राज्य का भेदभावपूर्ण निर्णय और असमावेशी व्यवहार : निमेष कर्ण
लोक सेवा आयोग की खुली प्रतियोगिता में सबसे योग्य ठहराई गईं डॉ. संगीता कौशल मिश्रा को सचिव पद पर नियुक्त न करना सरकार की पक्षपाती सोच का स्पष्ट प्रमाण है।
नेपाल में प्रशासनिक भेदभाव और असमानता
नेपाल एक बहुजातीय, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है, लेकिन राज्य की भेदभावपूर्ण नीतियों के कारण महिलाओं और हाशिए पर रखे गए समुदायों का प्रशासनिक और राजनीतिक संघर्ष आज भी जारी है। लोकतंत्र की स्थापना और नया संविधान लागू होने के बावजूद, सामाजिक न्याय अभी भी अधूरा है।
नेपाल सरकार का हालिया निर्णय इस बात को फिर से साबित करता है कि समान अवसर और समावेशीकरण केवल नारे तक ही सीमित हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार होने के बावजूद डॉ. संगीता कौशल मिश्रा की अनदेखी करना और उनसे कम योग्य व्यक्ति को नियुक्त करना स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण है।
सचिव पद पर नियुक्ति में भेदभाव
फाल्गुन १२, २०८१ को नेपाल सरकार की सिफारिश समिति ने स्वास्थ्य सचिव के लिए तीन अतिरिक्त सचिवों के नामों की सिफारिश की थी—डॉ. संगीता कौशल मिश्रा, डॉ. विकास देवकोटा और डॉ. टंक बाराकोटी। डॉ. मिश्रा इस सूची में सबसे वरिष्ठ थीं, लेकिन सरकार ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया और उनसे जूनियर व्यक्ति को सचिव बना दिया।
यह निर्णय यह दर्शाता है कि नेपाल सरकार में योग्यता से अधिक राजनीतिक प्रभाव और लैंगिक-पहचान को महत्व दिया जाता है। यह केवल एक महिला के खिलाफ लिया गया अन्यायपूर्ण निर्णय नहीं है, बल्कि यह महिलाओं और मधेशी समुदाय के प्रति गहरे संस्थागत भेदभाव का भी प्रमाण है।
नेपाल प्रशासन में महिलाओं की सीमित भागीदारी
नेपाल सरकार में वर्तमान में कुल ७० सचिव हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ ५ महिलाएं हैं। इनमें से भी ४ महिलाएं आरक्षण कोटे से आई हैं और केवल १ महिला खुली प्रतियोगिता से सचिव बनी हैं।
नेपाल की प्रशासनिक सेवा के ७० वर्षों के इतिहास में, पहली महिला मुख्य सचिव लीलादेवी गड्तौला बनी थीं। इसी तरह, पहली महिला सचिव चंद्रकला किरण (२०४१ साल) और पहली महिला विदेश सचिव सेवा लम्साल (२०८० साल) बनी थीं। इन उदाहरणों से साफ है कि नेपाल में महिला नेतृत्व को अब भी समान अवसर नहीं मिल रहे हैं।
योग्य महिलाओं को प्रशासनिक नेतृत्व से वंचित करना न केवल व्यक्तिगत अन्याय है, बल्कि यह भविष्य में महिलाओं की भागीदारी को भी हतोत्साहित करता है।
महिलाओं और हाशिए पर रखे समुदायों के खिलाफ षड्यंत्र?
नेपाल के सामाजिक ढांचे में महिलाओं, मधेशी, थारू, आदिवासी और दलित समुदायों को सदियों से हाशिए पर रखा गया है। हालांकि सरकार के विभिन्न नीतिगत दस्तावेज लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है।
नेपाल के १६वें पंचवर्षीय योजना में महिला सशक्तिकरण और समान अवसर को प्राथमिकता दी गई थी, लेकिन सरकार के हालिया निर्णय यह साबित करते हैं कि ये केवल कागजी घोषणाएं हैं। जब प्रशासनिक पदों पर निर्णय लेने की बात आती है, तब योग्यता और समानता के बजाय सत्ता और पहाड़ी पुरुष वर्चस्व को महत्व दिया जाता है।
नेपाल के स्वास्थ्य मंत्रालय में पहले भी महिलाओं ने सचिव पद पर बेहतरीन नेतृत्व दिया है, जैसे—
- डा. सुधा शर्मा
- डा. किरण रेग्मी
- डा. पुष्पा चौधरी
- यामकुमारी खतिवडा
- देवकुमारी गुरागाईं
इन महिलाओं ने स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने के बजाय महिला नेतृत्व को हाशिए पर डालने का काम किया है।
सरकार के फैसले पर विरोध और बहस
सरकार के इस फैसले के खिलाफ संसद से लेकर सोशल मीडिया तक तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) की सांसद डॉ. तोसिमा कार्की ने संसद में सवाल उठाया कि—
“क्या पुरुष स्वास्थ्य मंत्री महिला सचिव के साथ काम नहीं कर सकते?”
स्वतंत्र सांसद अमरेश कुमार सिंह, जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) के महासचिव रामकुमार शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता विष्णु कुँवर, पूर्व राजदूत विजयकांत कर्ण, और माओवादी नेता उमेश यादव समेत कई नेताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने सरकार के इस फैसले की आलोचना की है।
समाधान और सुझाव
अगर नेपाल सरकार वास्तव में समावेशीकरण और समानता चाहती है, तो उसे निम्नलिखित सुधारों को लागू करना होगा—
- भर्ती और पदोन्नति में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी ताकि योग्यता के आधार पर पद दिए जाएं।
- राजनीतिक हस्तक्षेप को खत्म करना होगा, क्योंकि प्रशासनिक नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप से संस्थागत क्षमताएं कमजोर होती हैं।
- मधेशी, महिला और अन्य वंचित समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा।
- लोक सेवा आयोग की सिफारिशों को बाध्यकारी बनाने के लिए संवैधानिक प्रावधान लागू करने होंगे।
- समाज के हाशिए पर रखे गए समुदायों के लिए विशेष नीतियां बनानी होंगी, ताकि उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके।
संक्षेप में
नेपाल में प्रशासनिक भेदभाव केवल महिलाओं या मधेशी समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे संस्थागत ढांचे का हिस्सा बन चुका है। सरकार की असमावेशी नीतियां केवल वर्तमान अवसरों को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों का आत्मविश्वास भी कमजोर करती हैं।
स्वास्थ्य सचिव नियुक्ति का यह विवाद नेपाल में संस्थागत भेदभाव, सत्ता की राजनीति और योग्यता की अवहेलना का एक और उदाहरण है। अगर सरकार निष्पक्ष निर्णय लेने में विफल रहती है, तो मधेशी, महिला और अन्य उत्पीड़ित समुदायों को सशक्त आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत निष्पक्षता, समानता और अवसर की गारंटी है। अगर सरकार खुद संविधान के मूल्यों के खिलाफ जाएगी, तो जनता को सड़कों पर उतरकर इसका जवाब देना पड़ेगा। सभी नेपाली नागरिकों को समान अवसर, न्याय और समृद्धि का हिस्सा बनाकर ही नेपाल एक समावेशी, स्थिर और विकसित देश बन सकता है।


