ओली की बोली बन रही भारत यात्रा में बाधक ? भारत-नेपाल संबंधों की नाज़ुक पड़ताल
काठमांडू, भारत-नेपाल संबंधों की नाज़ुक पड़ताल”
भूमिका:
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की भारत यात्रा लंबे समय से चर्चा में है, लेकिन अब तक इसकी तारीख तय नहीं हो सकी है। स्पेन यात्रा के बाद अनुमान लगाया जा रहा था कि ओली की भारत यात्रा जल्द ही संभव होगी, लेकिन एक सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। क्या इस देरी के पीछे केवल कूटनीतिक प्रक्रिया है, या ओली की राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ भी इसमें बाधक बन रही हैं?
यात्रा की प्रगति – लेकिन तारीख नहीं!
प्रधानमंत्री ओली की स्पेन यात्रा के बाद उम्मीद की जा रही थी कि उनकी भारत यात्रा की तारीख जल्द तय होगी। परराष्ट्र मंत्रालय के उच्च अधिकारी दिल्ली जाकर भी लौट चुके हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की वापसी (९ जुलाई) के बाद भी कोई ठोस संवाद नहीं हो सका है। मंत्रालय के सूत्रों का मानना है कि संभवतः साउन के दूसरे या तीसरे सप्ताह में यात्रा हो सकती है, परन्तु यह ‘संभावना’ भर है, पुष्टि नहीं।

परदे के पीछे की कूटनीति
इस यात्रा को साकार करने के लिए परराष्ट्र मंत्री डॉ. आरजु राणा देउवा ने भरपूर प्रयास किए हैं। मोदी और ओली की दो बार भेंट हो चुकी है – अमेरिका और थाईलैंड में। साथ ही एमाले के नेता भी दिल्ली जाकर माहौल बनाने की कोशिश कर चुके हैं। फिर भी यात्रा में विलंब यह दर्शाता है कि कोई ‘अनकहा अवरोध’ अब भी बना हुआ है।
क्या ओली के बयान बन रहे हैं यात्रा में रोड़ा?
विदेश मामलों के जानकारों का मानना है कि ओली की भारत के प्रति कुछ आक्रामक टिप्पणियाँ इस यात्रा में बाधा बन रही हैं। उन्होंने बार-बार भारत को ईपीजी रिपोर्ट, सीमा विवाद और संप्रभुता के मुद्दों पर दबाव में लाने की कोशिश की है। हाल ही में उन्होंने कहा था कि नेपाल की भू-राजनीतिक स्थिति असंतुलित और कमजोर रही है, जिसे उनकी सरकार संतुलित कर रही है। इस प्रकार की टिप्पणियाँ भारत को असहज करती हैं।
विशेषज्ञों की राय – संवाद की ज़रूरत
पूर्व राजदूत टंक कार्की का मानना है कि नेपाल-भारत जैसे पड़ोसी देशों के बीच इस तरह की देरी असामान्य नहीं है। लेकिन साथ ही वे मानते हैं कि यदि भारत किसी बात से असंतुष्ट है, तो उसे स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए और दोनों पक्षों को संवाद के ज़रिये समाधान निकालना चाहिए।
वहीं, एमाले के नेता विष्णु रिजाल की राय में भ्रमण तभी होगा जब भारत तैयार हो। उनका कहना है, “यह भ्रमण केवल दिखावे के लिए नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें ठोस समझौते और परिणाम भी होने चाहिए।”
प्रधानमंत्री ओली की भारत यात्रा में हो रही देरी केवल राजनयिक प्रक्रियाओं का हिस्सा नहीं है, बल्कि उसमें व्यक्तिगत राजनीतिक भाषा और अभिव्यक्तियों का भी प्रभाव दिख रहा है। कूटनीति में संतुलन और संवाद अत्यावश्यक होता है, खासकर जब पड़ोसी देश के साथ संवेदनशील रिश्ते हों। यदि भारत-नेपाल संबंधों को प्रगाढ़ बनाना है, तो दोनों देशों को भरोसे और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ना होगा — और नेताओं को अपने शब्दों की शक्ति और परिणाम दोनों का आभास होना चाहिए।

