यह संसार उसी का है, जिसने सीख लिया प्रेम का पाठ : बसंत चाैधरी
3अप्रैल2025,
जन्मदिन विशेष

जीवन में प्रेम तलाशना, जीवन में प्रेम को जीना और जीवन में प्रेम ही बांटते रहना जिनकी जिंदगी का लक्ष्य है उस संवेदनशील कवि का नाम है बसंत चौधरी । नेपाल के साहित्य जगत में स्थापित नाम और विश्व पटल पर अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने वाले कवि हैं बसंत चौधरी ।प्रेम आपके जीवन का मूल मंत्र है ।आपको यकीन है कि यही वह भाव है, जो अपनों को ही नहीं दुश्मनों को भी अपना बना लेने की क्षमता रखता है । यकीनन प्रेम है तो जीवन है, शायद इसलिए आपकी रचनाओं का मूल भाव प्रेम है ।सुख-दुख, मिलन- विरह, धूप – छांव हर भाव में आपने प्रेम को देखा और उसे ही वर्णित किया । मानवीय गुणों को परत-दर-परत आपने परखा और उसे शब्दों का जामा पहनाया । रिश्ते के महत्त्व को आप जानना चाहते हैं और उसे सम्मान देना जानते हैं ।

आपकी रचित कुछ कविताएँ
1
प्राची की कोर से उठता
ऊर्जा का असीम स्रोत
भरता है मेरे अंदर
असंख्य रश्मि किरण
रक्तिम सूर्य पुंज
से सीखता हूं मैं
बाधाओं को तोड़
आगे बढ़ना
अंधकार को चीर कर
एक अल्प से अल्प
रौशनी को समेटना
ताकि बिखेर दूं
उन किरणों को
उनके लिए
जिनसे मैं हूं ।
सीखता हूं उस
रश्मि पुंज से
निराशाओं में भी
मुस्कुराना
क्योंकि मैं जानता हूं
मेरी क्षीण मुस्कुराहट भी
भर देती है मेरे अपनों को
हिम्मत और उम्मीद से ।
सीखता हूं सूर्य अश्मियों से
तपना और निखरना भी
क्योंकि मैं तप कर
बन जाना चाहता हूं
आहना की खुशियां और
मेघा की छाया ।
हां मैं बन जाना चाहता हूं सूर्य
जलना चाहता हूं, तपना चाहता हूं
और पूरी शिद्दत से
बिखर जाना चाहता हूं
सबके लिए ।
2
खामोशी जब बोलती है
कभी तन्हा नहीं होता
साथ मेरे होती है
मेरी तन्हाई
और उस तन्हाई से
अनगिनत बातें करता हूँ मैं
घेर लेता हूँ खुद को
अकथनीय संवादों के बीच
वो संवाद जो खामोश होते हैं और
जिन्हें सिर्फ मैं सुनता हूँ
मैं बातें करता हूँ अतीत से
वर्तमान से, और कल से भी
क्योंकि मैं जीता हूँ इनके बीच ही
हर पल, हर क्षण
बिना रुके, बिना डिगे ।
मैं संवाद करता हूँ उनसे
जो साथ हैं और
उनसे भी जो खो गए
वक्त की दौड़ में कहीं
क्योंकि वो ही हैं
मेरे होने की वजह
और उनसे ही हैं मेरी साँसें
हाँ ! मेरे साथ जब मैं होता हूँ
तो बोलती हैं मेरी खामोशी भी
और दे जाती है कई अर्थ
मेरे मौन होते व्यक्तित्व को
खामोशी जब बोलती है
तो मैं मिलता हूँ खुद से
और पाता हूँ खुद को
खुद में ही मुखर मौन के साथ ।
3
परमार्थ
देखकर किसी जलते हुए दीये को
अक्सर महसूस करता हूँ
उससे एक आत्मीय रिश्ता
वो दीया, जो दूर करता है
अन्धकार और
फैलाता है उजाला सर्वत्र
मैं भी जलना चाहता हूँ
उसी दीये की भाँति
दूर करना चाहता हूँ
मस्तिष्क पर हावी
अज्ञानता के अंधकार को
संस्कारित करना चाहता हूँ
आत्मा को,
सुवासित करना चाहता हूँ
जुड़े हुए सभी रिश्तों को
जलना चाहता हूँ
सब के लिए, और
खुद के खण्डित होते
अस्तित्व के लिए
हाँ ! परमार्थ के लिए भी ।
4
तालाब
पहाड़ों के पिघलते हिम और
चट्टानों के घर्षण से
निःसृत अर्क हूँ मैं,
चट्टानों का सीना चीर
प्रवाहित झरनों का
निर्मल जल हूँ मैं,
मैं ही समेटता हूँ
पठारों, और मैदानों की
अवांछनीयता को ।
खेत, खलिहान में बिखरे
किसानों के स्वेद कण,
सभी को मैं सहर्ष
समाहित करता हूँ
स्वयं में और
गढ़ता हूँ नव रूप ।
क्योंकि,
मैं नदी नहीं हूँ,
स्थायी, स्थितप्रज्ञ हूँ,
एक ताल या तलैया
या पोखर या तालाब हूँ
सबके लिए समवेत, समान ।
5
सार है जीवन का
देवालय
असंख्य हैं लेकिन
ईश्वर तो उसी का है
जो स्वयं को झुकाना जानता है
अरण्य बहुत हैं
जहाँ अकड़े खड़े हैं
झाड़, झंखड़,
बिखरे हैं काँटें भी
किंतु, फलदार वृक्ष अकड़ता नहीं
फलों, फूलों से आच्छादित होते ही
वह झुक जाता है,
अपना सर्वश्रेष्ठ व सर्वस्व बाँटने के लिए
यह संसार
उसी का है जिसने
सीख लिया प्रेम का पाठ
और यही तो सार है जीवन का
विशेषकर मानवता का ।
प्रस्तुति
श्वेता दीप्ति


