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देश नशे में नहीं चलता : कैलाश महतो 

 
कैलाश महतो, पराशी, १ जून । प्रधानमन्त्री बालेन के अनुसार देश भाषण से नहीं, काम, चिन्तन और एक्शन से चलता है। वो देश के लिए काम कर रहे हैं। याद रहे कि काम और चिन्तन के लिए भी भाषा चाहिए, भाषिक प्रदर्शन चाहिए। भाषा हर काम का गहना होता है। आवरण होता है।
सांसदों के लिए संसद लोकतंत्र का मन्दिर है, जिसमें लोकतंत्र को मानने बाले हर सांसदों को  तत्परता के साथ प्रवेश  करना चाहिए।  लेकिन प्रधानमन्त्री बालेन्द्र साह संसद प्रवेश में एतराज बरत रहे हैं। जिस संसदीय निर्वाचन को पार कर वो संसद का सदस्य बने हैं, उसी संसद, उसके कार्रवाही और क्रियाकलापों में सामेल नहीं होते, उसपर एक अनहोनी शंका उठना स्वाभाविक है।
परिवार भी एक संसद है। वहाँ भी माँ, पिता, भाइ, बहन, पत्नी, बच्चे सब सांसद होते हैं। परिवार का प्रधानमन्त्री अगर यह कहे कि परिवार पारिवारिक भेटघाट और छलफल से नहीं, केवल कमाई से चलता है तो संसार में कितने परिवार चल पायेंगे? केवल नाम, सोहरत, काम और पैसे से ही परिवार चलता, एक्शन और आय से ही परिवार फलता फूलता तो बिल गेट्स (Bill Gates), एलन मस्क (Elan Musk), जेफ बेजोस (Jeff Bezos), रूपर्ट मर्डोक (Rupert Murdoch), मेल गिब्सन (Mel Gibson),
किम कार्दशियन (Kim Kardashian), टाइगर वुड्स (Tiger Woods), म्याडोना (Madonna) जैसे  विश्व प्रसिद्ध लोगों के पारिवारिक जीवन में कोई विखराव न होते।
आज १५ जेठ, गणतन्त्र दिवस, की मिति थी। प्रधानमन्त्री बालेन ने अपनी पत्नी के साथ बड़े नाज और शौकत से टूंडी खेल के गणतन्त्र दिवस समारोह में आसन ग्रहण की। उनके प्रशन्न मुद्रा और शालीन चेहरे पर भद्र एक कुटिल नजाकत थी।
भले ही व्यक्तिगत मैं उन्हें मधेशी नहीं मानता, न तो वे अपने को मधेशी कहते हैं। मगर एक नाज मुझमें भी जरुर है कि मधेशी पिता के संतान प्रधानमन्त्री बनकर विगत के सारे परम्परागत प्रधानमन्त्रियों में किसी भी मायने में किसी से कम हैसियत के भूमिका में नहीं हैं। यह एक प्रमाण है कि मधेशी को भी अगर देश चलाने का प्रथम स्थान मिले तो देश को बड़े शान और गरिमा के साथ बेहतरीन चला सकता है। मगर देश चलाना पूर्णाँक प्राप्ति नहीं है। बालेन से पहले भी देश को ४२ प्रधानमंत्री ने देश को चलाया है। किसी ने देश के संसद से बेवफाई नहीं की है। किसी ने प्रतिपक्षी के सवालों से भागा नहीं है।
बालेन के फेसबुक स्टेटसों और उनके समर्थकों द्वारा जो भाष्य (narrative) बनाये जा रहे हैं कि वो भाषण नहीं, काम करना पसंद करते हैं, तो अच्छे पढ़ेलिखे बालेन और उनके समर्थकों को यह पता होना चाहिए कि स्कूलों और विश्व विद्यालयों में जो तर्क शास्त्र, दर्शन शास्त्र और वाक कलाओं के विभागें हैं, वे फालतू के लिए नहीं होते। सरकार और समाज ने उन विषयों पर इतने रिसर्च, अनुसंधान और लगानी नहीं करतीं अगर उसका कोई महत्व नहीं होता।
