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मैं झोले हूँ, पीएम ओली का ‘झोले अभियान’, मोदी के ‘मैं भी चौकीदार’ से मिलती है प्रेरणा

 

काठमांडू, 19 जेठ (3 जून 2025):
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने हाल ही में सोशल मीडिया पर चल रही आलोचनाओं का जवाब देने के लिए एक नया प्रचार अभियान शुरू किया है, जिसे उन्होंने ‘मैं झोले हूँ’ नाम दिया है। यह अभियान काफी हद तक भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2019 के “मैं भी चौकीदार” अभियान से प्रेरित माना जा रहा है।

क्या है ‘झोले’ अभियान का कारण?

नेपाल की राजनीति और विशेषकर ओली की पार्टी एमाले (CPN-UML) के लिए सोशल मीडिया लंबे समय से समर्थन और आलोचना का मुख्य मंच रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में ओली और उनकी पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट आई है। इतना कि सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री की प्रशंसा करने वालों को भी “झोले” कहकर ट्रोल किया जाने लगा।

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हाल ही में गायक प्रकाश सपूत ने ओली की तारीफ की थी, जिससे उनकी फिल्म बसन्त को आलोचना झेलनी पड़ी। इसी पृष्ठभूमि में ओली ने खुद को “झोले” बताते हुए इसे गर्व की बात कहने वाला अभियान शुरू किया।

क्या बोले प्रधानमंत्री ओली?

एमाले के बुद्धिजीवी परिषद के ११वें महाधिवेशन में ओली ने कहा:

“म जनताको झोला बोक्ने झोले हुँ, गौरवको झोला बोक्ने झोले हुँ। झोले हुँदा पनि के आपत्ति?”
(मैं जनता की भलाई का झोला उठाने वाला झोले हूँ, इसमें शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व है।)

बाद में ओली ने फेसबुक पर एक पोस्टर शेयर किया जिसमें उन्होंने लिखा:

“मैं झोले हूँ। सामंती परिवार का दास बनने से बेहतर है कि देश के विकास और परिवर्तन का झोला उठाया जाए।”

कैसे शुरू हुआ यह अभियान?

सूत्रों के अनुसार यह कोई पार्टी स्तर पर बना रणनीतिक अभियान नहीं था। प्रधानमंत्री के करीबी कुछ युवाओं ने उनके भाषण से प्रेरित होकर यह पोस्टर बनाया, जिसे ओली ने शेयर कर दिया। इसके बाद उपप्रधानमंत्री विष्णु पौडेल, महासचिव शंकर पोखरेल और अन्य नेताओं ने भी इसे शेयर किया।

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एमाले के उपमहासचिव प्रदीप ज्ञवाली ने इसे राजावादी प्रवृत्तियों के खिलाफ खड़ा किया गया अभियान बताते हुए कहा कि “राजनीतिक कार्यकर्ताओं और विचारधाराओं को ‘झोले’ कहकर चुप कराने की कोशिशों का विरोध जरूरी है।”

समर्थन और आलोचना दोनों जारी

जहाँ एमाले समर्थकों ने इसे अपनाया है, वहीं सोशल मीडिया पर आम जनता और विपक्षी खेमे में इस पर तीखी आलोचना भी हो रही है। आलोचकों का कहना है कि यह अभियान आत्मरक्षात्मक मुद्रा में उठाया गया एक पब्लिसिटी स्टंट है, और इससे जमीनी राजनीति में कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।

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पृष्ठभूमि में ‘साइबर सेना’ की भूमिका

ओली पहले भी सोशल मीडिया पर प्रभाव बनाने के लिए ‘साइबर सेना’ गठित कर चुके हैं। लेकिन समय के साथ यह प्रयास उल्टा पड़ा और एमाले को ही कई बार रक्षात्मक स्थिति में आना पड़ा।

ओली का ‘झोले अभियान’ एक प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया है, जो यह दिखाता है कि नेपाल की राजनीति में अब सोशल मीडिया केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि छवि निर्माण और संघर्ष का मुख्य मैदान बन चुका है।

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