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९ वर्षों बाद भारत–नेपाल गृह सचिव स्तरीय बैठक : सीमा, सुरक्षा और तस्करी प्रमुख एजेंडा

 


नई दिल्ली / काठमांडू । भारत और नेपाल के बीच गृह सचिव स्तर की द्विपक्षीय बैठक आगामी २२ और २३ जुलाई (६ और ७ साउन) को नई दिल्ली में आयोजित होने जा रही है। यह बैठक करीब ९ वर्षों बाद हो रही है। पिछली बार यह उच्च स्तरीय बैठक २०१६ में दिल्ली में हुई थी। नेपाल के गृह सचिव गोकर्णमणि दुवाडी के नेतृत्व में १२ सदस्यीय नेपाली प्रतिनिधिमंडल सोमवार को भारत रवाना होगा।

प्रमुख मुद्दे:

  • सीमापार अपराध,
  • मानव तस्करी,
  • नशीले पदार्थों की तस्करी,
  • सूचना का आदान-प्रदान,
  • प्राकृतिक आपदा से जुड़ी साझा समस्याएं
    बैठक के मुख्य एजेंडा में शामिल हैं।
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गृह मंत्रालय के प्रवक्ता रामचन्द्र तिवारी ने बताया कि बैठक सीमा सुरक्षा और द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने पर केंद्रित होगी। नेपाली दल में गृह, कानून और विदेश मंत्रालय के सहसचिवों के अलावा नेपाल पुलिस, सशस्त्र प्रहरी बल, राष्ट्रिय अनुसन्धान विभाग, नापी विभाग और अध्यागमन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।

सीमा विवाद नहीं, लेकिन सीमांकन पर चर्चा:

हालांकि कालापानी और सुस्ता जैसे प्रमुख सीमा विवाद इस बैठक में नहीं उठाए जाएंगे, लेकिन सीमांकन, सीमा स्तम्भों की मरम्मत, सीमा क्षेत्र में निर्माण कार्य, और सीमा अतिक्रमण जैसे तकनीकी पहलुओं पर चर्चा होने की संभावना है। नेपाल की ओर से सीमा अतिक्रमण, डुबान की समस्या, लागूऔषध तस्करी और अतिक्रमण जैसे मुद्दों को प्राथमिकता से उठाए जाने की बात कही गई है।

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बाउन्ड्री वर्किङ ग्रुप की बैठक:

गृह सचिव स्तरीय बैठक के तुरंत बाद २७ जुलाई (साउन १२) को दिल्ली में ही बाउन्ड्री वर्किङ ग्रुप (Boundary Working Group) की बैठक भी होगी। यह समूह दोनों देशों की सीमा पर फिल्डवर्क, सीमा स्तम्भों का निर्माण, पुनर्स्थापना और सीमांकन से जुड़े तकनीकी कार्यों पर केंद्रित रहेगा।

भारत द्वारा सीमा क्षेत्रों में किए जा रहे सड़क निर्माण और अन्य भौतिक संरचनाओं के कारण नेपाल के तराई क्षेत्रों में होने वाली बारहमासी डुबान को लेकर भी यह बैठक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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भारतीय पक्ष की ओर से, बैठक में खुले सीमा के कारण होने वाली सुरक्षा चुनौतियाँ, तीसरे देश के नागरिकों की अवैध घुसपैठ, अपराधियों की आवाजाही, और अवैध हथियारों का कारोबार जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी जाएगी

यह बैठक भारत-नेपाल के बीच सीमित समय से रुकी हुई संस्थागत बातचीत को पुनर्जीवित करने, सीमावर्ती सहयोग को सुधारने और आपसी विश्वास निर्माण के लिहाज से अहम मानी जा रही है।

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