सिंदूर या बज्र ? : अजय झा
हर रूप, वस्तु, स्थान, घटना, विचार और धैर्य का एक सीमा जरूर होती है। हिंदुओं के सहिष्णुता, सहकार्य, भाईचारा तथा उदार व्यवहार और संस्कार को दुनियां ने जी भरकर लुटा, धोखा दिया, छल किया, लेकिन हिन्दू छाती पर पत्थर रखकर सहता रहा। लेकिन उरी आक्रमण और सर्जिकल स्ट्राइक ने हिंदू के धैर्य के बांध को अल्पांश ही सही, लेकिन चरमरा के रख दिया। इसी तरह चीन के साथ डॉक्लाम भिड़ंत के बाद विश्व ने हिंदुओं के आक्रामक रूप को भी महसूस कर लिया। फिरभी हिंदू धार भारतीय सरकार ने वैश्विक स्तर पर शांति और भाईचारा स्थापित करने के उद्देश्य से अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, इस्लामिक देश लगायत संसार के सभी देशों का भ्रमण कर आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए अथक प्रयास किया। लेकिन धार्मिक कट्टरता के अनुयायी यूरोप, अमेरिका और इस्लामिक देश को सिर्फ हिन्दू से नफरत है और वह अनेक योजना तथा षडयंत्र रचकर भारत से हिन्दू को समाप्त करने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जेहादियों और कट्टरपंथियों को सहयोग देना जारी रखें हैं। अमेरिका और तुर्की को दिल खोलकर सहयोग करने पर भी भारत के विरुद्ध आतंकियों के समर्थन में खुलकर सामने आना भविष्य में भीषण दुर्घटना का संकेत दे रहा है।
आज भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति ही नहीं, विश्वशक्ति बन गया है। परन्तु देश के भीतर और बाहर के शत्रुओं से घिरे होने के कारण पैर में जंजीर सा अनुभव कर रहा है। जिसके संरक्षण और संवर्धन के लिए मोदी सरकार काम करना चाहती है वही अवरोध उत्पन्न करने लगता है। विपक्षी दलों के नेतृत्व शत्रु के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। शायद हिंदुओं के सैकड़ों वर्ष के गुलामी का प्रमुख कारण यही रहा है। क्योंकि बिना बीज के वृक्ष उत्पन्न नहीं होते। कुछ हिंदुओं में पहले से भलेही स्वाभिमान जागृत हुई हो परन्तु अधिकांश लोग आज भी जाती और क्षुद्र राजनीतिक दलों के गुलामी में ही अपना सुरक्षित भविष्य देखते हैं। जिस शत्रु के पक्ष में खड़े होकर ए लोग राष्ट्रीयता का अपमान करते हैं वही लोग इनके सगे भाइयों और कुटुंबियों को खुलेआम पाकिस्ता और बांग्लादेश में कत्लेआम कर रहे हैं। बंगाल और दक्षिण भारत से मारकर भगा रहे हैं। आखिर हम समझ क्यों नहीं पाते?
वास्तव में यह सभ्यता बनाम बर्बरता का संघर्ष है। एक ओर पाकिस्तान है-ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाला, एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में वर्षों तक का दागी, हिंदू, सिख, ईसाई, शिया, अहमदी-सभी को अस्तित्वहीन करनेवाला। एक ऐसा कबीलाई हुजूम जहां बाल-विवाह, भीड़ द्वारा हत्या और स्त्रियों के अधिकारों को रौंदना सामान्य ही नहीं, बल्कि सही समझा जाता है। दूसरी ओर भारत है-20 करोड़ मुसलमानों के साथ लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व के पथ पर बढ़ता एक सभ्य, संस्कारी संस्कृति संरक्षकों का देश। अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी मानवाधिकारों को सम्मान करनेवाला सुसभ्य देश। अतः अब विश्वको तय करना है- ‘यह संघर्ष भारत बनाम पाकिस्तान नहीं, यह संघर्ष सभ्यता बनाम बर्बरता है।’
अब यह स्पष्ट है कि बर्बर लोगों के साथ बातचीत से नहीं, दीर्घकालीन योजना, तकनीक और साहस के साथ अपनी हित सर्वोपरि रखते हुए भीषण आक्रामक रुख को अपनाते हुए प्रत्युत्तर दिया जाए। सिंदूर आपरेशन आतंकवाद विरुद्ध एक वैचारिक परन्तु ठोस योजनाबद्ध प्रतिक्रिया है। सभ्यतागत आक्रमण को झेल रहे या इस खतरे की गंभीरता को समझने वाले संवेदनशील देशों को साथ लेते हुए आतंकवाद विरुद्ध वृहद सांगठनिक दिशा में भारत को बढ़ना होगा, यानी सभ्यताओं की रक्षा हेतु वैश्विक गठबंधन ।
अपरेशन सिंदूर अभियान के पश्चात् विश्व के हिंदू युवाओं द्वारा सोशल मीडिया, रैलियों और वक्तव्यों के माध्यम से जो अपनत्व और समर्थन का अद्वितीय भाव संप्रेषण किया गया उससे यह सिद्ध होता है कि विधर्मियों के लिए यह केवल राज्य की सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक विशाल जन आकांक्षा थी-एक व्यापक वैश्विक हिंदुत्व का भाव था।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दू अब बदल चुका है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक के प्रत्येक हिन्दू अपनी अस्मिता की रक्षा हेतु कदम से कदम मिलाके चलने को तैयार हैं। यह अब केवल सामरिक लड़ाई नहीं है, रणनीतिक और वैचारिक संकीर्णता को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए सूक्ष्म व्याख्याओं के द्वारा समग्र निर्णयों और क्रियाओं का पुनः परिभाषित कर वैश्विक पटल पर दूरगामी प्रभाव को हृदयांकित करने का समय भी है।
ऑस्ट्रियाई सैन्य इतिहासकार टॉम कूपर ने भारत की इस सैन्य कार्रवाई को ‘स्पष्ट विजय’ और ‘रणनीतिक सटीकता’ की मिसाल बताया। उनके शब्दों में, ‘भारत की योजना निर्णायक थी, पाकिस्तान की परमाणु धमकी विफल रही। ‘अर्बन वॉरफेयर स्टडीज के प्रमुख जॉन स्पेंसर ने इसे ‘रणनीतिक संयम और निर्णायक आक्रमण’ का दुर्लभ उदाहरण बताते हुए कहा-‘भारत अब किसी बाहरी दबाव के बिना अपने शत्रुओं को जवाब देने में सक्षम है।’
भारत ने संघर्ष विराम के साथ वैश्विक जगत को यह अंतिम संदेश भी दिया-‘अब कोई संवाद तभी, जब पाकिस्तान अपनी ज़मीन से आतंकवाद का पूर्ण सफाया करे।’ भारत की नीति अब स्पष्ट है- ‘जो आतंक का समर्थन करेगा, वह शत्रु की श्रेणी में आएगा।’
शांति और क्षमाशीलता को नए ढंग से परिभाषित करते हुए भारत ने कहा ‘शांति की आकांक्षा उसी की शोभा है, जो शक्ति में सर्वोच्च है।’ भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि वह शांति का पक्षधर अवश्य है, परंतु ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के साथ शक्ति और सामर्थ्य से समीकरणों को सिद्ध करना भी उसे भली भांति आता है। दिनकर की पंक्तियां हैं- क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन विष रहित विनीत सरल हो।।

