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संघीयता का दशक और भूमिहीन दलितों का अधूरा सपना : कैलास दास

 

कैलास दास, जनकपुरधाम, 21 अगस्त । नेपाल के संविधान २०७२ में संघीय संरचना की घोषणा हुए अब एक दशक पूरा हो चुका है। संघर्ष, आंदोलन और बलिदान की रक्तरंजित पन्नों को पलटते हुए आया यह संविधान, देश में समानता, समावेशिता और न्याय का नया युग लाएगा—ऐसा विश्वास किया गया था। लेकिन समय ने साबित कर दिया कि संघीयता की दस वर्ष लंबी यात्रा के बाद भी भूमिहीन दलित समुदाय को मिलने वाले अधिकार अब तक केवल किताबों के पन्नों तक सीमित हैं।

संविधान की धारा ४०, बिंदु नं. ५ में स्पष्ट लिखा है—“राज्य को भूमिहीन दलितों को कानून अनुसार एक बार जमीन उपलब्ध करानी होगी।” लेकिन संविधान लागू हुए दशक पूरा होने पर भी यह प्रावधान अब तक कार्यान्वित नहीं हुआ है। परिणामस्वरूप, आज भी भूमिहीन दलितों की हालत जस की तस है।
दलित समुदाय के हजारों परिवार अब भी नदियों, पोखरों या सड़कों के किनारे झोपड़ी डालकर जीवन बिता रहे हैं। किसी और की जमीन पर डेरा डालते हैं तो कभी राज्य उनकी झोपड़ी तोड़ देता है, कभी सामंती मानसिकता वाले ताकतवर लोग खदेड़ देते हैं। उस समय उनका आँसू पोंछने वाला कोई नहीं होता, उनकी आवाज सुनने वाला कोई कान नहीं होता। आज भी दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल है, अनेक गाँव अब तक अंधेरे में डूबे हैं। बिजली का उजियाला उन्हें छू तक नहीं पाया। सरकारी सुविधा नाम की चीज उनके लिए केवल सपना है। ऋण तक कोई नहीं देता।
प्राकृतिक आपदाएँ आने पर भी सबसे अधिक पीड़ित वही होते हैं। बाढ़ उनकी झोपड़ी बहा ले जाती है, आग उनका घर राख बना देती है, बीमारी उनकी जिंदगी ले लेती है। लेकिन राज्य की सहायता सूची में उनका नाम प्रायः गायब रहता है। प्रश्न यही है—कब तक वे राज्य से उपेक्षित रहेंगे? कब तक संघीयता का नारा उनके लिए केवल कागजी खेल मात्र रहेगा?
इतिहास बताता है कि चाहे २०६२/०६३ का जनआंदोलन हो या मधेश आंदोलन—दलित समुदाय हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहा। भूखे-प्यासे होकर सड़कों पर नारा लगाने वाले युवा, पुलिस की लाठी सहने का साहस रखने वाले मजदूर, झाड़ू, थाली और लोटा उठाकर आंदोलन में रंग भरने वाली महिलाएँ—सबने विश्वास किया था कि संघीयता आएगी तो जीवन बदलेगा। उन्हें लगा था कि अब भूमिहीनता से मुक्ति मिलेगी, शिक्षा और रोज़गार आसान होगा, सामाजिक सम्मान प्राप्त होगा। लेकिन दशक बीतने के बाद भी सपना अधूरा है, पीड़ा वही है।
आज भी देशभर में लगभग ४४ प्रतिशत दलित परिवार भूमिहीन हैं। केवल मधेश प्रदेश में यह अनुपात ४० प्रतिशत है। शिक्षा की हालत और भी दुखद है—सिर्फ ३५ प्रतिशत दलितों को औपचारिक शिक्षा मिली है, शेष अब भी अशिक्षा के अंधकार में छटपटा रहे हैं। रोज़गार की स्थिति तो और भी भयावह है—स्थायी रोज़गार में दलितों की हिस्सेदारी मात्र २ प्रतिशत है। ये आँकड़े साफ़ दिखाते हैं कि संघीयता से उनके जीवन में रोशनी आने का सपना अब तक भ्रम ही साबित हुआ है।
