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मधेश का मजाक ? ओली को सिर्फ प्रधानमंत्री की कुर्सी दिख रही है

 

k.p.oliश्वेता दीप्ति , जनवरी , ७ । क्या एक परिपक्व राजनेता ओली हैं ? यह सवाल नेपाल की राजनीति से करने का मन कर रहा है । जब भी मुँह खुला तो ऐसे वक्तव्य निकले जिसे मर्यादित तो कभी नहीं कहा जा सकता । राजनीति मजाक तो बिल्कुल नहीं है । राजनीति गलियारे में चर्चा है कि ओली माघ आठ के बाद नेपाल के सम्भावित प्रधानमंत्री हैं । तो क्या सत्ता हासिल होने से पहले ही सत्ता मद ने उन्हें तानाशाही सिखा दी है ? तो उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि हिटलरशाही भी नहीं टिकी थी । देश एक नाजुक दौर से गुजर रहा है जहाँ हर राजनेता पर निगाहें टिकी हुई हैं, वो नेता जिनपर देश का भविष्य टिका हुआ है । ऐसे नेता इस तरह का वक्तव्य दे रहे हैं जो मधेशी जनता की भावनाओं को भड़काने का काम कर रहे हैं । एक ओर निरीह जनता को बेवजह गिरफ्तार करना, प्रहरी द्वारा यातना देना और मानसिक पीड़ा देना चल रहा है तो दूसरी ओर बहुमत के घमंड में उसी जनता की भावनाओं को भड़काने का काम किया जा रहा है, जिसने उन्हें अपना प्रतिनिधि बना कर सत्ता में भेजा है । संविधान बनाने की गम्भीरता उनमें कहीं नहीं दिखाई दे रही उससे ज्यादा उन्हें किसी भी हालत में संविधान लागू करने की हड़बड़ी है और इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी दिख रही है । कभी मधेश के अस्तित्व को नकारना, कभी जनआन्दोलन को रत्नपार्क में बादाम बेचने वालों का आन्दोलन कहना तो जनयुद्ध को आततायी की संज्ञा देना । विचार विमर्श के लिए बुलाई गई बैठक में शामिल ना होना और आज मधेशवादी नेताओं के कथन पर यह कहना कि तुमलोग यूपी बिहार भी ले लो कहाँ तक उचित है ? आखिर ये कौन सा नशा है जिसके मद में उचित अनुचित का ख्याल तक नहीं है ? देश को सुलगाने का काम कर रहे हैं ओली । देश का हर क्षेत्र महत्वपूर्ण है और एक राजनीतिज्ञ को सभी क्षेत्र को ले कर चलना होता है । मधेश इस देश का वह हिस्सा है जिसपर देश की आर्थिक स्थिति निर्भर करती है, ऐसे क्षेत्र और यहाँ के प्रतिनिधियों की अवहेलना करके आखिर क्या साबित करना चाहते हैं ओली ? देश को छावनी में तब्दील कर के मान लिया जाय कि संविधान लागू कर भी दिया जाय तो क्या देश को स्थिरता मिल जाएगी ? क्या इन बातों से ऐसा नहीं लग रहा कि देश के जिम्मेदार नेता ही देश को आन्दोलित करने में लगे हुए हैं ?  

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