विद्या भंडारी की सदस्यता स्वीकार कर उन्हें जिम्मेदारी दी जानी चाहिए –कर्ण थापा
काठमांडू, भादव २० – नेकपा (एमाले) स्थायी कमिटी सदस्य कर्ण थापा ने आज से शुरु हो रहे विधान महाधिवेशन के लिए अपनी अलग ही राय रखी है । गुरुवार को हुए सचिवालय की बैठक में उन्होंने अपनी अलग राय प्रस्तुत करने का निर्णय किया है ।
३२ पृष्ठों की अपनी अलग राय में उन्होंने उल्लेख किया है कि सावन ५–६ को हुई केंद्रीय समिति की बैठक में पूर्व राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के प्रति पक्षपातपूर्ण निर्णय लिया गया ।
उन्होंने उल्लेख किया है कि “…इस निर्णय को देखते हुए शुरु से ही ऐसा लगा कि पूर्वराष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी के प्रति पूर्ण पूर्वाग्रही होकर यह निर्णय लिया गया है । कल वो देश की राष्ट्रपति थी । अभी वो एक सामान्य नागरिक हैं । इस यथार्थ को पूरी तरह से नजरअंदाज कर यह निर्णय लिया गया है ।”
उन्होंने केन्द्रीय कमिटी के निर्णय को लेकर लिखा है कि – एक और बात यह है कि हालांकि वह देश के राष्ट्रपति हैं, लेकिन यह उल्लेख नहीं किया गया है कि वह (एमाले) के पूर्व उपाध्यक्ष भी थे । यह भी उल्लेख नहीं किया गया है कि वह राष्ट्रपति बनने के समय एमाले के निर्णय से राष्ट्रपति बने थे ।”
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पार्टी के निर्णय ऐसे होने चाहिए जिससे आम पार्टी कार्यकर्ताओं, समर्थकों, शुभचिंतकों और जनता का विश्वास और समर्थन बढ़े।
थापा ने अपनी अलग राग व्यक्त करते हुए कहा, “हमने मिशन ०८४ के नारे को आगे बढ़ाया है। ०८४ साल में होने वाले आम निर्वाचन में नेकपा (एमाले) को बहुमत में लाने के लिए पूरी पार्टी को वैचारिक एकता में एकजुट होना होगा और पूरी ताकत को जुटाना होगा ।”
उन्होंने बताया कि भंडारी को एमाले की राजनीति में आने पर जो प्रतिबंध लगया गया है, यह उचित नहीं है । उनकी राय है कि भंडारी की सदस्यता स्वीकार कर स–सम्मान जिम्मेदारी दी जाए ।


