तुर्की ने अपना नाम बदल कर ‘तुर्किये’ क्यों रखा : तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा, पुरवाई के पाठकों को बताना चाहेंगे कि तुर्की ने अपना नाम बदल कर ‘तुर्किये’ क्यों रखा। दरअसल मामला कुछ ऐसा है कि तुर्की को अंग्रेज़ी में लिखा जाता था – ‘टर्की’ और टर्की एक पक्षी भी होता है, जिसका गोश्त क्रिसमस त्यौहार के दिनों में ईसाई देशों में ख़ास तौर पर बनाया जाता है। और दूसरी बात यह कि जब कोई इंसान अपने काम में असफल हो जाता है या बेवक़ूफ़ साबित हो जाता है, तो उसके बारे में कहा जाता है कि – “इस मामले में टर्की साबित हुआ!” (“he proved to be a turkey”) इस हिसाब से अंग्रेज़ी में शब्द ‘टर्की’ बेवक़ूफ़ी और असफलता का प्रतीक माना जाता है। अब देखते हैं कि एर्दोगन इस मामले में क्या साबित होते हैं!
भारत में हमेशा कहा जाता है कि दान हमेशा सुपात्र को देना चाहिए। यहाँ तक कि हमारे ऋषि-मुनि तो विद्या भी सुपात्र को ही दिया करते थे। जब तुर्की में 6 फ़रवरी 2023 को एक भीषण भूकंप आया, जिसमें करीब 55,000 लोगों की मृत्यु हो गई थी, तब ‘ऑपरेशन दोस्त’ के तहत भारत ने तुर्की की हरसंभव सहायता की थी।
भारत ने तुर्की को उस समय करीब 7 करोड़ की राहत सामग्री भेजी थी, जिसमें दवाइयां, चिकित्सा उपकरण, भोजन और टेंट आदि शामिल थे। भारत ने एनडीआरएफ की तीन टीमों को भी तुर्की में तैनात किया था। चिकित्सा सेवा के तौर पर भारत ने 60 पैरा फ़ील्ड हॉस्पिटल से 99-सदस्यीय चिकित्सा दल भेजा था। साथ ही भारत ने तुर्की को ड्रोन सहायता भी दी थी। भारत ने गरुड़ एयरोस्पेस के ड्रोनी ड्रोन और किसान ड्रोन भेजे, जो मलबे में फँसे लोगों का पता लगाने और दवाइयां और भोजन पहुँचाने में मददगार रहें।
वहीं हाल ही में तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब इरदुगान (रेजेब तैयप एर्दोगन) ने खुलेआम भारत के ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ की आलोचना की, और पाकिस्तान को तुर्की द्वारा निर्मित ड्रोन भी उपलब्ध करवाए। यही नहीं, उन ड्रोनों को चलाने के लिए सैनिक भी तुर्की ने पाकिस्तान में भेजे। सूचनाएं ऐसी भी मिली हैं, कि उनके दो ड्रोन-ऑपरेटर भी इस संघर्ष में मारे गये। पाठकों को स्मरण रहे कि तुर्की ने वर्तमान भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भारत के विरुद्ध न केवल हर तरह की सैन्य सहायता पाकिस्तान को मुहैय्या करवाई, बल्कि खुल कर भारत के विरुद्ध बयानबाज़ी भी की।
जितने भी देश अस्त्रों-शस्त्रों का उत्पादन करते हैं, वे अपने उत्पादों को दुनिया भर के तमाम देशों को बेचते भी हैं। इसमें किसी अन्य देश को बुरा मानने का कोई हक़ नहीं है। अमेरिका पूरे विश्व को हथियार बेचता है… इसी तरह यूरोप के बहुत से देश और चीन विमान, मिसाईल, रॉकेट आदि की बिक्री करते हैं। मगर हथियार बेचना एक बात है और दो देशों में युद्ध की स्थिति में किसी एक के पक्ष में खड़े होकर दूसरे की आलोचना करना एकदम अलग। तुर्की और अज़रबैजान ने खुले रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया है। इसलिए उनके विरुद्ध भारत को कुछ कठोर निर्णय लेने पड़े हैं।
एक कहावत है कि ‘यार से ग़द्दारी नहीं और ग़द्दार से यारी नहीं!’ अब जब ‘ऑपरेशन दोस्त’ भारत से ग़द्दारी कर चुका है, तो उसे इसका ख़मियाज़ा भी भुगतना होगा। कहते हैं न कि मारना वहाँ चाहिए, जहाँ सबसे अधिक दर्द महसूस हो। इसलिए भारतवासियों ने एकजुट होकर तुर्की के बहिष्कार की घोषणाएं करनी शुरू कर दी हैं। भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है । जबकि विश्व अर्थव्यवस्था सूची में तुर्की का स्थान 17वां है। तुर्की के नेतृत्व को इस बात का ख़्याल रखना चाहिए था।
तुर्की को शौक हो सकता है कि एक बार फिर ‘ऑटोमैन एम्पायर’ खड़ा किया जाए और तुर्की उसका ख़लीफ़ा बन जाए। मगर आज के हालात और आज का तुर्की, उस ज़माने से अलग हैं। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने हमेशा आतंकवादियों का साथ दिया है। ई.ई.यू. के लिए भी तुर्की एक शैतान बच्चे की तरह है, जो किसी भी समय कोई भी शरारत कर सकता है। एर्दोगन से पहले तुर्की एक आधुनिक प्रोग्रेसिव देश बन चुका था। मगर इस भाई ने वापिस अपने मुल्क को खींच कर इस्लामिक रिपब्लिक बना डाला।
एर्दोगन तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मसले में भारत के विरुद्ध और पाकिस्तान के समर्थन में बोलता रहा है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर मुद्दा उठा कर और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ़) में भी मदद करके, पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ाने में परोक्ष रूप से सहायता की है।
