सरकार बनाम सत्ता: नेपाल के ३५ वर्षों के शक्ति संघर्ष : डॉ.विधुप्रकाश कायस्थ
डॉ. विधुप्रकाश कायस्थ, काठमांडू, १८ अगस्त। राजनीति विज्ञान और संचार-विश्लेषण के दृष्टिकोण से ‘सरकार में होना’ और ‘सत्ता में होना’ को सामान्यतः एक ही अर्थ में देख लिया जाता है। किंतु व्यावहारिक रूप से ये दोनों पूरी तरह से भिन्न अवधारणाएं हैं। सरकार एक औपचारिक निकाय है, जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार आवधिक चुनावों या संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से एक निश्चित अवधि के लिए मंत्रिपरिषद का संचालन करती है। वहीं दूसरी ओर, सत्ता वह अदृश्य और स्थायी शक्ति संरचना है जो राज्य व्यवस्था के भीतर गहराई से जमी हुई है—जिसमें नौकरशाही, सेना-पुलिस तंत्र, न्यायपालिका, बड़े कॉर्पोरेट एवं व्यापारिक घराने, मीडिया और आंतरिक तथा बाह्य भू-राजनीतिक शक्तियां शामिल हैं।
साधारण शब्दों में कहें तो: सरकार बदलना केवल सिनेमाहॉल में चल रही फिल्म या उसके पात्रों को बदलने जैसा है, जबकि सत्ता में होने का अर्थ हॉल की चाबी, प्रोजेक्टर और निर्देशक की कुर्सी पर नियंत्रण होना है। सन् १९९० के जनआंदोलन से लेकर वर्तमान तक नेपाल के पिछले ३५ वर्षों के राजनीतिक इतिहास का गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो ‘सरकार में होना’ और ‘सत्ता में होना’ के बीच का यही अंतर और शक्ति-संघर्ष का कुरुक्षेत्र स्पष्ट रूप से उजागर होता है।
१. १९९० का परिवर्तन और लोकतांत्रिक अभ्यास: ‘सरकार में कांग्रेस, सत्ता में दरबार’
१९९० के ऐतिहासिक जनआंदोलन ने निर्दलीय पंचायत व्यवस्था का अंत करते हुए देश में बहुदलीय लोकतंत्र और संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना की। १९९१ के आम चुनावों के बाद नेपाली कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया और गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व में एक निर्वाचित सरकार बनी।
लेकिन क्या वह सरकार वास्तव में सत्ता में थी?
उस दशक के राजनीतिक घटनाक्रमों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि जन-निर्वाचित सरकार केवल ‘सिंहदरबार की कुर्सियों’ तक ही सीमित थी। सत्ता की वास्तविक चाबी अभी भी निर्मल निवास और जंगी अड्डा (राजदरबार और सेना) के नियंत्रण में थी। यद्यपि संविधान के अनुसार राजा ‘संवैधानिक’ थे, फिर भी वे शाही नेपाली सेना के सर्वोच्च सेनापति बने रहे, और नौकरशाही तथा कूटनीतिक तंत्र में राजशाही-समर्थित संभ्रांत वर्ग का ही वर्चस्व रहा।
इस स्थिति का सबसे उग्र रूप २००१ के राजदरबार हत्याकांड के बाद उत्पन्न संकट में देखने को मिला। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री कोइराला ने माओवादी विद्रोह को नियंत्रित करने के लिए सेना तैनात करने का प्रयास किया, तो सेनापति ने प्रधानमंत्री के आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप, प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। जन-निर्वाचित प्रधानमंत्री की तुलना में सेनापति और राजा का अधिक प्रभावशाली होना यह स्पष्ट करता है कि सरकार भले ही कांग्रेस या अन्य दलों की हो, वास्तविक सत्ता राजदरबार के पास ही थी।
२. माओवादी विद्रोह और ‘दोहरी सत्ता’ का अभ्यास
