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अजय कुमार झा, जलेश्वर । आदरणीया दीदी आशा शैली जी मेरे लिए आदर्श लेखिकाओं में एक हैं। मैने उनमें ७० के उम्र में भी एक नाचता हुआ व्यक्तित्व का दर्शन किया, निश्चल बच्चों की भांति उमंगायित और उत्साहित जीवन शैली देखी, माता जगदम्बा के आशीष और स्नेह से सराबोर एक आनंदित साहित्य साधिका तथा एक जुझारू लेखिका को देखा। बस, यों समझिए कि हिन्दी की ये महाश्वेता देवी हैं। उनका व्यक्तिगत जीवन और उनके व्यहार से ऐसा लगता है जैसे कि कोई महाकाव्य जीवंत हो उठा हो, जैसे यह ब्रह्माण्ड अपनी समग्र सौंदर्य को समेटकर इनके व्यक्तित्व में समाहित हो गया हो। मेरे मनस पटल पर जालंधर के कार्यक्रम में इनके द्वारा स्वागत में गजल प्रस्तुति का वह दिव्य दृष्य जब भी आता है, तो एक मीरा और मैत्रेई का परम् लुभावन रूप मेरे सामने उभर आती है, जिसके जीवन में ज्ञान, स्नेह और चरैवेति चरैवेति का मंत्र ही स्थायी भाव है; वो हैं करुणामयी आशा दीदी।
 ‘शैल सूत्र’ नामक एक त्रैमासिक पत्रिकाका प्रकाशन और संपादन भी इनके द्वारा होता आ रहा है। इसके अलावा पुस्तक प्रकाशन और कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध आदि लिखना और उन्हें विधिवत पुस्तकों में सहेजना आशा दीदी की दुर्धर्ष उद्यमशीलता का प्रसाद है। हर्ष का विषय है कि हीरा अन्ना ‘भण्डारी’ नाम की प्रोफसर डॉ. सिद्धेश्वर के निर्देशन में इनके साहित्य पर शोध कुमाऊँ विश्वविद्यालय में जमा करा चुकी हैं।
‘बात हिमाचल की’ अपने आप में एक शोधग्रंथ है। यह पुस्तक केवल हिमाचल की प्राकृतिक सुषमा के वर्णन के लिए नहीं लिखी गयी है। यह पुस्तक हिमाचल के बहाने पूरी हिमालय पर्वत श्रृंखला के जन-जीवन, आम जन के जीवन-संघर्ष, इतिहास-जनश्रुतियाँ, कला-संस्कृति और स्वधर्म की रक्षा के लिए अंतहीन युद्धों और बलिदान की मार्मिक कहानी कहती है। नेपाल के शिवालिक क्षेत्र तथा राजाओं के द्वारा आरक्षित स्थानों तथा चार कोश झाड़ी, भाभर, तराई, टनकपुर(चम्पावत) का वर्णन के साथ यह पुस्तक नेपालीपन को अपने भीतर समेटे हुए है।
उदाहरण के लिए, नगर ‘पांवटा साहिब’ देहरादून के बिल्कुल पास है, लेकिन उसके बारे में और उसके माध्यम से गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन के अछूते प्रसंगों को जानने का पहली बार मौका इसी पुस्तक में मुझे मिला। (हिमाचल के सुप्रसिद्ध इतिहासकार मियां गोवर्धन सिंह के अनुसार गुरु गोविन्द सिंह को औरंगजेब की दृष्टि से बचाने के लिए पहाड़ों में लाया गया था बाद में वे आनन्दपुर लौट गये थे और वहीं उन्होंने अपनी सैन्यशक्ति को विकसित किया था। पूर्व में कहा जा चुका है कि, ‘जब गुरु तेग बहादुर को (1621-75) दिल्ली में 11 नवम्बर, 1675 ईस्वी को शहीद किया गया तो उस समय गोविंद राय (सिंह) नौ वर्ष के थे। शाही अत्याचारों से बचाने के उद्देश्य से सिक्ख ‘बालक गुरु गोविंद सिंह’ को इस भय से पहाड़ों के इन सुरक्षित स्थानों में ले आए ताकि उन्हें पकड़कर बंधक के रूप में दिल्ली न ले जाया जा सके। पहले उन्हें सिरमौर के पांवटा में रखा गया, बाद में वे आनन्दपुर लौट गये।) ऐसे तमाम प्रसंग है जिसमें जाकर लगता है कि हम अभी बहुत कम जानते हैं। हिमाचल में रामायण के लोक संदर्भों को लेकर भी बहुत रोचक सामग्री इसमें उपलब्ध है। (“राज हुन्दे होय बणबासा, रामा हो मेरेया जोगणुआ।
तेरे बिना आसां किंयां रेणा, रामा हो मेरेया जोगणुआ।
