और उनकी बीएनपी पार्टी बांग्लादेश में अपदस्त प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी अवामी लीग पार्टी की सरकार की धुर विरोधी रही है, पिछले चुनाव का विरोध से लेकर आरक्षण विरोधी इस छात्र आंदोलन के केंद्र में भी बीएनपी पार्टी को ही बताया जा रहा है।
तख्तापलट का तात्कालिक कारक
बांग्लादेश में इस राजनीतिक उथल- पुथल की तात्कालिक कारण लगभग एक माह पूर्व शुरू हुए छात्र आंदोलन सरीखा स्थानीय मुद्दा है। छात्रों ने सरकारी नौकरियों के लिए आरक्षण प्रणाली के खिलाफ आंदोलन किया है। इस प्रणाली में नौकरी के रिक्त पदों का तीसरा हिस्सा उन लोगों के लिए आरक्षित है जो 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी के युद्ध में भाग लिए थे अर्थात बांग्लादेश मुक्तिबाहिनी और उनके बंसजो के लिए आरक्षित की गई थी। छात्रों का दावा हैं कि यह आरक्षण प्रणाली भेदभावपूर्ण है और उन्हें योग्यता के आधार पर भर्ती की जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि 1972 में तत्कालीन सरकार ने मुक्ति संग्राम में हिस्सा लेने वाले स्वतंत्रता सेनानियों और उनके वंशजों को सरकारी नौकरियों में 30 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया था, जबकि साल 2018 में शेख हसीना सरकार ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया था। लेकिन इस साल जून में हाईकोर्ट के फैसले ने इस आरक्षण प्रणाली को खत्म करने हेतु सरकार की फैसले को गैर कानूनी बताते हुए इसे दोबारा लागू कर दिया था। मामला सुप्रीमकोर्ट में है और सुनवाई आगामी 7 अगस्त को होनी थी, उसके पहले ही तख्तापलट हो गई। बांगलादेश तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि देश का विकास युवाओं के लिए आवश्यक नौकरियों सृजित करने में सक्षम नहीं हो सका है। अनुमानों के अनुसार लगभग 1 करोड़ 80 लाख (18 मिलियन) युवा बांगलादेश में नौकरी की तलाश में हैं। विश्वविद्यालय स्नातकों को उनसे कम शिक्षित और कम योग्य साथियों की तुलना में अधिक बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है1 इस आरक्षण प्रणाली के विरुद्ध छात्र आंदोलन पहले भी होते रहे हैं, लेकिन इस बार की छात्र आंदोलन में करीब 300 लोगों की मौत हुई है, हजारों लोग जख्मी हुए हैं और शेख हसीना सरकार गिर गई। श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन के तर्ज पर बांग्लादेश प्रधानमंत्री आवास में आंदोलनकारी जबरदस्ती घुस गए।
राजनीतिक उथलपुठल की वैश्विक घटक
वर्ष- 2023-24 में भू-राजनीतिक और भू- आर्थिक गतिविधियों से बांग्लादेश भी अछूता नहीं रहा है बल्कि कही न कही उसकी घरेलू राजनीति इससे गंभीर रूप से प्रभावित भी हुआ है। मसलन
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना (Sheikh Hasina) ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा है कि उन्हें 7 जनवरी के चुनावों के लिए ऑफर दिया गया था कि अगर वह अपने देश के अंदर एयरबेस बनाने की छूट देती हैं, तो उन्हे बिना किसी परेशानी के चुनाव करवाने दिया जाएगा। शेख हसीना ने ऑफर देने वाले देश या शख्स का नाम तो नहीं बताया लेकिन उन्होंने दावा किया कि यह प्रपोजल एक ‘व्हाइट मैन’ की तरफ से आया था। प्रधानमंत्री हसीना ने कहा कि वह देश के अन्दर और देश के बाहर हर जगह लड़ाई लड़ रही हैं और बांग्लादेश को विभाजित कर एक अलग नया देश बनाने की ‘साजिशें अभी भी जारी हैं। पूर्वी तिमोर की तरह वे बांग्लादेश (चट्टोग्राम) और म्यांमार के कुछ हिस्सों को बंगाल की खाड़ी में सेंट मार्टिन आइलैंड बेस के साथ लेकर एक ईसाई देश बनाना चाहते हैं। उन्होंने अपने इंटरव्यू में भारत का नाम लेने से बचती रहीं, लेकिन उन्होंने संकेत दिया कि ये विदेशी ताकतें अपनी मंसूबों को अंजाम देने के लिए कुकी-चीन नेशनल फ्रंट (केएनएफ) और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ आसाम (उलफा) के परेश बरुआ सहित अनेकों सशस्त्र अलगाववादी विद्रोही समूहों का उपयोग कर रहे हैं।
अमेरिका- बांग्लादेश- चीन संबंध
