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अमेरिका में व्यापार युद्ध की उल्टी मार: उपभोक्ताओं पर बढ़ता बोझ

 

पीटर ड्रेपर, नाथन हॉवर्ड ग्रे, अगस्त ७, २०२५ । डोनाल्ड ट्रम्प की अगुवाई में अमेरिका ने फिर से भंसार (टैरिफ) नीतियों को सख्त बनाते हुए अपने अधिकांश व्यापारिक साझेदारों पर 10% से 50% तक शुल्क लगाया है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य व्यापार घाटा कम करना और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना बताया गया, लेकिन इसके नतीजे विपरीत दिशा में जाने लगे हैं। अमेरिकी उपभोक्ताओं और उत्पादकों को इसका सीधा असर झेलना पड़ रहा है।

प्रमुख बिंदु:

1. भंसार दरों का वर्गीकरण:

  • व्यापार और सुरक्षा साझेदार देशों पर: 10%
  • जापान व दक्षिण कोरिया जैसे घाटा देने वाले साझेदार: 15%
  • कुछ एशियाई मित्र देशों पर: 19%
  • अन्य एशियाई देशों पर औसतन: 22.1%
  • भारत पर: 25% (रूस से व्यापार के कारण और दंड संभव)
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2. चीन और कनाडा को छोड़कर अधिकांश देशों ने जवाबी टैरिफ नहीं लगाया:

ट्रंप की रणनीति ने अधिकतर देशों को “समझौतावादी” नीति अपनाने को मजबूर किया है, क्योंकि जवाबी कार्रवाई से घरेलू महंगाई और अमेरिकी बाजार से बहिष्कार का डर है।

3. भारत, दक्षिण कोरिया और यूरोपियन यूनियन ने रियायतें दीं:

  • अमेरिकी वस्तुओं पर कम टैरिफ
  • कृषि, ऊर्जा और हवाई उत्पादों की खरीद की प्रतिबद्धता
  • आंतरिक नियमों में बदलाव

4. टैरिफ का असली बोझ अमेरिकी जनता पर:

यद्यपि ट्रंप दावा करते हैं कि विदेशी देश शुल्क भरते हैं, कई अध्ययन बताते हैं कि वस्तुतः अमेरिकी कंपनियां और उपभोक्ता ही इसका खामियाजा भुगतते हैं।

  • जनरल मोटर्स ने Q2 2025 में $1.1 बिलियन का घाटा बताया।
  • तांबे पर 50% शुल्क की घोषणा से उसी दिन कीमत में 13% वृद्धि हुई।
  • निर्माण से लेकर वायरिंग और प्लंबिंग तक महंगे हो गए।
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5. औसत टैरिफ दर ऐतिहासिक ऊँचाई पर:

  • ट्रंप के पहले (जनवरी 2025): 2.4%
  • वर्तमान में: 18.3% – 1934 के बाद की सबसे उच्च दर

6. अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत:

  • रोजगार सृजन में गिरावट
  • निजी क्षेत्र का निवेश ठप
  • फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर में परिवर्तन नहीं किया
  • ट्रंप ने श्रम ब्यूरो प्रमुख को बर्खास्त किया – सरकारी आंकड़ों के राजनीतिकरण का डर

निष्कर्ष:

ट्रंप की टैरिफ नीति ने वैश्विक व्यापार संबंधों में तनाव तो बढ़ाया ही, साथ ही घरेलू मोर्चे पर उपभोक्ताओं, उद्योगों और पूंजी निवेश पर भी नकारात्मक प्रभाव डाला है। अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक जोखिम अधिक नजर आ रहे हैं। यदि यह रुझान जारी रहा तो अमेरिका को इसके गंभीर आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

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