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तीन बच्चों की नीति: क्या सरकार जिम्मेदारी लेगी ?

 

नीतिगत रिपोर्ट, काठमांडू । भूमिका: युवा बनाम नीति

नेपाल सरकार ने हाल ही में “राष्ट्रिय जनसंख्या नीति २०८२” सार्वजनिक की है, जिसमें युवाओं को 20 वर्ष की उम्र में विवाह कर 30 की उम्र तक तीन संतान पैदा करने की सलाह दी गई है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस बयान के बाद व्यापक बहस शुरू हो गई है—क्या यह नीति व्यवहारिक है? और यदि हां, तो क्या इसके लिए सरकार आवश्यक ढांचा उपलब्ध कराने के लिए तैयार है?

प्रधानमंत्री की अपील और युवाओं की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री ओली ने विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर जनसंख्या में गिरावट को चिन्ताजनक बताते हुए कहा,

“20 की उम्र में विवाह करिए, 30 की उम्र तक तीन संतान पैदा कीजिए, फिर करियर बनाइए।”

उन्होंने बच्चों की देखरेख के लिए ‘कोक्रो स्कूल’ (क्रेच-जैसी सेवाएं) की बात भी की। परंतु युवाओं का कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी क्षेत्रों में जब तक सुधार नहीं होता, तब तक यह नीति धरातल पर नहीं उतर सकती।

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युवाओं की चिंता: शिक्षा और रोज़गार का संकट

सिन्धुपाल्चोक निवासी राजाराम पौडेल, जिनकी एक बेटी है, कहते हैं:

“दूसरे बच्चे को न तो बेहतर शिक्षा दे पाएंगे, न सही इलाज। एक ही संतान को अच्छा जीवन देना चाहते हैं।”

यह सोच अकेले राजाराम की नहीं है। बदलते सामाजिक-आर्थिक ढांचे में युवा अब करियर, आर्थिक सुरक्षा, और बच्चों के भविष्य को देखते हुए संतान का निर्णय लेते हैं।

प्रजनन दर में गिरावट: आँकड़े क्या कहते हैं?

  • २०५८ में: औसत प्रजनन दर ४.१
  • २०७८ में: औसत प्रजनन दर १.९३
  • प्रतिस्थापन स्तर: २.१

यह गिरावट जनसंख्या सन्तुलन को खतरे में डाल सकती है। दीर्घकालीन प्रभावों में श्रमशक्ति की कमी, सामाजिक संरचना में असंतुलन और बुज़ुर्गों की देखभाल में कठिनाई जैसी समस्याएं प्रमुख होंगी।

विशेषज्ञों की राय: समस्या क्या है, समाधान क्या हो सकता है?

जनसंख्याविद् डा. योगेन्द्र गुरुङ का कहना है:

“सरकार कहे ‘तीन संतान पैदा करो’—यह तब तक व्यवहारिक नहीं होगा जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की गारंटी नहीं दी जाती।”

वे सुझाव देते हैं कि सरकार को प्रोत्साहनपरक रणनीति बनानी चाहिए, जो युवाओं को स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने दे।

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समाजशास्त्री डा. टीकाराम गौतम का मानना है:

“प्रजनन दर में गिरावट का असर अभी नहीं, लेकिन २०-३० वर्षों में दिखेगा। वृद्धों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा।”

नई नीति में क्या है नया?

  • दो से अधिक संतान होने पर भी छात्रवृत्ति, सुत्केरी अवकाश और स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव नहीं होगा।
  • प्रजनन अधिकारों को सुरक्षित रखने की बात की गई है।
  • लैंगिक असंतुलन रोकने और लिंग आधारित गर्भपात पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून की व्यवस्था की जा रही है।
  • शिक्षा को ‘हाइटेक’ और व्यावहारिक बनाने की बात कही गई है ताकि युवाओं को देश में ही रोजगार मिले।

इतिहास: नीति के बदलते रंग

नेपाल की जनसंख्या नीति की शुरुआत २०१२ साल की पंचवर्षीय योजना से हुई थी।

  • २०१४: औसत प्रजनन दर ६.३
  • २०४८: यह घटकर ५.१
  • २०५८: घटकर ४.१
  • २०७८: घटकर १.९४
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पहले “दो संतान, सुखी परिवार” जैसे नारों ने बड़े परिवार को हतोत्साहित किया, पर अब जनसंख्या में गिरावट सरकार को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर कर रही है।

निष्कर्ष: नीति और ज़मीन के बीच की दूरी

तीन बच्चों की सरकारी सलाह फिलहाल आदर्श है, व्यवहारिक नहीं। जब तक राज्य—

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,
  • सुलभ स्वास्थ्य सेवा,
  • और स्थानीय रोजगार सुनिश्चित नहीं करता,
    तब तक युवा अधिक संतान का निर्णय नहीं लेंगे।

सरकार को चाहिए कि वह केवल संतान बढ़ाने का आग्रह न करे, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण आधारभूत ज़रूरतों को सुलभ बनाए।

अंत में सवाल वही है— क्या सरकार इस नीति की जिम्मेदारी लेगी?

रिपोर्टर: पुष्पराज चौलागाईं
(स्वास्थ्य और सामाजिक नीति पर विशेष कलम चलाते हैं) ऑनलाइन खबर से

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