अमेरिका ने बांग्लादेश की रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) और उसके अधिकारियों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए हैं और इसके परिणामस्वरूप इनपर कड़े प्रतिबंध भी लगाए हैं। इसके अलावा अमेरिका ने बांग्लादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने का भी आग्रह किया था। बांग्लादेश की सरकारी गलियारे में अमेरिका की इन कारनामों को अपनी आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता रहा है। बांग्लादेश ने अमेरिका से बांगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के दोषियों की प्रत्यर्पण की मांग की है, जिसे लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद रहे हैं। इन मुद्दों के कारण अमेरिका और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय संबंधों में खटास से इंकार नहीं किया जा सकता है।
चीन का बांग्लादेश से रक्षा और व्यापारिक द्विपक्षीय संबंध चीन के हित में रहा है। बांग्लादेश की सेना के लिए पनडुब्बी, युद्धपोत से लेकर मिसाइल्स,राइफल तथा अन्य युद्ध सामग्री की आपूर्ति चीन द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया है। इन सजोसमान की गुणवत्ता पर बांग्लादेश की सेना अपनी असंतुष्टि चीन के समक्ष रखा है जिसके कारण दोनो के बीच मतभेद की खबर है। इसके अतिरिक्त मोंगला बंदरगाह और चिटगांव बंदरगाह का आधुनिकरण और विस्तार का कार्य भी चीन ने ही किया है। लेकिन इन दोनो रणनीतिक बंदरगाहों के संचालन के साथ ही भारत के चिकन- नेक के नजदीक निर्मित होनेवाले बहुचर्चित तीस्ता हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का कार्य भी बांग्लादेश ने भारत को दिया है, जिसके कारण माना जा रहा है कि चीन और बांग्लादेश के बीच का द्विपक्षीय संबंध कुप्रभावित हुआ है।
ऐसे माहौल में चीन का सदाबहार मित्र और अमेरिका का रणनीतिक मित्र पाकिस्तान अपनी पुरानी जख्मों को कैसे भुल सकता है और इस पूरे घटनाक्रम में उसकी दुरभिसंधि से इन्कार नहीं किया जा सकता है। बांग्लादेश में जमात- ए- इस्लामी, जैश-
ए मोहम्मद, हरकत- उल- जिहाद सरीखे अनेकों समूह इस विश्वसनीय सहचर की बुनियाद है।
व्यापार
बांग्लादेश के कुल व्यापार में चीन का लगभग 17% हिस्सा है, भारत लगभग 13% के साथ दूसरे नंबर पर है और अमेरिका बांग्लादेश का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। अमेरिका का बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय व्यापार की प्रकृति बांग्लादेश की चीन और भारत के साथ हो रहे व्यापार के बिल्कुल विपरीत है, क्योंकि बांग्लादेश अमेरिका के साथ व्यापार में सरप्लस या लाभ की स्थिति में है और चीन तथा भारत के साथ बांग्लादेश का व्यापार घाटा की स्थिति में है। बांग्लादेश की आर्थिक उत्थान में शेख हसीना की अवामी लीग की सरकार की योगदान अग्रणी रहा है। बांग्लादेश का अमेरिका के साथ लाभप्रद व्यापार अमेरिका का बांग्लादेश पर अपनी बात मनमाने के लिए एक प्रबल दवाब का माध्यम बन सकता है।
सारांश
संक्षेप में बांग्लादेश के अन्दर और बाहर की ताकतों का अंतर्निहित स्वार्थपरता की संघर्ष की दास्तां ही शेख हसीना की सरकार की तख्तापलट को बयां करती है। दूसरे देशों की संसाधनों की लूट ही आर्थिक खुशहाली का साधन बन जाए और यह लूट वैश्विक राजनीतिक और वैश्विक आर्थिक नीति के केंद्र में आ जाय, तो फिर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में दोस्त और दुश्मन, युद्ध और शांति के बीच फासला की गुंजाइश बहुत कम हो जाती है। ऐसे वैश्विक माहौल में देश के भीतर के मीरजाफर और जयचंद्र की अभिलिप्सा भी नंगा नाच करने से बाज नहीं आती है। बांग्लादेश के लिए अपदस्त प्रधानमंत्री शेख हसीना के परिवार की शहादत से सब वाकिफ हैं, उसके बाद भी उनके प्रति बांग्लादेश में हुए हालिया व्यवहार कुछ लोगों की नजर में कृतघ्नता है और कुछ लोगों की दृष्टि में वतन- परस्ती…… खैर पैमाना जो भी हो, बांग्लादेश के लोगों का निर्णय ही बांग्लादेश के भाग्य का निर्धारक होना चाहिए।





