बेचैन अमेरिका – बदलती दुनियां : प्रेमचन्द्र सिंह

अमेरिकी पाखंड का खुला नजीर यह है कि अमेरिका को भारत से निर्यात होने वाले गैसोलीन और डीज़ल जैसे परिष्कृत ईंधनों को हाल ही में 25% शुल्क बढ़ोतरी से अमेरिका द्वारा छूट दी गई है। यानी, एक ओर राष्ट्रपति ट्रम्प यह कह रहे हैं कि वे भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए सज़ा दे रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर, उसी रूसी तेल से बने ईंधन की अमेरिका में निर्यात को बिना रोक-टोक के चलने दे रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा यूक्रेन युद्ध में संघर्षविराम की पहल महज़ मानवीय चिंता से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसकी असली वजह यह है कि अब पश्चिमी देशों को इस युद्ध में संभावित हार का सामना करना पड़ सकता है और यह पराजय अमेरिका की प्रतिष्ठा के साथ राष्ट्रपति ट्रम्प की राजनीतिक विरासत पर भी गहरा दाग छोड़ सकती है। रूस की गर्मियों की आक्रामक सैन्य मुहिम की आहट के बीच, राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा राष्ट्रपति पुतिन से मुलाक़ात की कोशिश ठीक उसी समय जब उन्होंने भारत पर रूसी तेल को लेकर द्वितीय प्रतिबंध लगाए हैं, यह अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत है कि राष्ट्रपति ट्रम्प किस कदर घबराए हुए हैं और पश्चिम को हार से बचाने के लिए जल्दबाज़ी में कूटनीतिक दांव चल रहे हैं। उनका दावा है कि मौजूदा वैश्विक व्यापार व्यवस्था के कारण विश्व की अन्य ताकतवर अर्थव्यवस्थायें, विशेषकर भारत और चीन, अमेरिकी अर्थव्यवस्था का शोषण कर रही हैं। उनके भाषणों में बार-बार भारत और चीन को अमेरिका के लिए खतरे के रूप में चित्रित किया जाता है, जो कथित तौर पर अमेरिका की आर्थिक कमजोरी का कारण बन रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि ये देश टैरिफ का अपने पक्ष में उपयोग कर एकतरफा व्यापारिक लाभ उठा रहे हैं, जिससे अमेरिका को व्यापार में भारी नुकसान हो रहा है। इस नुकसान का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के साथ-साथ वहाँ के सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित कर रहा है। यही कारण है कि ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ (MAGA) का नारा और ‘अमेरिका फर्स्ट’ का उद्घोष वहाँ के लोगों के दिलों में गहरी पैठ बना रहा है।लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रंप का यह दावा तथ्यों पर आधारित है? क्या वाकई भारत और चीन के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है, या फिर यह अमेरिका की अपनी आंतरिक कमजोरियां और उसकी वैश्विक प्रभुत्व को मिल रही चुनौती की बेचैनी का नतीजा है?
अमेरिका की घरेलू आर्थिक असमानता चरम पर है। अमेरिका में धन के वितरण की प्रणाली इतनी असंतुलित हो चुकी है कि वहाँ का समाज दो हिस्सों में बँट गया है – एक धनवान अमेरिका और दूसरा गरीब अमेरिका। धनी वर्ग की संपत्ति दिन-दोगुनी, रात-चौगुनी बढ़ रही है, जबकि गरीब वर्ग को सामान्य जीवन जीने में भी कठिनाई हो रही है। आर्थिक प्रगति के पैमाने पर देखें तो अमेरिका की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) पिछले पाँच वर्षों में 21 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 30 ट्रिलियन डॉलर हो गई है, जो विश्व में सर्वाधिक वृद्धि है। तुलना करें तो चीन की जीडीपी 14 ट्रिलियन से 18 ट्रिलियन और भारत की 2.6 ट्रिलियन से 4.2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँची है। इसका मतलब है कि अमेरिका ने इस अवधि में अपनी जीडीपी में दो भारत या एक भारत के साथ एक जर्मनी के बराबर वृद्धि की है। प्रति व्यक्ति जीडीपी में भी अमेरिका की स्थिति सबसे अधिक मजबूत है। 2020 में जहाँ अमेरिका का प्रति व्यक्ति जीडीपी 63,000 डॉलर था, 2025 में यह बढ़कर 89,000 डॉलर हो गया, जो जर्मनी (54,000 डॉलर) और जापान (35,000 डॉलर) की संयुक्त प्रति व्यक्ति जीडीपी के समतुल्य है। यह पर्याप्त संकेत है कि आज भी अमेरिका विश्व की सबसे अधिक आर्थिक प्रगति करने वाला देश है और उसकी समस्या आर्थिक गिरावट या आर्थिक पिछड़ापन तो कतई नहीं है।अमेरिका की वर्णित आर्थिक उन्नति के बावजूद, अमेरिका की घरेलू समस्या गंभीर है। अमेरिका की आवादी की करीब आधी जनसंख्या धनवान वर्ग है जिसकी औसत वार्षिक आय 1.51 लाख डॉलर है, जबकि शेष आधी अमेरिकी जनसंख्या की औसत आय मात्र 20,000 डॉलर वार्षिक है। इन दोनों वर्गों के बीच सात गुने से अधिक के अंतर ने अमेरिका में सामाजिक तनाव को जन्म दिया है। मेडिकेयर, हेल्थकेयर, मुफ्त शिक्षा और चाइल्डकेयर जैसी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थायें ध्वस्त हो चुकी हैं, जिससे निम्न आय से त्रस्त आधी अमेरिका की आवादी में आक्रोश बढ़ रहा है। ये लोग किफायती आवास, मुफ्त परिवहन और रियायती घरेलू सामग्री आदि की माँग कर रहे हैं।

वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अमेरिका का प्रभुत्व दिख ही नहीं रहा है बल्कि उसकी प्रभाव का असर भी महसूस किया जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह दावा कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था अमेरिका के लिए नुकसानदायक है, आँकड़ों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। वास्तव में, मौजूदा व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभार्थी अमेरिका ही है और अमेरिका की दादागिरी का एकमात्र आधार है अमेरिकी डॉलर, जो विश्व व्यापार का 80-90% हिस्सा संभालता है। डॉलर की यह बादशाहत अमेरिका को वह ताकत देती है, जिसके बल पर वह किसी भी देश पर प्रतिबंध लगा सकता है, उसकी व्यापारिक लेनदेन को रोक सकता है। अमेरिकी प्रतिबंध का आशय केवल इतना है कि जिस देश पर प्रतिबंध लगाया जाता है उस देश को अमेरिकी डॉलर की आपूर्ति रोक दी जाती है और डॉलर आधारित वित्तीय लेनदेन के लिए प्रयुक्त होने वाली अमेरिकी स्विफ्ट बैंकिंग प्रणाली से उस देश को पृथक कर दिया जाता है। लेकिन यही डॉलर अब अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती बन रहा है, क्योंकि विश्व के कई देश इस ‘डॉलर- दादागिरी’ से मुक्ति चाहते हैं।