१९९६ से शुरू हुए माओवादी सशस्त्र संघर्ष ने ‘सरकार’ और ‘सत्ता’ के बीच के अंतर को और अधिक सतह पर ला दिया। काठमांडू में सरकारें बार-बार बदलती रहीं—कभी एमाले, कभी कांग्रेस, तो कभी संयुक्त सरकारें बनीं। लेकिन देश के विशाल ग्रामीण हिस्सों में काठमांडू सरकार की उपस्थिति नाममात्र की रह गई थी।
माओवादियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी ‘जनसरकार’ और ‘जनअदालतें’ गठित करके सत्ता का एक वैकल्पिक केंद्र संचालित किया। काठमांडू स्थित सरकार के पास औपचारिक राज्य तंत्र और अंतरराष्ट्रीय मान्यता तो थी, लेकिन देश के बड़े भूभाग पर वास्तविक नियंत्रण माओवादियों के पास था। इस दौर ने यह स्पष्ट रूप से उजागर किया कि किसी राष्ट्र के भीतर राज्य-सत्ता किस प्रकार विभाजित और विखंडित हो सकती है।
३. २००६ का आंदोलन और गणतंत्र: पात्र बदले, संरचना वही रही
२००६ के जनआंदोलन ने २४० वर्ष पुराने राजतंत्र का अंत कर दिया और देश को एक धर्मनिरपेक्ष, संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य में प्रवेश कराया। राजनीतिक दलों का मानना था कि राजतंत्र के पतन के बाद सरकार और राज्य-सत्ता दोनों स्वाभाविक रूप से उनके हाथों में आ जाएंगे।
लेकिन, गणतांत्रिक व्यवस्था के लगभग दो दशकों बाद भी इस संरचनात्मक स्थिति में कोई मौलिक बदलाव नहीं आया है।
२००८ में, सीपीएन (माओवादी) के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’ भारी जनादेश के साथ देश के प्रधानमंत्री बने। हालांकि, तत्कालीन सेनापति (रुक्मांगद कटवाल) विवाद के दौरान प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकारी फैसले को राष्ट्रपति और स्थायी राज्य-संयंत्र द्वारा निष्प्रभावी कर दिया गया। प्रचंड सरकार चला रहे थे, लेकिन सेना, न्यायपालिका और प्रशासनिक ढांचा उनके नियंत्रण से बाहर था। अंततः, केवल ९ महीनों के भीतर ही उन्हें यह अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति करते हुए इस्तीफा देना पड़ा: “मैं सरकार में तो हूं, लेकिन सत्ता में नहीं।”
इस घटना ने यह साबित कर दिया कि चुनाव जीतकर मंत्री या प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाना ही सत्ता पर कब्जा कर लेना नहीं है। जब तक राज्य के स्थायी अंगों को अपने अनुकूल नहीं ढाला जाता, तब तक सरकार एक मूकदर्शक और लाचार निकाय बनी रहती है।
४. ‘दीप स्टेट’ (Deep State) और मौन की संस्कृति
नेपाल के पिछले ३५ वर्षों का विश्लेषण करने पर निर्वाचित सरकार से भी अधिक शक्तिशाली एक अदृश्य शक्ति संरचना का सुदृढ़ीकरण दिखाई देता है—जिसे आधुनिक राजनीति विज्ञान में ‘दीप स्टेट’ या ‘छाया सत्ता’ कहा जाता है।
नेपाल के संदर्भ में, इस छाया सत्ता के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:
- स्थायी नौकरशाही: सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन सिविल सेवा का ढांचा स्थायी रहता है। नीतिगत निर्णयों में देरी करने, अपने हितों के अनुकूल कानूनों का मसौदा तैयार करने और राजनीतिक नेतृत्व को भटकाने में नौकरशाही हमेशा हावी रही है।
- दलाल पूंजीवाद, बिचौलिए और मीडिया-कॉर्पोरेट गठजोड़: हाल के दशकों में बड़े व्यापारी, बिचौलिए और वित्तीय हित-समूह सांसदों या मंत्रियों से भी अधिक प्रभावशाली बनकर उभरे हैं। ये समूह कानूनों में संशोधन करने, कर दरों में हेरफेर करने और अपने अनुकूल मंत्रियों की नियुक्ति तक को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