तेरे बिना जुधेया निमाणी, रामा हो मेरेया जोगणुआ।
छम-छम रोये माता तेरी, रामा हो मेरेया जोगणुआ।।”
जब हिमाचली गायक तान छेड़ दे और डूब कर गाये तो आप की आँखों से अश्रुधारा न निकले यह हो ही नहीं सकता। रामकथा यूँ तो विश्वव्यापी है परन्तु हिमाचल के दुर्गम क्षेत्रों में आप इसका अलग ही रूप देखेंगे। मैंने इस लेख में सम्पूर्ण हिमाचल में रामकथा के आँचलिक संदर्भों को लेने का मात्र प्रयास भा किया है। उपरोक्त पंक्तियाँ हिमाचल के कांगड़ा जनपद से ली गई हैं।
हिमाचल की रामकथा के राम तुलसी के विश्वव्यापी परमेश्वर नहीं हैं, साधारण और जन-जन के प्रिय राजपुत्र हैं। राम और लक्षमण सहोदर (सगे) भाई हैं, सांतारानी को ब्याह कर लाया गया है। राम-लक्षमण बनवास को चले और सीता उनके संग चली है। यह कथन है हिमाचली राम कथा के गायक का।
“ए रामा ए लछुमाणा सोदुरे भाये।
ए राणी ए सीता ए बरुंए मांगाये।।”
“ए रामा ए लछुमाणा बणूबासा भूये।
ए राणी ए सीता ना सांगे त्यारी।।” )(लाहुल-स्पिति )
 इसी प्रकार कुल्लू के राजाओं की राजधानी नग्गर का उल्लेख है। पृष्ठ ६० पर एक परिभाषा है (जब शब्द छंदों का साथ लेते हैं,मन झंकृत होता है तभी गीत बनते हैं और मन में तरंगें पैदा करते हैं।) “महासवी लोकगीतों के छंद, वैदिक त्रिगर्त का कचोट वंश, (पाणिनी ने त्रिगर्त के आयुधजीवी संघों का उल्लेख किया है, रावी, सतलुज और व्यास के मध्य आने वाले क्षेत्र को ही त्रिगर्त कहा गया है। त्रिगर्त का पुराना नाम जालन्धरायण भी था। राजन्यादिगण में इस संदर्भ में उल्लेख मिलता है। त्रिगर्त का उल्लेख आचार्य हेमचन्द्र ने भी किया है। “जालन्धरास्त्रिगर्ता स्युः।” वृहत्संहिता में भी त्रिगर्त की चर्चा है। महाभारत के द्रोण पर्व (अध्याय 282) में त्रिगर्त के सुशर्मचन्द और उसके सुरथि, सुधमी और सुबाहु भाइयों का नाम आता है। इतना ही नहीं, आश्वमेधक पर्व (अध्याय 74) में त्रिगर्त के राजा सूर्यवर्मा का नाम मिलता है। इसी ने अर्जुन का घोड़ा रोका था। इसके दो भाई केतु वर्मा और धृत वर्मा थे। वंशावली के हिसाब से राजा सुशर्मा भूमिचन्द का 23वां वंशज था, इसने कौरवों के पक्ष में महाभारत में भाग ही नहीं लिया था अपितु त्रिगर्तों का नेतृत्व भी किया था। इसे ही कटोच राजवंश की वंशावली में प्रथम और ऐतिहासिक नाम माना जाता है। महाभारत में सुशर्मा और उसके भाइयों को संशप्तक कहा गया है। सुशर्मा ने अर्जुन को मारने की शपथ ली थी। उसने कहा था, “आज हम आप सबके सामने यह शपथ लेते हैं कि या तो यह भूमि अर्जुन से सूनी हो जाएगी या त्रिगर्तों में से कोई इस भूतल पर नहीं रह जाएगा। राजतरंगिणी में इसे कश्मीर के निकट बताया गया है। त्रिगर्त राज्य ने ईसा पूर्व दूसरी शताब्दि में अपनी मुद्राएँ भी चलाई थीं, इन मुद्राओं पर एक ओर ब्राह्मी लिपि में ‘त्रिगर्त ‘ जनपद लिखा है और दूसरी ओर ख़रोष्ठी लिपि है।) ऐसे ही अनेकों ऐतिहासिक,पौराणिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक विवरणों से सुशोभित इस पुस्तक में भीमकाली मंदिर के अनजाने तथ्य, परशुराम और भुंडा यज्ञ जैसे अनेक अध्याय है, जिन्हें पढ़ने पर कब खुद को भूल जाएंगे यह पता तक नहीं चलेगा। आकर्षक आवरण और सुंदर सफेद पन्नों से सुसज्जित यह पुस्तक मेरी दृष्टि में शोधकर्ताओं के लिए एक जीवंत
मार्ग दर्शक और प्रेरक ग्रन्थ है। प्रस्तुति : अजय कुमार झा

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