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मनोज शर्मा गौतम
प्रिय पिता, आपके वे कदम
धूल में भी अनमोल थे
त्याग से गढ़े हुए आपके पैर
फटे हुए भी बहुमूल्य थे
कर्तव्य की वो उम्मीदें
थीं झोपड़ी में भी स्वर्ग तुल्य ।
हमारे लिए आप ही थे
नियमों से गहरा दर्शन
शब्दावली से भी बड़ी किताब
समाज और परिवार प्रति आपका समर्पण ।
आज,
दिन बदल गया है,समय अस्थिर हो गया है,
कदम बढ़ने की कोशिश करते हैं पर रुक जाते हैं ।
दिल टूट जाता है और आँखें नम हो जाती है ।
रास्ते के बीचोंबीच कदम लड़खड़ा रहे हैं ।
कोई सवाल पूछने की कोशिश करता है,
शब्द उलझ जाते हैं, वाक्य रुक जाते हैं।
नियति और सत्यता को स्वीकार करना ही जीवन है।
मौन कहता है, मैं सहता हूँ
आँसू कहते हैं, मैं सहता हूँ
जब दर्द इतना गहरा होता है,
एक भीतर बोलता है, दूसरा बाहर बहता है।
कदम जब थक जाते हैं,
आपको याद करके फिर से खड़ा हो जाता हूँ ।
मैं रो नहीं रहा, ये आँखें गर्व से भरी हैं,
आपके बताए शुभ मार्गों पर चलकर।
क्योंकि,
मैं आपकी संतान हूँ, महोदय, मेरा आदर्श,
मेरे जीवन का शाश्वत प्रकाश और अविचल प्रकाश ।

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