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मीडिया काउन्सिल से राजनीतिक हस्तक्षेप हटाने की सिफारिश, विधेयक में व्यापक संशोधन की मांग

 

काठमांडू, श्रावण १२, २०८२ — नेपाल में प्रस्तावित मिडिया काउन्सिल विधेयक को लेकर विशेषज्ञों और सरोकारवालों ने गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह विधेयक मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास है और इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप के कई प्रावधान शामिल हैं।

प्रतिनिधिसभा के शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सूचना प्रविधि समिति की बैठक में विशेषज्ञों ने कहा कि काउन्सिल को राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण से मुक्त रखना चाहिए और उसकी नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी व निष्पक्ष बनाया जाना चाहिए।

पूर्व संचारमंत्री रेखा शर्मा द्वारा १२ वैशाख २०८१ को पेश किया गया यह विधेयक हाल ही में राष्ट्रिय सभा से पारित हुआ है। इसमें सरकार द्वारा गठित सिफारिश समिति के जरिए काउन्सिल के अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त करने का प्रावधान है। समिति में सचिवालय स्तर के अधिकारी शामिल हैं, जिससे नियुक्तियों में सरकारी हस्तक्षेप की आशंका जताई गई है।

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नेपाल पत्रकार महासंघ के पूर्व अध्यक्ष तारानाथ दाहाल ने कहा कि विधेयक की प्रस्तावना में “स्वतन्त्र प्रेस” शब्द तक शामिल नहीं किया गया है, जो सरकार की मंशा पर प्रश्न उठाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि काउन्सिल की सिफारिश समिति का नेतृत्व राष्ट्रिय सभा के अध्यक्ष द्वारा किया जाना चाहिए।

शिव गाउँले, गोविन्द आचार्य, रघु मैनाली, ऋषिकेश दाहाल, सुधांशु दाहाल सहित अन्य संचार विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने भी विधेयक पर आपत्ति जताते हुए कहा कि प्रस्तावित मिडिया काउन्सिल मौजूदा प्रेस काउन्सिल की तुलना में कमजोर और सरकार-नियंत्रित हो सकती है।

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प्रमुख सुझाव इस प्रकार हैं:

  • काउन्सिल को राजनीतिक और आर्थिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए।
  • नियुक्ति प्रक्रिया में संसद और अन्य स्वतंत्र संस्थाओं की सहभागिता हो।
  • काउन्सिल की संरचना में गैर-पत्रकार, पूर्व न्यायाधीश, वरिष्ठ कर्मचारी जैसे विविध प्रतिनिधित्व हों।
  • काउन्सिल को स्वनियमन, स्वमूल्यांकन और मीडिया वर्गीकरण जैसे अधिकार दिए जाएं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि विधेयक में कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं, जैसे प्रेस प्रतिनिधि प्रमाणपत्र देने का अधिकार और मीडिया की आंतरिक मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रोत्साहन। फिर भी, अधिकांश वक्ताओं का मानना है कि वर्तमान स्वरूप में विधेयक मीडिया की स्वतंत्रता को बाधित करने वाला है और इसमें आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है।

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यह विषय नेपाल में प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक शासन की पारदर्शिता से सीधा जुड़ा हुआ है, इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन सुझावों को विधेयक में शामिल करती है या नहीं।

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