राज नेता वाकई कामों से नापे जाते हैं। मगर कामों के लिए इंजिनियरिंग की आवश्यकता होती है, और भाषा कामों और मनसायों की इंजिनियरिंग है। बालेन एक ऱ्यापर और इंजिनियर भी हैं। हर ऱ्याप और हर कंस्ट्रक्शन से पहले उसकी इंजिनियरिंग की जाती है। उस गीत और कंस्ट्रक्शन का ट्रेलर अपने सीनियर को दिखाया/सुनाया जाता है। उसका अनुमोदन होता है। फिर काम में लाया जाता है। राजनेताओं के भी सीनियर जनता होती है। जन प्रतिनिधि होते हैं – जहाँ भाषण द्वारा ही जनता की आवाज़/बात रखी जाती है और वहाँ से अनुमोदन पश्चात् जनता में प्रसारित की जाती है। यही संसदीय राजनीति की विज्ञान है।
देश के गणतान्त्रिक कार्यकारी प्रमुख अगर संसदीय प्रणाली को चुनौती दे, देश के आर्थिक बजट सम्बन्धी नीति तथा कार्यक्रम के दौरान संसद में राष्ट्रपति द्वारा दिए जा रहे सम्बोधन को उपहास करे और गणतन्त्र दिवस पर कुछ बोलना न चाहे तो अनेक राजनीतिक सन्देह पैदा होता है। लोग चाहे जो भी कहे – पंचायत और ज्ञानेन्द्रशाही को ढालने के लिए रणनीतिक विचारों के आलावे विदेशी कोई प्रत्यक्ष लगानी नहीं लगी थी। उसके लिए देश के समस्त पीढ़ी लगी थीं। किसी राष्ट्रीय धरोहर और व्यक्तिगत संपत्तियों का स्वाहा नहीं हुआ था। किसी व्यक्ति, पार्टी या समूह का सत्ता ही नहीं, सम्पूर्ण व्यवस्था ढाली गयी थी।
इस बात को वर्तमान के सत्ता को याद रखनी होगी कि उसने केवल एक सत्ता को ढाला है, व्यवस्था को नहीं। उस एक सत्ता को ढालने के लिए किसी स्वार्थी शक्ति का अनगिनत पैसे लिए थे। उसका संयन्त्र प्रयोग की थी, उसकी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की थीं, उसकी रणनीति अपनाई गयी थी। वह विदेशी शक्ति कल्ह देश के लिए मुशीबत है।
देश के वे सपने पूरे होने की संभावना क्षीण प्राय: है जिसकी जनता को आश्वासन दी गयी है। जिस संसद से सरकार बनी है, उस संसद में अलग अलग स्वार्थ समूह : सहकारी ठग मुद्दों से परेशान, नेता के सामने खुलकर बोल न सकने बाले चोर और कायर समूह, चमचे, क्षणभर में अपने पूरानी पार्टियों को छोड़ अवसर के तलासी समूह, करोड़ों करोड़ में टिकट खरीद सांसद बनने बाले समूह, राजनीति का “र” भी ठीक से न जानने बाला समूह, भ्रष्टाचार के घुन समूह, अपार अवैद्ध संपत्ति बाले समूह, सरकारी धरोहर स्वाहा समूह, एक के विरुद्ध दूसरा प्यानल समूह, आदि जैसे विकराल द्वन्दों से भरे समूहों में एक अहंकारी और सर्व शक्तिशाली गँजेड़ी समूह है, जो अपने व्यक्तिगत नीतियों के कारण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भी लतारे जाने की प्रवल संभावना है। इससे देश को अपूरणीय राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक क्षतियाँ होना तय है।
सरकार अगर दूरद्रष्टा नहीं बना तो नेपाल चौ-शक्ति केन्द्र : भारत, चीन, अमेरिका और यूरोप का भीषण रणयुद्ध का अखाडा बनने का संकेत दिख रहा है। देश अपने आतंरिक झमेलों में फँसता जा रहा है। सदन में प्रतिपक्ष संतुष्ट नहीं है। संवैधानिक राष्ट्रपति की मानहानी है। सुकुम्वासी, बॉर्डरवासी, गरीब, ट्रेडजीवी, विद्यार्थी, कर्मचारी, शिक्षक, युवा, अदालत, कानून व्यवसायी, किसान, कूटनीतिज्ञ जैसे क्षेत्र निराश हैं।
