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पूर्व एसपी रमेश्वर यादव की सज़ा पर सवाल: कानूनी जानकारों ने उठाया भेदभाव और अन्याय का मुद्दा

 

काठमांडू, 7 जून – पूर्व पुलिस उपरीक्षक (एसपी) रमेश्वर प्रसाद यादव की भ्रष्टाचार मामले में सर्वोच्च अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने को लेकर कानूनी विशेषज्ञों ने गहरी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि विशेष अदालत से बरी किए जाने के बावजूद सर्वोच्च अदालत द्वारा सज़ा सुनाया जाना कानूनी त्रुटियों से भरा हुआ फैसला है, जिसे अब पुनरावलोकन का मौका भी नहीं बचा है।

मधेशी पत्रकार समाज द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि यादव को विशेष अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने २०७१ चैत २८ गते (11 अप्रैल 2015) को बरी कर दिया था। लेकिन अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग की अपील के बाद सर्वोच्च अदालत की दो सदस्यीय पीठ ने २०७९ मंसिर ४ गते (20 नवंबर 2022) को इस फैसले को उलटते हुए यादव को चार महीने कैद और 97,500 रूपैयाँ जुर्माने की सज़ा सुना दी।

भ्रष्टाचार का आरोप एक साजिश थी: यादव का दावा

रमेश्वर यादव ने खुद कार्यक्रम में बताया कि उन्होंने सज़ा भुगत ली है और जुर्माना भी चुका चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वह रूपन्देही में कार्यरत थे, तब एक वरिष्ठ अधिकारी की अनियमितता उजागर करने के बाद उनके खिलाफ झूठा भ्रष्टाचार का मामला गढ़ा गया। यादव का दावा है कि जिसे घूस देने वाला बताया गया, उसी ने अदालत में उन्हें निर्दोष बताया था, फिर भी उन्हें सज़ा दी गई।

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पदोन्नति रोकी गई, योग्यता के बावजूद भेदभाव: अधिवक्ताओं का आरोप

वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण ज्ञवाली ने आरोप लगाया कि यादव एक योग्य मधेशी अधिकारी थे, जिनमें नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक (आईजीपी) तक पहुँचने की क्षमता थी। लेकिन उन पर साज़िश के तहत भ्रष्टाचार का मामला लाद दिया गया। ज्ञवाली ने कहा, “सर्वोच्च अदालत ने इसी तरह के अन्य मामलों में भिन्न फैसला किया है, यह फैसला पक्षपातपूर्ण लगता है।”

उन्होंने सुशील यादव की आत्महत्या का उदाहरण देते हुए कहा, “उन्हें डिआइजी न बनाकर कनिष्ठ अधिकारियों को तरक्की दी गई, जिससे आहत होकर उन्होंने जान दे दी। मधेशी अधिकारियों को योजनाबद्ध तरीके से रोका जा रहा है।”

मानवअधिकार आयोग में शिकायत, लेकिन कोई राहत नहीं

नेपाल मानवअधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य मिहिर ठाकुर ने जानकारी दी कि यादव ने आयोग में भी शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन आयोग ने सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद कुछ न कर पाने की असमर्थता जताई। ठाकुर ने आरोप लगाया कि इस फैसले में दो बड़ी कानूनी त्रुटियाँ हैं – पहली, तीन न्यायाधीशों द्वारा दी गई सफाई को दो न्यायाधीशों द्वारा उलटना अस्वाभाविक है; दूसरी, अंतर्राष्ट्रीय न्याय सिद्धांतों के विपरीत, विशेष अदालत के फैसले के बाद अपील नहीं होनी चाहिए थी।

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अन्याय के अन्य शिकार भी सामने

पूर्व पुनरावेदन अदालत के न्यायाधीश ठाकुर ने एक और मामले का जिक्र करते हुए बताया कि रामकुमार कार्की ने सात साल जेल में बिताए, लेकिन बाद में सर्वोच्च अदालत ने उन्हें निर्दोष करार दिया। अब वे आयोग में क्षतिपूर्ति की माँग कर रहे हैं और आत्महत्या की चेतावनी भी दे चुके हैं।

सर्वोच्च भी गलतियों से अछूता नहीं: वरिष्ठ अधिवक्ताओं की टिप्पणी

वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने कहा, “सर्वोच्च अदालत सर्वोच्च ज़रूर है, लेकिन यह अन्याय से मुक्त नहीं है। न्यायाधीश भी इंसान होते हैं, उनमें भी पूर्वाग्रह, पक्षपात और राजनीतिक झुकाव होता है।” उनका मानना है कि नेपाल में फैसलों की समीक्षा की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है।

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पूर्व न्यायाधीश लोकेन्द्र मालिक ने राजनीतिक नियुक्ति वाले न्यायाधीशों को न्याय में त्रुटियों का कारण बताया। उन्होंने कहा कि जब न्यायाधीश राजनीतिक दलों के प्रति वफादार हों, तो निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कम हो जाती है।

अब भी रिट का रास्ता खुला: पूर्व न्यायाधीश लाल

सर्वोच्च अदालत के पूर्व न्यायाधीश गिरीशचन्द्र लाल ने इस मुद्दे को गम्भीर बताते हुए कहा कि वर्तमान में भले ही कानूनी विकल्प सीमित हों, लेकिन यदि ठोस प्रमाण हों, तो सर्वोच्च अदालत में फिर से रिट दायर किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, “सह–आरोपी के बयान के आधार पर फैसला देना ही एक बड़ी त्रुटि है। न्यायपालिका की नैतिकता और जनविश्वास को बनाए रखने के लिए इस मुद्दे पर पुनर्विचार आवश्यक है।”

विशेष:

यह मामला केवल एक अधिकारी की सज़ा का नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली पर उठते बड़े सवालों का प्रतीक बन गया है – जहाँ योग्यता, जातीय पहचान और न्यायिक पारदर्शिता एक-दूसरे से टकराते दिखते हैं।

(From Madhesh province journalist group)

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