Fri. Jun 26th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

भूकम्प के ये सात दिन, जिसने जीवन की दिशा ही बदल दी : श्वेता दीप्ति

 
श्वेता दीप्ति
श्वेता दीप्ति

काठमांडू,२ मई,२०१५ | १२ गते, आम दिनों की ही भाँति था वह दिन भी । शनिवार का दिन और दिनों की अपेक्षा निश्चिन्तता का दिन होता है । ना कोई अफरातफरी और ना ही जल्दबाजी । सब कुछ अपनी गति से हो रहा था । कुछ खा चुके थे और कुछ खाने वाले थे । छुट्टी का दिन है तो कुछ घूमने का मन बना चुके थे और कुछ तो घूमने निकल भी चुके थे । कहाँ पता था तब कि प्रकृति कुछ ऐसा करने वाली है जो जीवन की दिशा ही बदल देगी । १२ बजे भी नहीं थे कि सबकुछ बदल दिया ईश्वर ने । हाहाकार, अफरातफरी, रोना चिल्लाना और फिर सूनी आँखों से अपनों को खोजने की तलाश…..जिन्दगियाँ खत्म हो गईं, आशियाने बिखर गए और दब गए उन मलबों के नीचे कई साँसें, कई सपने । और आज सिर्फ स्तब्धता है, अपनों के बिछड़ने का गम है और जिन्दगी किस सिरे से शुरु की जाय इस बात की जदेजहद है । ये जो कुछ हुआ इसपर मानव जाति का वश नहीं चलता क्योंकि प्रकृति को हम अपने हिसाब से तब तक ही बाँध सकते हैं जब तक वह अपने पर नहीं आती । वैज्ञानिकता के युग में हम भूल जाते हैं कि प्रकृति की अपनी गति है, वह न तो किसी के बाँधे बँधी है और न ही किसी के रोके रुकी है ।

यह भी पढें   राम मंदिर में चोरी की निष्पक्ष जांच हो

प्रकृति ने अपना रंग दिखा दिया, किन्तु आज जनता की निगाहें जो आसरा, जो आश्वासन, जो सांत्वना तथाकथित भाग्यविधाताओं से चाह रही है वह कहाँ है ? सूनी आँखों में अब आक्रोश ने जन्म ले लिया है, जिसका नजारा नेताओं ने देख लिया है । परन्तु इतने पर भी आज भी ये नेतागण सुषुप्त हैं । कोई हलचल इनकी निगाहों में नहीं है । जिस तत्परता की आवश्यकता है वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा । आज भी आरोप प्रत्यारोप में और अनुदान की राशि में ही ये उलझे हुए हैं । जिन्दगियाँ दवा के बिना खत्म हो रही हैं, भूख से खत्म हो रही हैं और ये अपने आशियाने से बाहर नहीं निकल रहे । राहत सामग्री व्यवस्थापन की कमी की वजह से बोर्डर पर ट्रकों में पड़े हुए हैं । अगर वो समय पर जरुरतमंद को मिल जाय तो कितनी जिन्दगियाँ बच सकती थीं या बच सकती हैं । किन्तु हाय रे हमारे प्रतिनिधि ∕ किस दिन के लिए ये जी रहे हैं पता नहीं ।

यह भी पढें   जनकपुरधाम में वना भव्य सूर्य मंदिर,आज शाम होगा उद्घाटन

2811ADC700000578-3057879-Put_to_work_-a-62_1430156298133आज आठवाँ दिन गुजर रहा है, बची खुची उम्मीदें खत्म हो रही हैं । उपर से सामान्य दिखने वाली जिन्दगी कराह रही है । डर, भय और त्रास के साए में दिन और रातें गुजर रही हैंं । सबकुछ है और कुछ भी नहीं है । व्यक्तिगत रूप से कुछ संस्थाएँ प्रयासरत हैं बची हुई जिन्दगी तक राहत पहुँचाने के लिए । विदेशों से पर्याप्त मदद मिलने की बातें हम सुन रहे हैं, पर सिर्फ सुन रहे हैं । कार्यान्वयन कहीं दिख नहीं रहा । और ऐसे में पाकिस्तान से आए हुए गौमांस या चर्बी से तैयार किए गए सामग्री और धर्म विशेष की तरफ से राहत सामग्री के साथ बाइबल को भी बाँटने की चर्चा मन को क्षुब्ध बनाती है । किन्तु धन्य हैं हम और हमारा धैर्य जो तमाशा देख रहे हैं पर हमारे राजनेताओं को नहीं घेर पा रहे हैं और धन्य हैं हमारी सरकार जिन्हें इन सारी बातों से कोई सरोकार नहीं है, उनकी चमड़ी गेंडे की तरह मोटी है जिसपर कोई असर ही नहीं होता ।9nepalpic_2015_4_27_1049

यह भी पढें   मेस्सी बने विश्वकप में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी, अर्जेटीना का नॉक आउट चरण में प्रवेश

सात दिन गुजरे और वर्ष भी गुजर जाएँगे, जो दर्द नेपाल के हिस्से आया वह मिटेगा तो नहीं पर वक्त की धूल जरुर जमेगी इसपर । जिन्दगियाँ मिटीं, ऐतिहासिकता और नेपाल की धरोहर मिटी किन्तु अगर कुछ नहीं मिटी है तो वह है हमारे नेताओं की नीयत और जनता की नियति ।

 

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *