गुरु के आयाम शून्यता का कारक अस्तित्व:
अजयकुमार झा, जलेश्वर ।
प्रश्न उठता है कि, आखिर अस्तित्व ने गुरु के आयाम को क्यों तिथिवाह्य कर दिया? आज गुरु घृणा के पात्र, समाज से अपहेलित, सरकार से दलित और आध्यात्मिक रूप से पतित , ऊर्जाहीन, दया के पात्र, अविश्वसनीय चरित्र क्यों हो गए हैं?
इसका सीधा उत्तर प्रकृति का नियम है : जन्म और मृत्यु:
प्रकृति का आधार ही परिवर्तन है। जो जन्मा है, वह एक दिन नष्ट होगा।
गीता (2.27) में भी कहा गया है – “जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु: ध्रुवं जन्म मृतस्य च” (जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है)।
इसलिए किसी भी जीव या वनस्पति का अस्तित्व हमेशा के लिए नहीं होता, क्योंकि प्रकृति उसे एक निश्चित अवधि के लिए ही बनाए रखती है। यहां गुरु के संबंध में भी इसे जोड़कर समझा जा सकता है।
अद्वैत वेदान्त : जगत नाम-रूप का खेल है। पेड़-पौधे और जीव केवल ब्रह्म की मायिक अभिव्यक्ति हैं। जब उनका प्रयोजन समाप्त हो जाता है, तो वे पुनः उसी ब्रह्म में लीन हो जाते हैं।
बौद्ध दर्शन : प्रत्येक प्राणी और वस्तु अनित्य (क्षणभंगुर) है। अस्तित्व ही शून्यता की ओर अग्रसर है।
सांख्य दर्शन : प्रकृति अपने गुणों (सत्व, रज, तम) के संतुलन से रचना करती है। असंतुलन होने पर वही रचना विलय को प्राप्त होती है।
जीव विज्ञान (Biology) : प्रत्येक जीवित प्राणी और पेड़-पौधा “life cycle” से गुजरता है – जन्म, वृद्धि, प्रजनन, वृद्धावस्था और मृत्यु।
पारिस्थितिकी (Ecology) : जब कोई प्राणी या पौधा विलुप्त हो जाता है, तो यह पर्यावरणीय संतुलन, जलवायु परिवर्तन, या अन्य प्रजातियों के लिए स्थान बनाने की प्रक्रिया होती है।
ऊर्जा का सिद्धान्त : विज्ञान कहता है कि ऊर्जा नष्ट नहीं होती, बल्कि रूप बदलती है। मृत्यु केवल “रूपांतरण” है – प्राणी/पौधा मिट्टी, खाद, वायु या अन्य जीवन का आधार बन जाता है। प्रकृति का उद्देश्य संतुलन बनाए रखना है। यदि कोई प्रजाति हमेशा जीवित रहती तो पृथ्वी पर असंतुलन पैदा हो जाता। पुराना अस्तित्व मिटता है ताकि नया जीवन अस्तित्ववान हो सके।
वास्तव में कोई भी पूर्णत: अस्तित्वहीन नहीं होता। वह केवल रूप बदलकर प्रकृति में विलीन हो जाता है — मिट्टी, जल, वायु, ऊर्जा के रूप में। इसीलिए कहा जाता है –
“मृत्यु अंत नहीं, बल्कि नए जीवन का आरम्भ है।”
दार्शनिक दृष्टि से देखा जाय तो प्राचीन काल में गुरु ही आत्मज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के स्रोत थे। आज ज्ञान के साधन (पुस्तक, इंटरनेट, एआई आदि) इतनी अधिकता में हैं कि लोग समझते हैं कि गुरु की आवश्यकता नहीं रही। सत्य की बहु आयामीता के कारण आज का व्यक्ति हर ज्ञान को तर्क की कसौटी पर परखना चाहता है जिससे श्रद्धा (श्रद्धा – गुरु-शिष्य संबंध की नींव) का भाव क्षीण हो गई है। इसी तरह अहंकार के आयाम में व्यापकता आने के मनुष्य मानने लगा है कि उसे सब पता है, अतः स्वाभाविक है कि उसके लिए गुरु अब अप्रासंगिक हो गए।
सामाजिक दृष्टि से देखें तो जिस तरह गुरु को माता-पिता से भी ऊँचा स्थान दिया जाता था, अब सामाजिक संरचना में उनका स्थान केवल “शिक्षक” तक सीमित रह गया है। जिसका दोषी वे स्वयं हैं। आज उन्हें भी पद और पैसा में ही ईश्वरत्व दिखाई देता है, ज्ञान में नहीं। अतः शिक्षा ज्ञानार्जन का साधन न रहकर रोजगार और व्यवसाय का माध्यम बन गई है। गुरु अब “पैसा लेकर पढ़ाने वाले” कामदार (नौकर+ई) व्यक्ति के रूप में स्वयं को प्रतिष्ठित करने में लगे हैं।
समानता और स्वतंत्रता की प्रवृत्ति आज का समाज हर संबंध में समानता चाहता है। “गुरु-शिष्य की ऊर्ध्वाधर (vertical) परम्परा” की जगह “दोस्ताना या क्षैतिज (horizontal)” संबंध जोड़ दिया जा रहा हैं। इसी प्रकार शैक्षिक दृष्टि से देखें तो पहले गुरु ही ज्ञान के केंद्र थे। आज AI Google, ChatGPT, YouTube आदि से कोई भी जानकारी वृहद स्तर पर अभी के अभी मिल जाती है। जिससे अनुसंधान और आत्म-अध्ययन – आधुनिक शिक्षा “शिक्षार्थी-केंद्रित” हो गई है, जिसमें शिक्षक/गुरु मार्गदर्शक मात्र रह गया है, ज्ञान का एकमात्र स्रोत नहीं। विद्यालय और विश्वविद्यालय नौकरी-केंद्रित शिक्षा दे रहे हैं, जबकि चरित्र और मूल्य निर्माण की परम्परा क्षीण हो गई है।जिससे गुरु का सम्मान क्षीण होता गया है। समकालीन उदाहरण के रूप में गुरुकुल से कोचिंग सेंटर तक की शैक्षिक यात्रा ने जीवन मूल्य के स्थान पर परीक्षा पास को स्थापित कर दिया है। जहां श्रद्धा का कोई स्थान नहीं होता। डिजिटल गुरु: यू ट्यूब, व्हाट्स एप, ट्यूटर, ऑनलाइन कोर्स, और AI आधारित शिक्षक के प्रभावकारिता ने “गुरु के भौतिक आयाम” को अस्तित्वहीन कर दिया है।
प्रसिद्ध संत, शंकराचार्य, मंडलेश्वर, पीठाधीश्वर और तथाकथित गुरुओं के अहंकार, षडयंत्र, धनलोलुपता और आडम्बर ने भी गुरु-परम्परा की पवित्रता को नष्ट करने में सहयोग किया है।
उपरोक्त तथ्यों से प्रमाणित होता है कि आज के समय में अस्तित्व ने ही गुरुओं के अस्तित्वगत आयाम को अस्वीकार कर दिया है।
विद्यावचस्पति अजय कुमार झा


