न तन्हाई, न ग़म : वसन्त लोहनी
न तन्हाई, न ग़म
बोझिल आँखें, नाशाद चेहरा,
भूलने की आदत से खोया सा मैं।
यारों, सोचते होंगे मैं ग़म में हूँ,
पर प्रश्न ग़म का नहीं है।
चाहत की पटरी पर जो चलते हैं,
सपनों में सजी दुल्हन को देखते हैं,
ग़म उन्हीं के संग चलता है।
शून्य आकांक्षा, विश्रांति भरा मन—
ग़म के लिए जगह कहाँ?
हरा-भरा आकांक्षाओं का पौधा देने को,
दिन-रात ‘ना’ कहने की माथापच्ची।
जो शून्य आकांक्षा में बसता है,
वह अंतरिक्ष में तैरता रहता है—
न तन्हाई, न ग़म,
वहाँ ग़म की कोई जगह नहीं।


