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‘बस हो गया’ : कौशल ‌कुमार सिंह

 

*बस हो गया*

मुझे लगता है

बस हो गया शहरों में

किनारा छु लिया लफ्जों में
बस कर दिया दिल को घायल पलकों में

न जाने क्यों लगता है दिल को
अपने को छुपाने में
खुद को क्यों खुदा के पास जाने में
बस हो गया
अपने को बचाने में

दिल की मुकाम पाने को
बेपनाह चाह रखता है
अब क्या करूं तुझे बचाने को
तू लौट चल घर को
अपनो को बसाने को
बस हो गया
मुश्किल में पाने को

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रास्ता निकल गया
अपनो को पाने को
फिर भी राह न मिला
गैरों को भूलाने को
बस हो गया
जीवन पाने को ।।

कौशल ‌कुमार सिंह

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