बहुमत वाली वर्तमान सरकार पर नागरिक समाज के अगुवाओं ने गंभीर आपत्ति जताई

बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में चल रही और राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी शामिल लगभग दो-तिहाई बहुमत वाली वर्तमान सरकार पर नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार करने का आरोप लगाते हुए नागरिक समाज के अगुवाओं ने गंभीर आपत्ति जताई है।
28 बुद्धिजीवियों ने एक संयुक्त नागरिक अपील जारी कर सरकार से निरंकुश शासन शैली को तुरंत रोकने की मांग की है।
नागरिक अगुवाओं ने सुकुम्बासी बस्तियों को बंदूक के बल पर अचानक खाली कराए जाने, संसद को दरकिनार कर अध्यादेश के माध्यम से शासन चलाने की प्रवृत्ति तथा संघ–संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी को सरकार के सर्वसत्तावादी रुझान का संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि सुकुम्बासी बस्तियों के उजड़ने से दो लोगों ने आत्महत्या की, और गर्भवती महिलाओं, प्रसूताओं तथा बच्चों के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हुआ है। इसलिए उन्होंने विस्थापन से पहले उचित पुनर्वास और आवास के अधिकार की गारंटी सुनिश्चित करने के लिए सरकार को सचेत किया है।
अपील में कहा गया है, “निहत्थे नागरिकों को रहने के लिए समय तक न देकर रातोंरात सुरक्षाकर्मियों को तैनात करना और रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे पत्रकारों पर प्रतिबंध लगाना तानाशाही की पराकाष्ठा है।”
नागरिक समाज का मानना है कि संसद का अधिवेशन बुलाए जाने के बाद भी बैठक न कर उसे स्थगित करना और अध्यादेश के रास्ते शासन चलाना संसदीय प्रणाली और संवैधानिक मूल्यों का खुला उल्लंघन है।
इसी तरह, सरकार द्वारा राजनीतिक विचारधारा के आधार पर छात्र संगठनों और ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश को संविधान के अनुच्छेद 17 द्वारा प्रदत्त संगठन बनाने की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया गया है। विश्वविद्यालयों में दलगत राजनीति समाप्त करने के बहाने अध्यादेश के जरिए पदाधिकारियों को हटाने तथा न्यायपालिका में हस्तक्षेप बढ़ाने की मंशा पर भी चिंता व्यक्त की गई है।
नीलाम्बर आचार्य, खगेन्द्र सङ्ग्रौला, कनकमणि दीक्षित, सुशील प्याकुरेल, नारायण वाग्ले सहित 28 हस्ताक्षरकर्ताओं ने सरकार से संघीयता की भावना को समझने और केंद्रीकृत शासन की ओर न बढ़ने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि सरकार अपने चुनावी वादों और सौ बिंदु प्रतिबद्धताओं के विपरीत काम कर रही है, इसलिए उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौटना चाहिए।