मधेश में बजट खर्च का निचला स्तर: प्रशासनिक लापरवाही या जानबूझकर की गई देरी ?
जनकपुर, असार ५, २०८२, विश्लेषण समाचार । प्रदेश नम्बर २ अर्थात मधेश प्रदेश में चालू आर्थिक वर्ष के ११ महीनों में कुल बजट का केवल २२.४७ प्रतिशत ही खर्च हो सका है। यह आँकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह प्रदेश सरकार की कार्यशैली, प्रशासनिक तत्परता और विकास निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता पर भी गहरे सवाल खड़ा करता है।
खर्च का धीमा प्रवाह: आंकड़े बोलते हैं
प्रदेश लेखा नियंत्रक कार्यालय जनकपुर के अनुसार, कुल ४३ अरब के बजट में से अब तक मात्र ९ अर्ब ८६ करोड खर्च हुआ है।
विभाजन कुछ इस प्रकार है:
- चालू खर्च: ५ अर्ब ३० करोड
- पुँजीगत खर्च: ४ अर्ब ५५ करोड
- शेष ३४ अर्ब से अधिक बजट अभी तक खर्च नहीं हो सका है।
अब जबकि आर्थिक वर्ष खत्म होने में महज ११ दिन शेष हैं, इतनी बड़ी राशि को खर्च कर पाना न केवल अव्यवहारिक, बल्कि गुणवत्ता और पारदर्शिता दोनों पर संदेह उत्पन्न करता है।
सबसे कम खर्च करने वाले विभाग
कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:
- मुख्यमन्त्री कार्यालय: कुल बजट ४७ करोड, खर्च मात्र २ करोड
- अर्थ मन्त्रालय: २० करोड में से खर्च ८ करोड
- उद्योग, वाणिज्य तथा पर्यटन: २७४ करोड में से खर्च ३८ करोड
- ऊर्जा मन्त्रालय: ५४६ करोड में से खर्च ११५ करोड
यहाँ तक कि शिक्षा, स्वास्थ्य, भौतिक पूर्वाधार, और कृषि जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में भी बजट खर्च ५०% के नीचे है।
कारण: सरकार और विपक्ष की भिन्न राय
सरकार का पक्ष
अर्थमन्त्री सुनिल यादव का कहना है कि:
- अधिकारी अनुपस्थित रहे
- योजनाओं की कमी रही
- टेण्डर प्रक्रिया में देर हुई
- निर्देशन और मार्गदर्शन में अस्पष्टता रही
उनके अनुसार, तकनीकी तथा प्रशासनिक कारणों से बजट खर्च धीमा रहा है। वे इसे मंत्री परिषद की विफलता मानने से इनकार करते हैं।
विपक्ष का आरोप
जसपा नेपाल के प्रदेश सांसद मनिष सुमन ने तीव्र आलोचना करते हुए कहा कि:
“मंत्रियों का प्रदर्शन शून्य रहा है। वे सिर्फ कार्यक्रमों में शामिल होकर फोटो खिंचवाने में व्यस्त हैं। योजनाओं को जानबूझकर देर से लागू किया जाता है ताकि कमीशन के लिए रास्ता खुला रहे।”
उनका सीधा आरोप है कि काम की देरी भ्रष्टाचार की नियत से होती है — ताकि जल्दबाजी में ठेके देकर अपने पक्ष के ठेकेदारों को फायदा पहुँचाया जा सके।
११ दिन में ७८ प्रतिशत खर्च — क्या संभव है?
वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए यह कहना कठिन नहीं कि अब शेष बजट या तो खर्च नहीं होगा या फिर अतिआवश्यकता दिखाकर जल्दबाजी में, बिना पारदर्शिता के खर्च किया जाएगा। यह स्थिति भविष्य में गुणस्तरहीन विकास, भ्रष्टाचार, और जन असंतोष को जन्म दे सकती है।
निष्कर्ष: बजट की विफलता, प्रणाली की कमजोरी
मधेश प्रदेश में बजट खर्च की यह दुर्गति केवल प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि एक गहरी संस्थागत विफलता है। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो इससे प्रदेश की आर्थिक छवि, विकास की गति, और जनविश्वास — तीनों को गहरा आघात पहुँच सकता है।
अब सवाल यह है —
क्या अगला आर्थिक वर्ष भी ऐसे ही बीतेगा? या व्यवस्था में सर्जिकल सुधार की कोई उम्मीद बाकी है? रातोपाटी स्रोत आधारित