संघीयता का मूल भाव समानता, समावेशिता और सामाजिक न्याय था। लेकिन दलितों के दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल भाषण का विषय बनकर रह गया है। कानून ने छुआछूत और भेदभाव को अपराध घोषित किया, मधेश प्रदेश ने दलित सशक्तिकरण कानून भी बनाया। लेकिन कागज पर बने कानून न तो समाज का व्यवहार बदल पाए, न ही दलितों को सम्मान दिला पाए। आज भी उन्हें सार्वजनिक जगहों पर अपमान सहना पड़ता है, रोज़गार में असमान व्यवहार झेलना पड़ता है, राजनीति और निर्णय-प्रक्रिया में उनकी आवाज दबा दी जाती है।
राज्य का चरित्र अब भी दोहरा है। एक ओर “समृद्ध नेपाल का सपना” बाँटा जाता है, दूसरी ओर देश की १४ प्रतिशत और मधेश की १८ प्रतिशत आबादी बनाने वाले दलित उपेक्षित कर दिए जाते हैं। समृद्धि तभी संभव है जब सभी नागरिकों को समान अवसर और संसाधनों तक पहुँच मिले। भूमिहीन, अशिक्षित और बेरोजगार दलितों को पीछे छोड़कर देश आगे नहीं बढ़ सकता।
दुखद तथ्य यह भी है कि राज्य के पास पर्याप्त गुठी या सरकारी जमीन मौजूद है, लेकिन उसका उपयोग ताकतवर और धनी वर्ग ने कब्जा कर रखा है। भूमिहीन दलितों को बाँटकर उनके जीवन स्तर सुधारने का साहस राज्य ने कभी नहीं दिखाया। सवाल अब भी वही है—दलितों का इस्तेमाल आंदोलन में करना, चुनाव में वोट माँगना, लेकिन अधिकार देने के वक्त मौन क्यों रहना?
राजनीतिक दलों का इतिहास भी यही बताता है कि दलितों को हमेशा उपयोग की वस्तु माना गया है। हर आंदोलन में उन्हें आगे किया गया, हर चुनाव में उन्हें आश्वासन दिया गया, लेकिन नतीजा शून्य रहा। यही कारण है कि राजनीति के प्रति दलित समुदाय का विश्वास दिन-ब-दिन कमजोर होता जा रहा है।
यदि संघीयता सचमुच सबके लिए है, तो अब भूमिहीन दलितों के लिए ठोस कदम उठाना होगा। गुठी या सरकारी जमीन का पुनर्वितरण करके उन्हें भूमि देनी होगी। शिक्षा निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण होनी चाहिए, दलित बच्चों को विशेष छात्रवृत्ति और रोज़गारमुखी प्रशिक्षण मिलना चाहिए। स्वास्थ्य में निःशुल्क सुविधा, रोज़गार में प्राथमिकता और राजनीति में वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा। छुआछूत-विरोधी कानूनों का कठोरता से क्रियान्वयन करना होगा।
संविधान की दशक लंबी यात्रा ने एक बात स्पष्ट कर दी है—संघीयता केवल नारे में नहीं, व्यवहार में भी लागू होनी चाहिए। आंदोलन में बलिदान देने वाले भूमिहीन दलित अब भी हाशिए पर हैं। जब तक उन्हें वास्तविक अवसर और सम्मान नहीं मिलेगा, संघीयता की सफलता अधूरी ही रहेगी।
संघीयता सत्ता का बँटवारा भर नहीं, बल्कि वह समान जीवनशैली है जिसे हर समुदाय महसूस कर सके। जब तक भूमिहीन को भूमि, अशिक्षित को शिक्षा, बेरोजगार को रोज़गार और दलित को सम्मान नहीं दिया जाएगा—संघीयता की दशक लंबी यात्रा अधूरी ही रहेगी।

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कैलास दास
जनकपुरधाम

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