बोधिसत्व डॉ. ऋषिकेश कांबले : डाॅ.राजेंद्र खटाटे

(मार्च महिने के आख़िर में महाराष्ट्र के छत्रपती संभाजीनगर में द्वितीय परिवर्तनवादी साहित्य संमेलन महाराष्ट्र सुप्रसिद्ध समीक्षक तथा विचारक प्रा.डाॅ.ऋषिकेश कांबले जी की अध्यक्षता में संपन्न होने जा रहा है।यह आलेख उनके जीवन कार्य से प्रेरित है।)
” All great men are great dreamers!Man is not only a son of the Heaven, but also a son of the Earth.” ऐसा कन्फ्यूशियस ने कहा था।भारतीय साहित्य में बौद्ध दर्शन का विशेष स्थान है। गौतम बुद्ध मनुष्य को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए और उसे जीवन के यथार्थ सिद्धांतों पर चिंतन कराया। परिवर्तन, दुःख और अनित्यता के सिद्धांतों को स्वीकार कर पूरे विश्व को आत्म-बोध का प्रकाश मार्ग दिखाया। मनुष्य और मानव जीवन बुद्ध के दर्शन के केंद्र में थे।
बौद्ध धर्म के दोनों संप्रदायों (थेरवाद और महायान) में बोधिसत्व की अवधारणा बहुत महत्वपूर्ण है। बोधिसत्व का अर्थ है जिसने बुद्ध बनने का संकल्प लिया है। बोधिसत्व का दूसरा अर्थ वह है जिसने बोधिचित्त उत्पन्न किया है, कर्ता है, और दस प्रज्ञापारमिता (पारलौकिक ज्ञान या ज्ञान की पूर्णता) की साधना भी कर रहा है। बुद्धत्व प्राप्त करना बोधिसत्व के जीवन की पराकाष्ठा है। ज्ञान के आलोक में साहित्य को धर्म मानकर बुद्धत्व की ओर आत्मपथ पर निरंतर अपनी चेतना का निर्माण करने वाले तथा अपने ज्ञान के साधनों का उपयोग कर अपने आसपास के सांसारिक जीवन में ज्ञान प्रेरणा के सृजनात्मक बीज डालने वाले डॉ. ऋषिकेश कांबले महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध समीक्षक तथा विचारक है। इस लेख में मैं डॉ. ऋषिकेश कांबले को बोधिसत्व कहने का साहस उनके ज्ञान की पराकाष्ठा और ज्ञान तथा करुणा की अभिव्यक्ति और नवीनता का जो नया आयाम उन्होंने कविता और सौन्दर्यात्मक सकारात्मक तथा समन्वयात्मक आलोचना के माध्यम से हमें दिखाया है।
बुद्ध ने ‘दुःख’, ‘नश्वरता’ और अनात्मा, क्षणभंगुर प्रकृति का सिद्धांत दिया।यह सिद्धांत निरंतर परिवर्तन का है। यह सिद्धांत साहित्य, कला और संस्कृति में भी पाया जाता है। इस परिवर्तन को स्वीकार करके, व्यक्ति ने स्वयं को ‘महान पूर्णता’ की ओर निर्देशित करना चाहिए। साहित्य भी सामाजिक परिवर्तन का एक मुख्य साधन हो सकता है और अभिव्यक्ति एक आंदोलन। साहित्यिक चेतना सामाजिक परिवर्तन और यथार्थवाद से प्रेरित होने लगती हैं तो सामान्य जीवन भी आंदोलित होने लगता है। इस प्रेरणा ने दलित साहित्य और नारीवादी साहित्य को प्रेरित किया है मनुष्य के उत्पीड़ित और अभिशप्त अंधेरे पक्ष पर ध्यान केंद्रित करते हुए उसे मुक्त कराने के लिए एक आंदोलन शुरू हुआ था और जिसके साहित्यिक प्रेरणा स्रोत हैं डॉ. कांबले.
प्रा. डॉ. ऋषिकेश कांबले महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध लेखक, आलोचक और विचारक हैं, जिन्हें महाराष्ट्र में अम्बेडकरी आंदोलन के भाष्यकार के रूप में जाना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार डॉ. कांबले ने पुनर्जागरण को प्रेरित किया है। उन्होंने अपने जीवन कार्य के माध्यम से एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि साहित्य के माध्यम से भी मूल्यों को बदलकर या पुनर्मूल्यांकन करके जीवन को रूपांतरित किया जा सकता है।
बुद्ध से प्रेरित होकर डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने नव-बौद्धयान का आन्दोलन खड़ा किया और भारतीय समाज को शापित परम्पराओं से मुक्त कराया। उन्हें अम्बेडकरी आंदोलन के नये भाष्यकार के रूप में भी देखा जा सकता है। उन्होंने समन्वयात्मक समीक्षा और नव-बौद्ध धर्म को एक नए आयाम में देखने की दृष्टि स्थापित की है।
सर जी और मेरा परिचय लगभग बीस वर्ष पहले हिंदी के प्रोफेसर डाॅ.मोरे जी कारण हुआ। उस दरम्यान डॉ. मोरे और मैं “ढगो-मेघों” के संप्रदाय पर शोध कार्य कर रहे थे। इस संप्रदाय का महानुभाव संप्रदाय से विवादास्पद संबंध है। तब से डॉ. कांबले सर की जो ऋषितुल्य जैसी छवि ने मुझे प्रभावित किया वह प्रभाव आज भी वैसा ही है। एक व्यक्ति के रूप में, उनका निर्मल मन और एक मित्र के रूप में मुसीबत के समय भी सबके साथ खड़े रहने की इच्छा और ज्ञान की निरंतर खोज ने उनके पास आने वाले हर किसी को उन्होंने प्रभावित किया हैं। मुझे याद है की सर जी का लिखित “भाई, तुम कहाँ हो?” इस नाटक के प्रयोग के लिए वह नासिक आये थे। फिर वै घर आये थे। इस नाटक से सर जी का विद्रोही व्यक्तित्व से निखर कर सामने आता है।उनके व्यक्तित्व से संघर्ष से सृजन की ओर बढ़ने की प्रेरणा हमें बोधिसत्व के गुणों की हमेशा याद दिलाती है।
सर जी के साहित्यिक योगदान पर विचार करें तो ध्यान आता है कि मराठी आलोचना में सौन्दर्य के समन्वयात्मक और सकारात्मक दृष्टि का आयाम सर जी की विचारशीलता और लेखन शैली का अद्भुत परिणाम है जिसके परिणामस्वरूप साहित्य के लौकिक और अलौकिक सिद्धांतों को स्पर्श करके वास्तविकता का एक विशाल दर्शन बनता है।


