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औकात

 

बैठ जाती हूं अक्सर
मिट्टी की सतह पे
क्योंकि मुझे पता है
मेरी औकात क्या है ।।

सोंधि सी मिट्टी की खुश्बू
दिल को बहुत सुकुन देति है
मुझे इस खुश्बू से बहुत लगाव है।।

जो छोड़ कर चल दिए
अपने गांव की मिट्टी को
देखा है मैने महल अट्टालिकाओं में
रहनेवालों की हालत क्या है ।।

एक एक तिनका जोड़कर
बनाया जिन्होनें अपना घरौँदा
वो अब घर नहीं झोपडी़ बन गयी है ।।

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माना,

न थे आलिशान इटों के घर
न था एशो आराम के साधन
पर साथ था हमेशा अपनों का उम्रभर
जिन घरों में गुंजा करती थी
अपनो की किलकारियां
अब वो घर वीरान खण्डहर बन गया है ।।

न छोड़ा है कभी मैने
इस मिट्टी के साथ को
क्योंकि ,
मिट्टी से मिट्टी तक के सफर में
एक दिन मिट्टी में ही
मिल जाना है ।।

विद्या मिश्र ( अध्यक्ष )
श्री राजदेवी संगीत कला केन्द्र विराटनगर
(नेपाल )

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