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नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और सरकार की नाकामी: एक विश्लेषण

 

काठमांडू, 1गते बैशाख । नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में बने कांग्रेस–एमाले गठबंधन की सरकार ने अपने नौ महीने पूरे कर लिए हैं। इस अवधि में सरकार की कार्यशैली और उपलब्धियों को लेकर जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच गहरी असंतुष्टि उभर कर आई है। कांग्रेस नेता शेखर कोइराला के साथ कान्तिपुर को दी गई साक्षात्कार में सरकार की विफलताओं और कमजोरियों की स्पष्ट झलक मिलती है।

शेखर कोइराला,
साभार कांतिपुर

सरकार की असफलता पर खुलकर आलोचना

कोइराला ने स्वीकार किया कि गठबंधन सरकार ने जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार बढ़ता गया, सुशासन और जवाबदेही की स्थिति बदतर हुई, और आर्थिक सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। यहां तक कि संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी सरकार ने कोई पहल नहीं की।

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सत्ता में होकर भी प्रभावहीनता का अनुभव

कोइराला ने यह भी कहा कि कांग्रेस सरकार में होने के बावजूद सत्ता से दूर महसूस करती है। उनका तर्क है कि सरकार की प्राथमिकताएं गलत हैं—जनहित के बजाय आन्तरिक शक्ति-संतुलन और पदस्थापनाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। संसद का अधिकांश समय एक अधिकारी को हटाने में ही खर्च हो गया।

जनता से कटाव और विरोध की लहर

सड़कों पर विभिन्न वर्गों—शिक्षक, सहकारी पीड़ित, डॉक्टर—का आंदोलन इस बात का संकेत है कि जनता सरकार से कट चुकी है। कोइराला का मानना है कि यदि सरकार ने शीघ्रता से सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो जनता खुद बदलाव की दिशा तय करेगी।

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संविधान संशोधन की अनदेखी

कोइराला ने बताया कि संविधान के कार्यान्वयन में आई त्रुटियों को ठीक करने की दिशा में सरकार निष्क्रिय रही है। खासकर मधेशी समुदाय और अन्य हाशिये पर रहे समूहों की शिकायतों को संबोधित करने में सरकार पूरी तरह विफल रही है।

राजनीतिक विकल्प की संभावनाएं

हालांकि कोइराला ने सरकार को सुधार का समय देने की बात कही है, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मौजूदा हालात बने रहे, तो सड़क (जनता) ही विकल्प खोजेगी। माओवादी नेता प्रचण्ड द्वारा कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन देने की बात को उन्होंने सावधानीपूर्वक उत्साह के रूप में देखा, लेकिन माओवादी नेताओं के दोहरे बयानों से कांग्रेस के भीतर संदेह भी पैदा हुआ है।

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निष्कर्ष

यह स्पष्ट है कि कांग्रेस–एमाले गठबंधन सरकार ने अपने नौ महीने के कार्यकाल में कोई ठोस उपलब्धि हासिल नहीं की है। कोइराला की बातों से यह भी जाहिर होता है कि राजनीतिक अस्थिरता और अविश्वास की स्थिति बनी हुई है। सरकार यदि समय रहते न सुधरी, तो जनता और विपक्षी ताकतें बदलाव की मांग को लेकर और मुखर हो सकती हैं।

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