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दवाब का संविधान ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा : पूर्व सचिव डा. प्रवीण मिश्रा

 

praveen mishra - Copyकाठमाण्डू , १८ जनवरी । पूर्व स्वास्थ्य सचिव डा. प्रवीण मिश्रा ने कहा है कि दवाब का संविधान ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता  । उनके द्वारा प्रगट किये गये विचार इसप्रकार है —
‘संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जो देश की भावनाओं और जरुरतों को अपने आप में समाहित करता है । देश का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रहता है उसे जनता के लिए बनाया जाता है । संविधान ऐसा होना चाहिए जो जनता को यह अहसास दिलाए कि यह उसके लिए ही बना है । अगर इन भावनाओं के विपरीत संविधान बनता है और लागू कर दिया जाता है तो कुछ दिनों के लिए हो सकता है कि जनता इसे मान भी ले,  किन्तु ऐसा संविधान ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता । ऐसे संविधान के साथ जनता ज्यादा समय तक संतुष्ट नहीं रह सकती और यही असंतुष्टि आगे चलकर किसी ना किसी रूप में सामने आ जाती है । राष्ट्रीय विखण्डण जैसी सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है । अगर सबकी भावनाओं को नहीं समेटा गया तो हालात बिगड़ने की जिम्मेदारी सरकार पर होगी । अधिकार का नहीं मिलना ही असंतुष्टि का कारण बन जाता है । कलह का रूप चाहे क्षेत्रीय हो या जातीय हो सामने आएगा । इन कारणों पर हमारे नेताओं को ध्यान देना आवश्यक है । उन्हें इतिहास पढने की आवश्यकता है ।

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हमारे पड़ोसी देश भारत को अगर हम लें तो हमें उसके इतिहास से यही पता चलता है कि शुरुआती दौर में १७-१८ राज्य थे जो आगे चलकर जनता की जरुरतों के हिसाब से उसे बढाते गए और आज २७-२८ राज्य बन चुके हैं । यह उदाहरण बताता है कि सत्ता को जनता के हिसाब से चलना पड़ता है । तभी देश में सद्भाव और भाईचारे का माहौल बना रहता है । अगर जनता यह चाहती है तो सरकार को उसे संबोधन करना ही होगा ।  अगर सरकार ऐसा नहीं करती तो देश विकास की नहीं विनाश की राह पर चलेगा ।

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जहाँ तक उत्तरीय और दक्षिणीय संधीयता का सवाल है तो मुझे लगता है कि सभी की यह धारणा है कि यह सही नहीं होगा क्योंकि अगर यह सही होता तो नेपाल बहुत आगे बढ़ चुका होता । यह धारणा १९६१ में आई थी किन्तु विगत वर्षों का इतिहास बताता है कि देश का विकास नहीं हुआ इसका कारण शायद यही है कि लोगों की भावना एक नहीं हो पाई, लोग एक दूसरे पर विश्वास नहीं कर पाए, आपस में वैमन्स्यता बढी इसलिए मुझे लगता है कि भौगोलिक सीमा और संस्कृति का ख्याल करके ही आज जो संघीयता की बात आ रही है उसका निर्धारण करना चाहिए क्यों जनता अपनी संस्कृति, भाषा और परम्पराओं से भावनात्मक रूप से जुड़ी होती इसके लिए संविधान निर्माण और संघीयता जैसे नाजुक और संवेदनशील मुद्दों पर सरकार को काफी एहतियात बरत कर निर्णय लेना होगा । अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश आन्दोलित होगा और उसके बाद का परिणाम देश को भुगतना होगा ।’ प्रस्तुति – श्वेता दीप्ति

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