चीख : वसन्त लोहनी
चीख
ये अजाब हम कब तक सहेँ?
जो ज़ख़्म है भरता ही नहीं।
कभी याद आती दिलरुबा की,
गुज़रे हुए उस शाम की।
ना चैन है दिल में,
ना चाहत बची।
पलके झपकती नहीं,
नींद कहां गुम हुई?
नम आँखें जब उठती हैं,
सब कुछ दिखाई देता है,
लेकिन आगे नहीं।
दूर-दूर तक देखने पर भी
पटरी खाली है, गाड़ी नहीं।
यह सज़ा हम कब तक सहें?
दर्द की चीख कब तक रुकें?



