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समय पर बल प्रयोग न करने के कारण ही स्थिति बेकाबू हुई,

 

काठमांडू, 29 मार्च। दुर्गा प्रसाई सहित राजावादी नेताओं के आंदोलन के हिंसक होने की आशंका से सुरक्षा एजेंसियां पहले से अवगत थीं। पुलिस को पहले ही इस आंदोलन की योजना के बारे में जानकारी थी, जिसके चलते उन्होंने शुरू में बल प्रयोग न करने की नीति अपनाई। गृह मंत्रालय ने भी अंतिम उपाय के रूप में ही गोली चलाने का निर्देश दिया था। लेकिन जब तक पुलिस बल प्रयोग करती, तब तक आंदोलन इतना भड़क चुका था कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।

प्रदर्शनकारियों ने निजी घरों, व्यावसायिक भवनों, राजनीतिक दलों के कार्यालयों, सरकारी और निजी वाहनों को क्षतिग्रस्त किया। यहां तक कि जड़ी-बूटी उत्पादन और प्रसंस्करण केंद्र में भी तोड़फोड़ और आगजनी की गई। इस दौरान पुलिस की मौजूदगी नगण्य रही। कोटेश्वर स्थित भाटभटेनी सुपरमार्केट में लूटपाट की घटनाएं भी सामने आईं, लेकिन कर्मचारियों के मुताबिक, खबर देने के 45 मिनट बाद भी पुलिस वहां नहीं पहुंची।

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स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कई स्थानों पर तैनात पुलिसकर्मियों को खुद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता सताने लगी। कोटेश्वर पुलिस कार्यालय में तोड़फोड़ के दौरान भी पुलिस लाचार दिखी। पुलिस सूत्रों के अनुसार, समय पर बल प्रयोग न करने के कारण ही यह स्थिति बनी। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, “गृह मंत्रालय से आदेश था कि यदि किसी आंदोलनकारी की मौत हो जाती है, तो स्थिति और भड़क सकती है, इसलिए बल प्रयोग से बचने को कहा गया। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसी का फायदा उठाया और वे इतने उग्र हो गए कि उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल हो गया।”

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पूर्व पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पुलिस को निष्पक्ष रूप से काम न करने देने का ही नतीजा शुक्रवार की घटना रही। एक पूर्व पुलिस अधिकारी ने कहा, “पहले दंगों को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग करने पर कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी। अब स्थिति यह है कि पुलिस अधिकारी देश की सुरक्षा से ज्यादा अपनी नौकरी बचाने पर ध्यान दे रहे हैं।”

पूर्व एआईजी उत्तमराज सुवेदी के अनुसार, संसाधनों की कमी और गिरते मनोबल के कारण पुलिस प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण नहीं कर पाई। गृह मंत्रालय के सहसचिव छवि रिजाल ने शाम को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि आंदोलन के हिंसक होने की आशंका थी, लेकिन इतनी बड़ी घटना की उम्मीद नहीं थी।

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