तुर्की के पाकिस्तान प्रेम के कारण भारत में उसके विरुद्ध ग़ुस्से की लहर दौड़ चुकी है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और यहाँ आम जनता ही अपनी सरकार चुनती है। इसलिए जनता की आवाज़ की अनदेखी कर पाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। अभी सरकार ने डिप्लोमैटिक स्तर पर कोई कार्यवाही शुरू नहीं की है, मगर भारतीय जनता ने तुर्की के उत्पादों का बहिष्कार करने का शंखनाद कर दिया है।
यहाँ तक कि तुर्की के सेब, ड्राई फ़्रूट और नकली ज्यूलरी के आयात पर रोक लगा दी गई है। तुर्की के लिए अपनी छुट्टियों की सैर बुक कर चुके तमाम सैलानियों ने अपनी बुकिंग कैंसिल करवानी शुरू कर दी है। भारत के व्यापारिक संघों ने अपने दुश्मन देश के दोस्त को सबक़ सिखाने का मन बना लिया है।
2023 में 2.75 लाख भारतीय पर्यटक तुर्की गए थे। 2024 में अनुमानित संख्या 3.25 लाख सैलानियों की थी। अब बुकिंग 20–25% तक गिर चुकी है। कई टूर ऑपरेटरों ने बुकिंग रोक दी है। सेब बाजार में तुर्की के सेब के आयात में गिरावट दिखाई दे रही है। भारत में तुर्की से 1.6 लाख टन सेब आयात किया जाता है। कुल सेब बाजार में तुर्की की लगभग 6-8% हिस्सेदारी है। अब ग्राहक तुर्की सेब खरीदने से इंकार कर रहे हैं। सेब उत्पादक संघ ने भी तुर्की से सेब मँगवाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की है।
भारत के बहुत से विश्वविद्यालयों ने भी तुर्की के विश्वविद्यालयों के साथ अपना-अपना समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) रद्द कर दिया है। इनमें जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जे.एन.यू.), जामिया मिलिया इस्लामिया एवं इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी आदि शामिल हैं। भारत सरकार तुर्की को अपने दुश्मन के रूप में घोषित करे या ना करे, भारत की जनता ने यह तय कर लिया है, कि तुर्की के साथ वही सुलूक किया जाए, जो मालदीव के साथ किया गया था।
यदि भारत-पाकिस्तान संघर्ष में तुर्की ने अपना असली चेहरा न दिखाया होता, तो एक राज़ से कभी भी पर्दा न उठ पाता कि तुर्की की एक कंपनी ‘सेलेबी’ भारत के 9 हवाई अड्डों पर यात्री एवं कार्गो हैंडलिंग करती है। जिनमें मुंबई, दिल्ली, कोच्चि, कन्नूर, बेंगलुरु, हैदराबाद, गोवा, अहमदाबाद व चेन्नई जैसे प्रमुख भारतीय हवाई अड्डे शामिल हैं।
‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’, तुर्की की सेलेबी ग्रुप का हिस्सा है। समाचार तो यह भी है कि इस कंपनी के मालिकों में तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन की पुत्री सुमेये एर्दोगन भी शामिल है। जैसे, कहा जाता है कि एक तो करेला, दूजे नीम चढ़ा… उसी की तर्ज़ पर बताया जाए तो सुमेये एर्दोगन के पति का नाम है सेल्कुक बेरागटार। यह वही व्यक्ति है जो कि बेराकटार सैन्य ड्रोन का उत्पादन करता है। इसी ड्रोन का इस्तेमाल पाकिस्तान ने हाल ही के संघर्ष में भारत के विरुद्ध किया था।
हैरानी तो यह होती है कि जिस देश (तुर्की) ने भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान खुल कर पाकिस्तान का साथ दिया, उसी देश की कंपनी ‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’ दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के उस क्षेत्र के ठीक सामने काम करती रही है, जहाँ से भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं अन्य वीवीआईपी उड़ान भरते हैं। एअरफ़ोर्स के विशेष विमान भी वहीं से उड़ानें भरती हैं। ऐसे में यदि सेलेबी के कर्मचारी अपने मालिकों के दबाव तले कुछ गोपनीय जानकारी तुर्की के माध्यम से पाकिस्तान तक पहुँचा देते, तो कितना अनर्थ हो सकता था।
भारतीय जनता के दबाव तले भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन रेड्डी ने ‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’ की भारत में काम करने के लिए आवश्यक सुरक्षा मंजूरी रद्द कर दी है। सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी कुछ चिंताएं व्यक्त की हैं, लेकिन इस बारे में खुलकर कुछ नहीं कहा है। भारत के नियमों के अनुसार, एयरपोर्ट पर आवश्यक सेवाएं देने वाली कंपनियों के लिए यह मंज़ूरी अनिवार्य है। इन सेवाओं में यात्रियों और सामान का प्रबंधन शामिल है।
‘सेलेबी एयरपोर्ट सर्विसेज इंडिया’ ने भारत सरकार के उस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें कंपनी की सिक्योरिटी क्लीयरेंस रद्द कर दी गई थी। कंपनी का कहना है कि ये फैसला बिना किसी तर्क के ‘अस्पष्ट’ राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर लिया गया है। इसके लिए कोई पूर्व चेतावनी भी नहीं दी गई थी। इस फैसले से न सिर्फ 3791 नौकरियों पर असर पड़ेगा, बल्कि विदेशी निवेशकों का भरोसा भी डगमगाएगा।



