राष्ट्रपति ने संवैधानिक परिषद से जुड़ा विधेयक संसद में पुनर्विचार के लिए लौटाया

काठमांडू, श्रावण ८, २०८२ (24 जुलाई 2025)
राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने संवैधानिक परिषद (कार्य, कर्तव्य, अधिकार और कार्यप्रणाली) से संबंधित संशोधन विधेयक को पुनर्विचार के लिए संघीय संसद में वापस भेज दिया है। यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका था, लेकिन राष्ट्रपति ने इसे संविधान की भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत मानते हुए प्रतिनिधिसभा में पुनर्विचार के लिए लौटाया है।
यह विधेयक ३१ असार को सभामुख देवराज घिमिरे द्वारा प्रमाणीकरण के लिए राष्ट्रपति कार्यालय भेजा गया था। राष्ट्रपति के प्रेस सलाहकार किरण पोखरेल के अनुसार, “यह विधेयक संविधान की मंशा, भावना, लोकतांत्रिक मूल्य मान्यता और वैश्विक परंपराओं के प्रतिकूल होने के कारण संविधान की धारा ११३ (३) के तहत पुनर्विचार के लिए संसद में लौटाया गया है।”
विवादास्पद प्रावधान
इस विधेयक में संवैधानिक परिषद में केवल दो सदस्यों की उपस्थिति से भी निर्णय लेने की व्यवस्था की गई थी। यही प्रावधान सबसे ज्यादा विवाद का कारण बना। राष्ट्रपति ने इसे गंभीर विषय मानते हुए कानूनी सलाह के आधार पर विधेयक लौटाया।
पहले की व्यवस्था अनुसार, परिषद की बैठक बुलाने से कम से कम ४८ घंटे पहले सूचना देनी होती थी और कार्यसूची भेजना अनिवार्य था। लेकिन नए विधेयक में यह बाध्यता हटाकर दूसरी बैठक के लिए सूचना और कार्यसूची बिना भी बैठक संभव होने का प्रावधान किया गया था।
गणपूरक संख्या और निर्णय प्रक्रिया
विधेयक में गणपूरक (कोरम) संख्या और निर्णय प्रक्रिया को लचीलापन दिया गया है। यदि परिषद में अध्यक्ष सहित पाँच सदस्य हों तो चार की उपस्थिति पर्याप्त मानी जाती है, लेकिन यदि अध्यक्ष सहित केवल दो सदस्य हों, तो दोनों की उपस्थिति ही पर्याप्त मानी जाएगी। निर्णय प्रक्रिया भी इसी तरह की चार अवस्थाओं में निर्धारित की गई है।
इन व्यवस्थाओं को लेकर कानूनी और राजनीतिक हलकों में आशंका जताई जा रही थी कि इससे संवैधानिक परिषद की निष्पक्षता और निर्णय प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
राष्ट्रपति द्वारा विधेयक वापस किए जाने के बाद अब यह संसद में पुनः बहस के लिए जाएगा। संभव है कि विधेयक में आवश्यक संशोधन या पूरी तरह से पुनः मसौदा तैयार किया जाए। संवैधानिक परिषद जैसे संवेदनशील निकाय में निर्णय प्रक्रिया और गणपूरक संख्या का स्पष्ट, सशक्त और संविधान-सम्मत होना जरूरी माना जा रहा है।