भारत, चीन, अमेरिका और यूरोप सब अपने अपने दाँव में हैं। देश कालापानी, लिपुलेख और लिम्पीयाधूरा के मुद्दे को सुलझाने में लगभग असफल है। उत्तर में चीन द्वारा अतिक्रमित भूभागों को समेटना और MCC, SPP & IPS जैसे अमेरिकी रणनीतिक उलझनों और जेन्जी विद्रोह में उसके आर्थिक और समारिक लगानी से निपटना नेपाल के लिए दुर्भाग्य से कम नहीं है।
वर्तमान संसद और सांसदों में अधिकांश लोग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक सूझबूझ से परे हैं। हो भी क्यों नहीं? क्योंकि वे राजनीतिक आंदोलन से नहीं, वे केवल सामाजिक संजाल बन्द विरोध के एक घटनाक्रम से निर्मित हैं। वो भी दूसरों के बहकाव, झाँसे, तैयारी और लगानी में।
सामाजिक संजाल बन्द की क्षणिक समस्या तो समाधान हो गयी, मगर उसके आड़ में देश में पसरे राजनीतिक समस्या समाधान अब कच्चे उम्र के युवा सांसदों से लगभग असंभव प्राय: है। जहाँतक भ्रष्टाचार अन्त की बात है तो भाद्र २३-२४ का वह (भ्रष्टाचार विरोधी) आंदोलन भी नहीं थी। उस सामाजिक संजाल बन्द विरुद्ध के आंदोलन को जनचर्चा में लाने के लिए बड़ी चालाकी से देश में व्याप्त रहे भ्रष्टाचार के मुद्दों को बाद में जोड़ दिया गया जो आजके सांसदों के आर्थिक चरित्र के विपरीत है।
कौन कहता है कि युवा ही देश का विकास करता है? जिस समूह में राजनीति का समझ नहीं, वो भ्रष्टाचार रहित विकास कैसे करेगा? बिना धरातल और बिना सूत्र दुनिया का कोई सवाल समाधान नहीं होता। हक़ीक़त यही है कि पढ़ने लिखने के उम्र के युवा युवती अगर राजनीति में आ जाये तो राजनीति तो सुधरेगा नहीं, आर्थिक तानाशाही निश्चित है। उसीका क्रम बालेन सरकार बनते ही २८ अर्ब डॉलर का ऋण लेने का सरकारी निर्णय है।
२०४८ के आम निर्वाचन के बाद सत्ता में आए अधिकांश एमाले के नेता युवा थे। और आज एमाले से तुलनात्मक रुप में ०४८ साल में अधिकांश बूढ़े के नेतृत्व में रहे पार्टियों के नेताओं में आर्थिक भ्रष्टाचार का प्रतिशत कम है। क्यों? क्योंकि बूढ़ोँ में ऐशो आराम, फैशन, आधुनिकता, दिखावा, चमक दमक की आयु और प्रतिशत घट चुकी होती है। युवाओं में वही चीज कूटकूट कर भरी पड़ी होती है, जिसके पूर्ति के लिए उसे आवश्यक/अनावश्यक खर्च के पैसे चाहिए जो उसके वास्तविक कमाई से पूरा नहीं होते और अंततः वे कमिसनखोरी, भ्रष्टाचार, अनियमित कार्य, तस्करी, फरेबी और गैर कानूनी कार्य करते हैं। अपने आवश्यकता पूर्ति के लिए, पारिवारिक विलाषिता के लिए और अपने रंगीन संगत के लिए राजनीतिक, आर्थिक, रणनीतिक, शारीरिक और अन्य भौतिक-मानसिक अपराध करते हैं। अन्य पार्टियों से सत्तायी पार्टी में चुनावी टिकट लेकर सांसद बने अधिकांश युवा सांसद वैसे ही हैं। उसकी आर्थिक व्योरा देख सकते हैं।
चोरी, डकैती, अपहरण, तस्करी, मारपीट और अन्य अधिकांश अपराध लोग युवावस्था में इसलिए करते हैं, क्योंकि व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और देखावटी आवश्यकता जवानी और युवावस्था में ही होती हैं । इसीलिए राजनीति न तो जवानी के नशे होता है, न नशे में देश चलता है। बूढ़े राज नेताओं का देश ही जवान देश होने का पर्याप्त उदाहरण है।
युवा उम्र से नहीं, युवा सोंच, जोश, योजना और अडान से होता है।
कैलाश महतो

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