- न्यायपालिका और संवैधानिक निकाय: शक्ति संतुलन को बदलने में न्यायिक और जांच निकायों की निर्णायक भूमिका लोकमान सिंह कार्की प्रकरण और सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों से स्पष्ट हो चुकी है। कई अवसरों पर निर्वाचित सरकार के निर्णयों को एक ही न्यायिक आदेश से निरस्त कर दिया गया।
- भू-राजनीतिक प्रभाव: नेपाल की संवेदनशीलता के कारण पड़ोसी देशों और वैश्विक शक्तियों की भूमिका घरेलू राजनीतिक समीकरणों को आकार देने में हमेशा निर्णायक रही है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, वैदेशिक कूटनीतिक प्रभाव और हस्तक्षेप सत्ता संचालन का एक बड़ा कारक बना रहता है।
इसी संरचना के भीतर एक व्यापक ‘मौन की संस्कृति’ को बढ़ावा दिया गया है, जो राज्य की गलतियों, नीतिगत भ्रष्टाचार और संस्थागत विफलताओं के खिलाफ नागरिक स्तर पर होने वाले आवश्यक हस्तक्षेप और जवाबदेही को दबाती है।
५. अस्थिरता का चक्र: निरंतर बदलती सरकारें, अपरिवर्तनीय सत्ता
विगत ३५ वर्षों में नेपाल ने ३० से अधिक सरकारें देखी हैं, जहाँ औसतन हर एक से डेढ़ साल में सरकारें बदलती रही हैं। २०१७ के आम चुनावों के बाद तत्कालीन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) को संसद में लगभग दो-तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ। जनता का विश्वास था कि एक मजबूत बहुमत वाली सरकार सत्ता का प्रभावी उपयोग करके देश में राजनीतिक स्थिरता और विकास लाएगी।
लेकिन, वह विशाल जनमत प्राप्त सरकार भी आंतरिक गुटबाजी, न्यायिक हस्तक्षेप और शक्ति-संघर्ष के बोझ तले ढह गई। इसने पुनः इस मौलिक सत्य की पुष्टि की कि संसद में बहुमत हासिल कर लेना और सरकार बना लेना ही वास्तविक सत्ता पर अधिकार जमाना नहीं है। जब तक प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति केंद्रों, पार्टी के आंतरिक गुटों और अदृश्य तंत्रों के बीच संतुलन नहीं बनता, तब तक एक मजबूत सरकार भी ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।
निष्कर्ष
नेपाल के पिछले ३५ वर्षों का राजनीतिक इतिहास केवल सरकारों के बनने और गिरने की श्रृंखला मात्र नहीं है; यह ‘सरकार में होने’ और ‘सत्ता में होने’ के बीच के निरंतर संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज है। राजनीतिक दलों ने चुनाव जीतने और सिंहदरबार की कुर्सियों पर कब्जा करने को ही सत्ता की अंतिम प्राप्ति मान लिया। परंतु वास्तविक सत्ता तो राज्य की स्थायी संरचनाओं, नौकरशाही संभ्रांत वर्ग, बिचौलियों के नेटवर्क और बाह्य शक्तियों के हाथों में ही उलझी रही।
सरकारें अल्पकालिक होती हैं, परंतु सत्ता संरचनाएं दीर्घकालिक और स्थायी होती हैं। जब तक राजनीतिक नेतृत्व सरकार में रहने के समय का उपयोग संस्थागत सुधारों, पारदर्शी संचार प्रणाली और समावेशी प्रगतिशीलता के माध्यम से राज्य के स्थायी अंगों—न्यायपालिका, सेना, पुलिस और नौकरशाही—को जनता के प्रति पारदर्शी और जवाबदेह बनाने में नहीं करता, तब तक केवल “सरकार में होना” अर्थहीन रहेगा।
एक समृद्ध और स्थिर नेपाल का निर्माण करने के लिए राजनीतिक दलों को सरकारें गिराने और बनाने के इस निरंतर खेल से ऊपर उठना होगा। आज की प्राथमिक आवश्यकता वास्तविक राज्य-सत्ता को जनता की संप्रभुता, संविधान की भावना, संस्थागत सुधारों और समावेशी समृद्धि के मार्ग पर पुनर्गठित करने की है।

पत्रकार, लेखक और मीडिया शिक्षक हैं।


