प्रधानमंत्री ओली प्रश्नों के उत्तर देने के बजाय सांसदों पर प्रतिप्रश्न ज्यादा करते हैं
काठमांडू, हिमालिनी । नेपाल की प्रतिनिधि सभा में प्रधानमंत्री के साथ प्रश्नोत्तर कार्यक्रम का उद्देश्य सांसदों को सरकार की नीतियों और कार्यों पर सीधे प्रश्न पूछने का अवसर प्रदान करना है, जिससे सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। इस प्रक्रिया के तहत, सांसदों को अपने प्रश्न बैठक से तीन दिन पहले संसद सचिवालय में लिखित रूप में जमा करने होते हैं। संसद सचिवालय इन प्रश्नों की समीक्षा और स्वीकृति के बाद प्रधानमंत्री को अग्रेषित करता है, ताकि वे उत्तर की तैयारी कर सकें।
हालांकि, हाल के सत्रों में यह देखा गया है कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली प्रश्नों के उत्तर देने के बजाय सांसदों पर प्रतिप्रश्न करते हैं या उनकी क्षमताओं पर सवाल उठाते हैं। उदाहरण के लिए, जब सांसद मनिष झा ने विकास कार्यों की धीमी गति पर प्रश्न उठाया, तो प्रधानमंत्री ओली ने झा को विकास कार्यों की प्रगति का स्वयं निरीक्षण करने का सुझाव दिया और उनके प्रश्न को आक्रोशपूर्ण बताया। इसी प्रकार, सांसद प्रभु साह के प्रश्नों को प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत आक्षेप मानते हुए उत्तर देने से इंकार कर दिया।
प्रधानमंत्री का यह प्रतिप्रश्नात्मक रवैया संसद में स्वस्थ संवाद के उद्देश्य को बाधित करता है। सांसदों के प्रश्न जनता की चिंताओं और मुद्दों को प्रतिबिंबित करते हैं, और प्रधानमंत्री का उत्तरदायित्व है कि वे इन प्रश्नों का संजीदगी से उत्तर दें। प्रतिप्रश्न या सांसदों की क्षमताओं पर सवाल उठाने से न केवल संसदीय मर्यादा का उल्लंघन होता है, बल्कि यह सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता को भी कमजोर करता है।
संसदीय प्रश्नोत्तर कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है। इसलिए, यह आवश्यक है कि प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री सांसदों के प्रश्नों का ईमानदारी और स्पष्टता के साथ उत्तर दें, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया सशक्त हो और जनता का विश्वास बना रहे।


