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रेणु द्वारा लिखित “नेपाली क्रांति-कथा” का ‘सात सालको कथा’ : के रूप में नेपाली में अनुवाद

 

काठमांडू, 25 फरवरी 2025 । नेपाल में लोकतंत्र के आगमन की 75वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर, इस महत्वपूर्ण संदर्भ को दर्शाती एक पुस्तक “सात साल की कथा” का विमोचन 16 फ़रवरी को किया गया। यह पुस्तक मूल रूप से हिंदी में हिन्दी लेखक फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा “नेपाली क्रांति-कथा” के नाम से लिखी गई थी, जिसे तुलसी भट्टाराई ने नेपाली भाषा में अनुवाद किया और नेपालया प्रकाशन ने “सात साल की कथा” के शीर्षक के तहत प्रकाशित किया।

पुस्तक का ऐतिहासिक महत्व

नेपालया ने अपने बयान में कहा, “104 साल पहले बिहार, भारत में जन्मे लेखक फणीश्वर नाथ रेणु राणा शासन के खिलाफ नेपाली क्रांति में सक्रिय भागीदार थे। इस आंदोलन में शामिल होकर उन्होंने अपने अनुभवों को एक रिपोर्टाज शैली में दर्ज किया, जिसके परिणामस्वरूप ‘नेपाली क्रांति-कथा’ पुस्तक बनी।” यह पुस्तक नेपाल के लोकतांत्रिक संघर्ष और उसमें शामिल लोगों की भावनाओं को जीवंत रूप से प्रस्तुत करती है।
विमोचन समारोह
“सात साल की कथा” का विमोचन काठमांडू में अनुवादक तुलसी भट्टाराई, इंदिरा कोइराला और राजनीति शास्त्री भास्कर गौतम ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर भास्कर गौतम, जो  विद्वान और बिराटनगर के निवासी हैं, ने कहा, “रेणु एक संवेदनशील और मानवतावादी लेखक थे, जो ‘इस देश’ और ‘उस देश’ के बीच भेद नहीं करते थे। उनके हर कार्य में मानवता और स्वतंत्र अस्तित्व की भावना झलकती है।” उन्होंने आगे कहा, “चुरे की ऊंचाइयों से लेकर गंगा के तट तक, उन्होंने लोगों के जीवन, प्रकृति और संस्कृति को साझा रूप में देखा, जो संकीर्ण पक्षपातपूर्ण और राष्ट्रवादी सोच से परे था।”
पुस्तक का योगदान
गौतम ने जोर देकर कहा कि “सात साल की कथा” नेपाली लोकतंत्र को और अधिक प्रेरणा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह पुस्तक न केवल इतिहास का दस्तावेज है, बल्कि यह आज के समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का एक माध्यम भी है।
पुस्तक की उपलब्धता
120 पृष्ठों की यह पुस्तक “सात साल की कथा” 345 नेपाली रुपये में मूल्यांकित की गई है। नेपालया के अनुसार, यह देश भर के प्रमुख किताबों की दुकानों और ऑनलाइन वेबसाइट www.thuprai.com के माध्यम से खरीदी जा सकती है। इसके अलावा, विश्व भर के पाठक इसे अमेजन से सीधे खरीद सकेंगे।
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“सात साल की कथा” नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास और भारत-नेपाल के सांस्कृतिक संबंधों का एक अनूठा संगम है। फणीश्वर नाथ रेणु की लेखनी और तुलसी भट्टाराई का अनुवाद इस पुस्तक को दोनों देशों के पाठकों के लिए एक मूल्यवान उपहार बनाता है। यह पुस्तक न केवल अतीत की याद दिलाती है, बल्कि भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

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